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ट्रांसजेंडर कानून पर सुप्रीम कोर्ट सख्त, सेल्फ-आइडेंटिटी हटाने पर कोर्ट सख्त, केंद्र से जवाब तलब किया

Supreme Court Questions Transgender Rights Amendment, Seeks Centre’s Response On Self-Identification Concerns
सुप्रीम कोर्ट ने ट्रांसजेंडर कानून संशोधन को चुनौती पर केंद्र से जवाब मांगा और सेल्फ-आइडेंटिटी हटाने पर गंभीर सवाल उठाए हैं।

नई दिल्ली: ट्रांसजेंडर अधिकारों को लेकर देश में एक बार फिर बड़ी कानूनी बहस शुरू हो गई है। सुप्रीम कोर्ट ने ट्रांसजेंडर पर्सन्स (प्रोटेक्शन ऑफ राइट्स) संशोधन अधिनियम, 2026 की संवैधानिक वैधता को चुनौती देने वाली याचिकाओं पर केंद्र सरकार और राज्यों से जवाब तलब किया है।

मुख्य न्यायाधीश Justice Surya Kant और न्यायमूर्ति Justice Joymalya Bagchi की पीठ ने नोटिस जारी करते हुए मामले को 6 सप्ताह बाद सुनवाई के लिए सूचीबद्ध किया है। साथ ही संकेत दिया कि इस मामले की सुनवाई आगे 3 जजों की बेंच करेगी।

सेल्फ-आइडेंटिफिकेशन पर कोर्ट की चिंता

सुनवाई के दौरान सबसे अहम मुद्दा ट्रांसजेंडर व्यक्तियों के “स्व-परिचय” (self-identification) के अधिकार को लेकर उठा।

सीनियर एडवोकेट अभिषेक मनु सिंघवी ने दलील दी कि संशोधन कानून सुप्रीम कोर्ट के ऐतिहासिक NALSA फैसले के खिलाफ है, जिसमें जेंडर की पहचान को व्यक्ति का मौलिक अधिकार माना गया था।

लेकिन इस पर चीफ जस्टिस सूर्यकांत ने चिंता जताते हुए कहा कि अगर पूरी तरह सेल्फ-आइडेंटिफिकेशन की अनुमति दी जाती है, तो इसका दुरुपयोग भी हो सकता है।

CJI ने पूछा कि क्या ऐसा संभव नहीं है कि कुछ लोग ट्रांसजेंडर होने का दावा करके सरकारी लाभ हासिल करने की कोशिश करें?

इस पर सिंघवी ने जवाब दिया कि ट्रांसजेंडर के लिए कोई आरक्षण व्यवस्था नहीं है, इसलिए इस तरह के दुरुपयोग की आशंका बेहद कम है।

उन्होंने कहा कि कुछ दुर्लभ मामलों की संभावना के आधार पर बहुसंख्यक लोगों के मौलिक अधिकारों को सीमित नहीं किया जा सकता।

NALSA जजमेंट vs संशोधन कानून: ट्रांसजेंडर अधिकारों पर नई बहस

याचिकाकर्ताओं का कहना है कि यह संशोधन सीधे तौर पर NALSA फैसले की मूल भावना को खत्म करता है, जिसमें व्यक्ति को अपनी लैंगिक पहचान खुद तय करने का अधिकार दिया गया था।

वहीं, कोर्ट ने यह भी संकेत दिया कि संसद कानून में बदलाव कर सकती है, जिससे किसी पुराने फैसले का आधार बदल सकता है। अब कोर्ट इस संशोधन को संविधान के अनुच्छेद 21 (जीवन और व्यक्तिगत स्वतंत्रता का अधिकार) के तहत परखेगा।

मेडिकल बोर्ड से पहचान का प्रावधान विवाद में

संशोधन अधिनियम के तहत ट्रांसजेंडर पहचान के लिए अब जिला मजिस्ट्रेट द्वारा जारी सर्टिफिकेट जरूरी होगा, जो मेडिकल बोर्ड की सिफारिश के बाद ही मिलेगा।

याचिकाकर्ताओं का कहना है कि यह प्रावधान गोपनीयता, गरिमा और व्यक्तिगत स्वतंत्रता के अधिकार का उल्लंघन करता है, क्योंकि सुप्रीम कोर्ट पहले ही मेडिकल जांच को अनिवार्य करने के खिलाफ फैसला दे चुका है।

ट्रीटमेंट और थेरेपी पर भी उठे सवाल

सुनवाई के दौरान यह भी मुद्दा उठा कि संशोधन के कारण कई ट्रांसजेंडर व्यक्तियों की हॉर्मोनल थेरेपी प्रभावित हुई है।

हालांकि, केंद्र सरकार की ओर से पेश सॉलिसिटर जनरल Tushar Mehta ने स्पष्ट किया कि कानून केवल जबरन जेंडर परिवर्तन जैसे मामलों को अपराध बनाता है, न कि स्वेच्छा से किए गए उपचार को।

कोर्ट का रुख: अभी राहत नहीं

याचिकाकर्ताओं ने अंतरिम राहत की मांग की, लेकिन कोर्ट ने इसे खारिज करते हुए कहा कि अभी कानून लागू ही नहीं हुआ है, इसलिए इस स्तर पर कोई आदेश देना उचित नहीं होगा।

अदालत ने कहा कि जब तक अधिनियम लागू नहीं होता, तब तक उस पर रोक लगाने का सवाल नहीं उठता।

याचिकाओं में क्या है मुख्य चुनौती?

याचिकाओं में कहा गया है कि यह संशोधन संविधान के अनुच्छेद 14, 15, 19 और 21 के तहत ट्रांसजेंडर समुदाय के अधिकारों का उल्लंघन करता है। इसके अलावा,

  • ट्रांसजेंडर की परिभाषा में बदलाव
  • मेडिकल सर्टिफिकेशन की अनिवार्यता
  • जेंडर-आफर्मिंग सर्जरी के बाद नए सर्टिफिकेट की बाध्यता
  • दंडात्मक प्रावधानों का असंतुलन

जैसे मुद्दों को भी चुनौती दी गई है।

गौरतलब है कि इस संशोधन अधिनियम को देश के कई हाईकोर्ट्स यानी केरल, दिल्ली, कर्नाटक और बॉम्बे में भी चुनौती दी गई है।

यह मामला अब न सिर्फ कानूनी बल्कि सामाजिक और संवैधानिक दृष्टि से भी बेहद अहम हो गया है, क्योंकि यह सीधे तौर पर पहचान, गरिमा और व्यक्तिगत स्वतंत्रता जैसे मूल अधिकारों से जुड़ा हुआ है।

क्या है आगे का रास्ता?

सुप्रीम कोर्ट ने केंद्र और राज्यों को नोटिस जारी कर जवाब मांगा है और मामले को आगे सुनवाई के लिए सूचीबद्ध किया है।

अब सबकी नजर सुप्रीम कोर्ट की अगली सुनवाई पर है, जहां यह तय होगा कि क्या ट्रांसजेंडर व्यक्तियों का सेल्फ-आइडेंटिफिकेशन अधिकार बरकरार रहेगा? या सरकार के संशोधन को संवैधानिक मान्यता मिलेगी?

यह फैसला आने वाले समय में देश में ट्रांसजेंडर अधिकारों की दिशा तय कर सकता है।

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