नई दिल्ली: कोर्ट की सुनवाई के दौरान जजों की मौखिक टिप्पणियों और सांकेतिक बातों के कथित गलत इस्तेमाल का मामला सुप्रीम कोर्ट पहुंचा है।
सुप्रीम कोर्ट ने जजों की मौखिक टिप्पणियों को संदर्भ से काटकर सोशल मीडिया पर मीम, वायरल कंटेंट या कमाई के लिए इस्तेमाल किए जाने के आरोपों पर जवाब मांगा है।
एडवोकेट राजा चौधरी ने सुप्रीम कोर्ट में यह जनहित याचिका दाखिल की है।
इसमें आरोप लगाया गया है कि कोर्ट में जजों की कही बातों को संदर्भ से हटाकर सोशल मीडिया पर मीम, वायरल कंटेंट और राजनीतिक इस्तेमाल के लिए फैलाया जा रहा है।
याचिका में ऐसे इस्तेमाल, ट्रेडमार्क और इससे कमाई किए जाने की भी जांच की मांग की गई है।
चीफ जस्टिस सूर्यकांत, जस्टिस जॉयमाल्या बागची और जस्टिस वी. मोहना की बेंच ने याचिका पर केंद्र सरकार, इलेक्ट्रॉनिक्स एवं सूचना प्रौद्योगिकी मंत्रालय, बार काउंसिल ऑफ इंडिया और सीबीआई को नोटिस जारी कर जवाब मांगा है।
मामले की अगली सुनवाई 10 सितंबर को होगी।
‘कॉकरोच’ टिप्पणी से जुड़ा विवाद
याचिका में 15 मई को सुप्रीम कोर्ट में हुई सुनवाई का हवाला दिया गया है।
इस दौरान चीफ जस्टिस सूर्यकांत की ओर से ‘कॉकरोच’ शब्द का इस्तेमाल किया गया था।
याचिका में आरोप है कि कोर्ट में हुई इस बातचीत को उसके मूल संदर्भ से अलग करके सोशल मीडिया पर फैलाया गया।
इसे मीम, वायरल कंटेंट और राजनीतिक प्रतीक के तौर पर इस्तेमाल किए जाने की बात भी याचिका में कही गई है।
याचिकाकर्ता का कहना है कि जजों की मौखिक टिप्पणियों को काट-छांटकर अलग अर्थ में पेश करने से कोर्ट में हुई असली बातचीत का मतलब बदल जाता है और लोगों तक कार्यवाही की सही तस्वीर नहीं पहुंचती।
याचिका में क्या मांग?
एडवोकेट राजा चौधरी ने सुप्रीम कोर्ट से उन लोगों और संस्थाओं की जांच की मांग की है, जो कोर्ट की मौखिक टिप्पणियों या सुनवाई से जुड़ी बातों का कथित तौर पर कारोबारी इस्तेमाल कर रहे हैं।
याचिका में कोर्ट की टिप्पणियों या उनसे जुड़े शब्दों को ट्रेडमार्क के तौर पर इस्तेमाल करने, उनसे कमाई करने या बिना अनुमति कारोबारी इस्तेमाल की भी जांच की मांग की गई है।
याचिकाकर्ता ने ‘कॉकरोच जनता पार्टी’ से जुड़ी गतिविधियों की जांच की मांग भी की है।
याचिका के मुताबिक, कोर्ट की मौखिक टिप्पणी के बाद सोशल मीडिया पर इससे जुड़ा एक व्यंग्यात्मक अभियान सामने आया और बाद में इसका इस्तेमाल अलग-अलग डिजिटल कंटेंट में किया गया।
आलोचना पर रोक नहीं
याचिका में साफ कहा गया है कि इसका मकसद न्यायपालिका की निष्पक्ष आलोचना, लोकतांत्रिक असहमति, व्यंग्य या अभिव्यक्ति की आजादी पर रोक लगाना नहीं है।
याचिकाकर्ता के मुताबिक, लोगों को कोर्ट के फैसलों और न्यायिक संस्थाओं की आलोचना करने का अधिकार है।
सवाल तब उठता है जब कोर्ट में कही गई बातों को संदर्भ से अलग करके उनका कारोबारी फायदा उठाया जाए।
याचिका में कहा गया है कि जजों की मौखिक टिप्पणियों का इस्तेमाल इस तरह नहीं होना चाहिए, जिससे न्यायपालिका की गरिमा या न्याय व्यवस्था में लोगों के भरोसे पर असर पड़े।
‘कॉकरोच’ टिप्पणी का क्या था संदर्भ?
