नई दिल्ली: सुप्रीम कोर्ट ने देशभर में आवारा कुत्तों (stray dogs) के बढ़ते खतरे को लेकर एक सख्त और व्यापक आदेश जारी किया है।
अदालत ने सभी हाई कोर्ट्स को निर्देश दिया है कि वे इस मुद्दे पर स्वतः संज्ञान (suo motu) लेकर रिट याचिकाएं दर्ज करें और सुप्रीम कोर्ट के निर्देशों के पालन की निगरानी करें।
सुप्रीम कोर्ट अदालत के आदेश के बाद अब विभिन्न राज्यों के हाईकोर्ट्स द्वारा भी स्वत: संज्ञान लिए जाने की संभावना जताई जा रही है।
लेकिन राजस्थान हाईकोर्ट इस मामले पर पहले ही स्वप्रेणा प्रसंज्ञान लेकर सुनवाई कर रहा हैं.
2024 से जारी हैं मामले पर सुनवाई
राजस्थान हाईकोर्ट ने वर्ष 2024 में आवारा कुत्तों की समस्या और आमजन की सुरक्षा से जुड़े मुद्दे पर स्वत: संज्ञान लेते हुए राज्य सरकार को नोटिस जारी किया था और विस्तृत जवाब मांगा था।
हाईकोर्ट के समक्ष यह मामला फिलहाल राज्य सरकार के जवाब प्रस्तुत किए जाने के चरण में लंबित है।
अदालत ने पूर्व में शहरी और ग्रामीण क्षेत्रों में आवारा कुत्तों की बढ़ती संख्या, लोगों पर हमलों की घटनाओं तथा प्रशासनिक लापरवाही को गंभीर चिंता का विषय माना था।
हाई कोर्ट ने लोगों से की थी अपील भी
जस्टिस कुलदीप माथुर और जस्टिस रवि चिरानीया की खंडपीठ ने इस मामले में सुनवाई करते हुए जनता से अपील की थी.
कोर्ट ने आम जनता से भी आहवान किया था कि कि अगर वो भावनाओं, धार्मिक मान्यताओं या जानवरों के प्रति प्रेम के कारण उन्हें खाना खिलाना या उनकी देखभाल करना चाहते हैं, तो वे ऐसा नगर पालिकाओं या निजी संगठनों द्वारा बनाए गए डॉग शेल्टर और गोशालाओं में करें.
साल 2024 में डॉग बाइट के 3 लाख से ज्यादा केस सामने आए थे और ये सिलसिला थमने की बजाए लगातार जारी है.
राजस्थान के आंकड़ों से पता चलता है कि कुत्तों के काटने के मामले 2022 में 88029, 2023 में 103533 और 2024 में 140543 से बढ़कर 2025 में 15062 हो गए हैं।
न्यायमित्र किए थे नियुक्त
मामले में कोर्ट की सहायता के लिए सीनियर एडवोकेट डॉ. सचिन आचार्य, एडवोकेट प्रियंका बोराणा और हेली पाठक को न्याय मित्र नियुक्त किया गया था।
सुनवाई के दौरान न्याय मित्र ने कोर्ट को बताया कि विभिन्न केंद्रीय और राज्य कानूनों के तहत अधिकारियों का दायित्व है कि वे सड़कों को नागरिकों के लिए सुरक्षित बनाएं। साथ ही सुझाव पेश करने के लिए न्याय मित्र की ओर से दो सप्ताह का समय मांगा गया।
बाधा डालने वालों के खिलाफ कार्रवाई के दिए थे निर्देश
राजस्थान हाईकोर्ट ने 11 अगस्त 2025 को मामले की सुनवाई करते हुए जयपुर, जोधपुर और उदयपुर में नगर निकायों को शहर की सड़कों से आवारा कुत्तों और अन्य जानवरों को हटाने का निर्देश दिया था.
