नई दिल्ली: सुप्रीम कोर्ट ने अपने अहम फैसले में नेशनल सिक्योरिटी एक्ट (NSA) के तहत की गई एक प्रिवेंटिव डिटेंशन को रद्द कर दिया है।
अदालत ने NSA के तहत जारी निरोधात्मक हिरासत (preventive detention) आदेश को रद्द करते हुए स्पष्ट किया है कि डिटेन्यू (नजरबंद व्यक्ति) की ओर से दी गई अर्जी (representation) पर समय पर विचार न करना एक गंभीर कानूनी खामी है। कोर्ट ने कहा कि ऐसी देरी पूरी डिटेंशन प्रक्रिया को अवैध बना देती है।
जस्टिस एम.एम. सुंद्रेश और जस्टिस एन. कोटिस्वर सिंह की बेंच ने यह अहम फैसला सुनाते हुए कहा कि किसी भी डिटेन्यू की अर्जी पर ‘सबसे पहले और बिना देरी’ विचार करना सरकार की जिम्मेदारी है।
क्या था पूरा मामला?
दरअसल यह मामला उत्तर प्रदेश के मथुरा से जुड़ा है, जहां आरोपी पर श्रीकृष्ण जन्मभूमि और द्वारकाधीश मंदिर के पास अवैध खुदाई और निर्माण कराने का आरोप था।
स्थानीय लोगों के विरोध के बावजूद काम जारी रहा, जिससे पांच मकान गिर गए और कई अन्य मकानों में दरारें आ गईं। इस हादसे में बच्चे समेत 3 लोगों की मौत हो गई थी।
घटना के बाद इलाके में दहशत फैल गई और NDRF व SDRF जैसी एजेंसियों को राहत कार्य के लिए तैनात करना पड़ा।
गिरफ्तारी और NSA के तहत कार्रवाई
आरोपी को भारतीय न्याय संहिता (BNS) की धारा 105 के तहत गिरफ्तार किया गया था। उसने 30 जून 2025 को जमानत के लिए आवेदन किया।
इसके ठीक 2 दिन बाद, 2 जुलाई 2025 को मथुरा के जिला मजिस्ट्रेट ने उसके खिलाफ NSA के तहत डिटेंशन ऑर्डर जारी कर दिया। इसके बाद हाई कोर्ट में आरोपी ने दलील दी थी कि जब वह पहले से ही जेल में था, तो NSA लगाने का कोई औचित्य नहीं था।
हालांकि, अदालत ने इस दलील को खारिज करते हुए कहा कि यदि यह आशंका हो कि व्यक्ति रिहा होकर सार्वजनिक व्यवस्था के लिए खतरा बन सकता है, तो NSA लगाया जा सकता है।
प्रतिनिधित्व पर देरी बना मुख्य मुद्दा
आरोपी ने अपनी हिरासत के खिलाफ दो प्रतिनिधित्व दिए-एक निरोधक प्राधिकारी (detaining authority) को और दूसरा राज्य सरकार को।
लेकिन कोर्ट ने पाया कि राज्य सरकार ने इस प्रतिनिधित्व पर विचार हिरासत आदेश को मंजूरी देने के बाद किया। यहीं पर पूरा मामला पलट गया।
कहां हुई चूक?
अपीलकर्ता का कहना था कि उसके प्रतिनिधित्व पर समय पर विचार नहीं किया गया, जिससे उसकी संवैधानिक सुरक्षा का उल्लंघन हुआ।
वहीं सरकार का तर्क था कि सभी प्रक्रियाएं कानून के अनुसार पूरी की गई थीं।
लेकिन सुप्रीम कोर्ट ने रिकॉर्ड देखकर पाया कि प्रतिनिधित्व को समय पर राज्य सरकार तक भेजा ही नहीं गया और उस पर देरी से विचार हुआ।
SC की अहम टिप्पणी–‘अर्जी पर तुरंत फैसला जरूरी’
कोर्ट ने अपने फैसले में कहा कि संविधान के तहत व्यक्तिगत स्वतंत्रता की रक्षा के लिए यह जरूरी है कि डिटेन्यू की अर्जी को प्राथमिकता के आधार पर देखा जाए।
इस मामले में डिटेन्यू ने दो अर्जी दी थीं, एक डिटेनिंग अथॉरिटी को और दूसरी राज्य सरकार को। लेकिन राज्य सरकार ने अर्जी पर विचार डिटेंशन ऑर्डर को मंजूरी देने के बाद किया।
सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि निरुद्ध व्यक्ति का प्रतिनिधित्व उसके मौलिक अधिकारों से जुड़ा होता है और इस पर तुरंत निर्णय लेना सरकार की जिम्मेदारी है।
अदालत ने कहा कि इस मामले में निरोधक प्राधिकारी ने प्रतिनिधित्व को समय पर आगे नहीं बढ़ाया, जिससे पूरी प्रक्रिया प्रभावित हुई। सुप्रीम कोर्ट ने इसे गंभीर चूक मानते हुए कहा कि ऐसी देरी से डिटेन्यू को मिले संवैधानिक अधिकारों का उल्लंघन होता है।
SC का फैसला-हिरासत और मंजूरी दोनों रद्द
इससे पहले हाईकोर्ट ने आरोपी की याचिका खारिज कर दी थी और माना था कि NSA के तहत हिरासत उचित थी।
हालांकि सुप्रीम कोर्ट ने इस फैसले को पलट दिया और कहा कि प्रक्रिया में हुई देरी इतनी गंभीर है कि पूरे आदेश को ही रद्द करना जरूरी है। कोर्ट ने पाया कि डिटेनिंग अथॉरिटी ने डिटेन्यू की अर्जी को समय पर राज्य सरकार तक नहीं पहुंचाया।
कोर्ट ने कहा कि यह देरी कानून के मूल सिद्धांतों के खिलाफ है और इसी वजह से डिटेंशन ऑर्डर और उसकी मंजूरी दोनों को रद्द कर दिया गया। और अदालत ने तुरंत प्रभाव से डिटेन्यू को रिहा करने का आदेश दिया।
सुप्रीम कोर्ट ने एक बार फिर दोहराया कि व्यक्तिगत स्वतंत्रता सर्वोपरि है और किसी भी प्रकार की लापरवाही या देरी पूरी कार्रवाई को गैरकानूनी बना सकती है। यह फैसला साफ करता है कि भले ही सरकार को NSA जैसे सख्त कानूनों के तहत कार्रवाई का अधिकार हो, लेकिन वह अधिकार बिना प्रक्रिया का पालन किए इस्तेमाल नहीं किया जा सकता।