याचिका में मई में हुई सुप्रीम कोर्ट की सुनवाई का हवाला दिया गया है। इसी सुनवाई के बाद ‘कॉकरोच जनता पार्टी’ नाम से एक ऑनलाइन अभियान सामने आया था।
याचिका के मुताबिक, चीफ जस्टिस ने उस सुनवाई के दौरान ऐसे युवाओं को लेकर ‘कॉकरोच’ शब्द का इस्तेमाल किया था, जो वकालत में काम नहीं मिलने के बाद सोशल मीडिया या आरटीआई एक्टिविज्म की ओर जा रहे थे।
बाद में चीफ जस्टिस ने अपनी टिप्पणी का संदर्भ साफ करते हुए कहा था कि उनकी बात फर्जी डिग्री या गलत योग्यता के आधार पर पेशे में आने वाले लोगों को लेकर थी, न कि बेरोजगार युवाओं को लेकर।
याचिकाकर्ता का आरोप है कि इसके बावजूद कोर्ट में कही गई कुछ बातों को संदर्भ से हटाकर सोशल मीडिया पर इस्तेमाल किया गया।
कोर्ट की टिप्पणियों से कमाई पर सवाल
याचिका में खास तौर पर कोर्ट की मौखिक टिप्पणियों के मॉनेटाइजेशन और कमर्शियल इस्तेमाल पर सवाल उठाया गया है।
याचिकाकर्ता ने मांग की है कि यह पता लगाया जाए कि कोई व्यक्ति या संस्था जजों की मौखिक टिप्पणियों, सांकेतिक बातों या कोर्ट की कार्यवाही से जुड़ी बातों का इस्तेमाल अपने कारोबारी फायदे के लिए तो नहीं कर रही है?
इसके अलावा, कोर्ट की टिप्पणियों या उनसे जुड़े शब्दों को ट्रेडमार्क बनाकर कारोबारी फायदा उठाने की कोशिश हुई है या नहीं?, इसकी भी जांच की मांग की गई है।
याचिका में ऐसे मामलों की जांच कर कानून के मुताबिक जरूरी कार्रवाई करने का निर्देश देने की मांग की गई है।
10 सितंबर को अगली सुनवाई
सुप्रीम कोर्ट ने केंद्र सरकार, इलेक्ट्रॉनिक्स एवं सूचना प्रौद्योगिकी मंत्रालय, बार काउंसिल ऑफ इंडिया और सीबीआई से जवाब मांगा है।
अब इन सभी के जवाब के बाद कोर्ट तय करेगा कि मामले में आगे क्या करना है।
मामले की अगली सुनवाई 10 सितंबर को होगी।
अब कोर्ट को यह देखना है कि जजों की मौखिक टिप्पणियों को संदर्भ से अलग करके सोशल मीडिया या कमाई के लिए इस्तेमाल किया जा सकता है या नहीं। याचिका में ऐसे इस्तेमाल की जांच और जरूरी कार्रवाई की मांग की गई है।
याचिका में कोर्ट की मौखिक टिप्पणियों के गलत इस्तेमाल का आरोप लगाया गया है। अब कोर्ट इस मामले में जांच और आगे की कार्रवाई को लेकर फैसला कर सकता है।