साथ ही यह भी सुनिश्चित किया कि उन्हें कम से कम शारीरिक नुकसान हो।
कोर्ट ने स्पष्ट किया था कि जो कोई भी नगर निकायों को सड़कों/कॉलोनियों/सार्वजनिक रास्तों से आवारा जानवरों को हटाने में बाधा डालेगा, उसके खिलाफ कार्रवाई की जाएगी।
नगर निगम के अधिकारियों और कर्मचारियों को उनके काम में बाधा डालने वाले या सरकारी कर्मचारियों के कर्तव्यों के निर्वहन में बाधा डालने वाले लोगों के खिलाफ FIR दर्ज करने सहित कार्रवाई करने की पूरी छूट दी गई थी।
राजस्थान ने पहले ही बनाया था Stray Dog Control Model
सुप्रीम कोर्ट की सख्ती और बढ़ते dog bite मामलों के बाद राजस्थान इस मुद्दे पर विस्तृत guidelines जारी करने वाला देश का पहला बड़ा राज्य बना था।
राज्य सरकार ने stray dog management को public safety issue मानते हुए सभी नगर निकायों को action plan लागू करने के निर्देश दिए थे।
राजस्थान सरकार ने अपने आदेश में:
- स्कूल, अस्पताल और रेलवे स्टेशन जैसे इलाकों को “sensitive zones” घोषित किया।
- Animal Birth Control Centres मजबूत करने के निर्देश दिए।
- नसबंदी और anti-rabies vaccination अभियान तेज करने को कहा।
- stray dog hotspots की CCTV monitoring बढ़ाने को कहा।
- feeding zones तय करने के निर्देश दिए।
- stray dogs को पकड़ने में अमानवीय तरीकों पर रोक लगाई।
- सभी Urban Local Bodies से नियमित compliance reports भी मांगी गई थीं।
अब सुप्रीम कोर्ट के नए आदेश के बाद राजस्थान मॉडल के ground implementation पर भी नजर रहेगी।
राजस्थान मॉडल बन सकता है देश के लिए उदाहरण
कानूनी और प्रशासनिक विशेषज्ञों का मानना है कि यदि राजस्थान सरकार अपने stray dog management model को प्रभावी तरीके से लागू कर पाती है, तो यह दूसरे राज्यों के लिए भी example बन सकता है।
सुप्रीम कोर्ट के ताजा आदेश के बाद अब यह साफ हो गया है कि animal welfare और public safety के बीच संतुलन बनाना ही आगे की नीति का आधार होगा।
राजस्थान सरकार ने पहले ही structured SOP, vaccination drive और sensitive zone monitoring जैसी व्यवस्थाएं शुरू कर दी हैं, इसलिए अब निगाह इस बात पर रहेगी कि उनका असर जमीन पर कितना दिखाई देता है।
आने वाले समय में Rajasthan High Court की monitoring और राज्य सरकार की compliance strategy इस पूरे मॉडल की सफलता तय करेगी।
प्रशासनिक जवाबदेही तय करने जरूरत
राजस्थान हाईकोर्ट में पेडिंग इस मामले में एडवोकेट प्रतिक कासलीवाल कहते हैं कि सुप्रीम कोर्ट के ताजा निर्देशों के बाद राज्यों की जिम्मेदारी और बढ़ गई है।
अब स्थानीय निकायों, नगर निगमों और पशुपालन विभागों को मिलकर प्रभावी नीति लागू करनी होगी ताकि आमजन की सुरक्षा सुनिश्चित की जा सके और पशु संरक्षण संबंधी कानूनों का भी संतुलित पालन हो।
कासलीवाल कहते हैं कि अदालतों का उद्देश्य केवल नियंत्रणात्मक कार्रवाई नहीं बल्कि एक संतुलित और मानवीय समाधान सुनिश्चित करना है, जिसमें नसबंदी, वैक्सीनेशन और वैज्ञानिक प्रबंधन जैसी व्यवस्थाओं को प्राथमिकता दी जाए।
वहीं आम लोगों की सुरक्षा और बच्चों पर हो रहे हमलों को रोकने के लिए प्रशासनिक जवाबदेही तय करने जरूरत हैं.

अब राजस्थान मॉडल पर हाईकोर्ट रखेगा नजर
अब सुप्रीम कोर्ट के नए आदेश के बाद राजस्थान में इन guidelines के वास्तविक पालन पर भी नजर रहेगी। क्योंकि सुप्रीम कोर्ट ने सभी हाईकोर्ट्स को stray dog management की निगरानी के लिए suo motu petitions दर्ज करने को कहा है।
ऐसे में Rajasthan High Court भी राज्य सरकार, नगर निगमों और Urban Local Bodies से compliance reports मांग सकता है।
माना जा रहा है कि हाईकोर्ट अब यह देखेगा कि:
- sensitive zones में stray dog incidents कितने कम हुए।
- sterilisation और vaccination drives कितनी प्रभावी रहीं।
- राजस्थान सरकार द्वारा जारी SOP का जमीन पर कितना पालन हुआ।
राजस्थान पहले ही policy framework तैयार कर चुका है, इसलिए अब यहां focus implementation और accountability पर रहेगा। माना जा रहा है कि अदालत अब यह भी देखेगी कि राजस्थान सरकार द्वारा जारी SOP और ground-level action में कितना अंतर है और sensitive zones में stray dog menace वास्तव में कितना कम हुआ है।
अधिकारियों पर चलेगी अवमानना कार्रवाई
सुप्रीम कोर्ट ने अपने आदेश में बेहद सख्त रुख अपनाते हुए चेतावनी दी कि यदि संबंधित अधिकारी-चाहे वे नगर निगम (Municipal Department) के हों या राज्य सरकार के, कोर्ट के निर्देशों का पालन नहीं करते, तो उनके खिलाफ अवमानना (contempt of court) की कार्रवाई शुरू की जा सकती है।
अदालत ने स्पष्ट कहा कि:
- जानबूझकर आदेशों की अनदेखी (wilful disobedience) बर्दाश्त नहीं होगी।
- निष्क्रियता (inaction) या लापरवाही भी कार्रवाई को आमंत्रित करेगी।
- हाई कोर्ट्स को यह पूरा अधिकार होगा कि वे ऐसे अधिकारियों के खिलाफ सख्त कदम उठाएं।
इस निर्देश के जरिए सुप्रीम कोर्ट ने यह संदेश दिया है कि इस मुद्दे को अब हल्के में नहीं लिया जाएगा।
राज्यों को देनी होगी रिपोर्ट
सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि पूरे देश में रोजाना compliance monitoring करना उसके लिए व्यावहारिक रूप से मुश्किल है। इसलिए अदालत ने सभी हाईकोर्ट्स को निर्देश दिया कि वे “In Re Compliance With The Directions Issued By Supreme Court…” नाम से suo motu writ petitions दर्ज करें और अपने राज्यों में आदेशों के पालन की निगरानी करें।
अदालत ने कहा कि हाईकोर्ट्स स्थानीय परिस्थितियों को ज्यादा बेहतर तरीके से समझ सकते हैं और समय पर हस्तक्षेप कर सकते हैं। कोर्ट ने यह भी स्पष्ट किया कि हाईकोर्ट्स स्थानीय जरूरतों के हिसाब से अतिरिक्त दिशा-निर्देश भी जारी कर सकते हैं, बशर्ते सुप्रीम कोर्ट के आदेश कमजोर न हों।
साथ ही अदालत ने राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों के Chief Secretaries और संबंधित विभागों के सचिवों को 7 अगस्त 2026 तक विस्तृत compliance affidavit दाखिल करने का निर्देश दिया है। केंद्र सरकार और National Highways Authority of India यानी NHAI को भी अपनी रिपोर्ट देनी होगी।
हर जिले में Animal Birth Control Centre बनाने का आदेश
सुप्रीम कोर्ट ने राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों को stray dog management infrastructure मजबूत करने का भी निर्देश दिया।
अदालत ने कहा कि हर जिले में कम से कम एक fully functional Animal Birth Control Centre होना चाहिए, जहां sterilisation और vaccination programmes प्रभावी तरीके से चल सकें। इसके अलावा सरकारी अस्पतालों में anti-rabies vaccine और immunoglobulin पर्याप्त मात्रा में उपलब्ध कराना भी जरूरी होगा।
कोर्ट ने कहा कि आवारा कुत्तों के हमले और rabies जैसे खतरे अब गंभीर सार्वजनिक स्वास्थ्य समस्या बन चुके हैं। इसलिए राज्य सरकारें इसे केवल नगर निगमों तक सीमित मुद्दा मानकर नहीं छोड़ सकतीं।
सुप्रीम कोर्ट ने NHAI को भी राष्ट्रीय राजमार्गों और एक्सप्रेसवे पर घूमने वाले stray cattle और अन्य जानवरों से निपटने के लिए व्यापक नीति बनाने का निर्देश दिया। अदालत ने कहा कि हाईवे पर जानवरों की मौजूदगी सड़क हादसों की बड़ी वजह बन रही है।
स्थानीय स्तर पर निगरानी से बेहतर होगा क्रियान्वयन
सुप्रीम कोर्ट ने अपने आदेश में यह भी स्पष्ट किया कि पूरे देश में रोजाना के अनुपालन की निगरानी करना उसके लिए व्यावहारिक नहीं है।
अदालत ने कहा कि हाई कोर्ट्स को यह जिम्मेदारी सौंपने से:
- स्थानीय परिस्थितियों को बेहतर समझा जा सकेगा।
- समय पर सुधारात्मक कदम उठाए जा सकेंगे।
- आदेशों का प्रभावी क्रियान्वयन सुनिश्चित होगा।
साथ ही, हाई कोर्ट्स को यह छूट भी दी गई है कि वे अपने क्षेत्र की जरूरतों के अनुसार आदेशों के दायरे को बढ़ा सकते हैं, लेकिन सुप्रीम कोर्ट के मूल निर्देशों को कमजोर नहीं करेंगे।
‘अब लापरवाही हुई तो सीधे Contempt’
सुप्रीम कोर्ट ने अपने आदेश में बेहद कड़ा संदेश भी दिया। अदालत ने कहा कि यदि संबंधित अधिकारी आदेशों का पालन नहीं करते या जानबूझकर उन्हें नजरअंदाज करते हैं, तो हाईकोर्ट्स उनके खिलाफ contempt proceedings शुरू कर सकते हैं।
कोर्ट ने कहा कि non-compliance, inaction और wilful disregard जैसे मामलों में अधिकारियों को व्यक्तिगत रूप से जिम्मेदार ठहराया जाएगा। अदालत ने यह भी कहा कि लगातार लापरवाही की स्थिति में disciplinary proceedings और tortious liability जैसी कार्रवाई भी संभव है।
सुप्रीम कोर्ट ने यह भी नोट किया कि कई राज्यों में पहले दिए गए निर्देशों के बावजूद ground-level implementation बेहद कमजोर रहा है। इसी वजह से अदालत को निगरानी की जिम्मेदारी हाईकोर्ट्स को सौंपनी पड़ी।
नगर निगमों की होगी सीधी जवाबदेही
सुप्रीम कोर्ट का यह आदेश देशभर की municipal authorities और राज्य सरकारों पर बड़ा प्रशासनिक दबाव डालेगा। अब stray dog management केवल स्थानीय निकायों का routine काम नहीं रहेगा, बल्कि इसकी सीधी निगरानी हाईकोर्ट्स करेंगे।
विशेष रूप से राजस्थान जैसे राज्यों में, जहां सरकार पहले ही विस्तृत stray dog guidelines और action plan लागू कर चुकी है, वहां Rajasthan High Court की निगरानी और महत्वपूर्ण मानी जा रही है। माना जा रहा है कि हाईकोर्ट अब यह देख सकता है कि राज्य सरकार और नगर निकायों ने ground level पर कितना काम किया और sensitive zones में हालात कितने बदले।
contempt proceedings की चेतावनी के बाद अधिकारियों के लिए आदेशों को नजरअंदाज करना मुश्किल होगा। साथ ही यह फैसला public safety और animal control policy के बीच संतुलन बनाने की दिशा में भी महत्वपूर्ण माना जा रहा है।
सुप्रीम कोर्ट ने अपने आदेश में यह भी स्पष्ट किया कि जो अधिकारी bona fide तरीके से अदालत के आदेश लागू करेंगे, उन्हें कानूनी सुरक्षा मिलेगी। यानी ईमानदारी से कार्रवाई करने वाले अधिकारियों के खिलाफ सामान्य परिस्थितियों में coercive action नहीं लिया जाएगा।
यह फैसला आने वाले समय में stray dog management, municipal governance और public safety से जुड़े मामलों में बड़ी राष्ट्रीय मिसाल माना जा सकता है। अदालत के ताजा रुख से साफ संकेत है कि सार्वजनिक सुरक्षा से जुड़े मामलों में अब किसी भी तरह की प्रशासनिक ढिलाई आसानी से स्वीकार नहीं की जाएगी।