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सिर्फ पुराने केस होने से नहीं रुकेगी अग्रिम जमानत, सुप्रीम कोर्ट ने पलटा राजस्थान हाईकोर्ट का फैसला; जांच में सहयोग के आधार पर आरोपी को दी राहत

Supreme Court Grants Anticipatory Bail, Says Past Criminal Cases Alone Cannot Be Ground for Rejection

नई दिल्ली/जयपुर: राजस्थान के एक आपराधिक मामले की सुनवाई के दौरान सुप्रीम कोर्ट ने जांच में सहयोग को अहम आधार मानते हुए आरोपी को अग्रिम जमानत (एंटिसिपेटरी बेल) दे दी।

सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि आरोपी को पहले दी गई अंतरिम सुरक्षा अब जारी रहेगी।

साथ ही सुप्रीम कोर्ट ने राजस्थान हाईकोर्ट का वह आदेश भी रद्द कर दिया, जिसमें अग्रिम जमानत देने से इनकार किया गया था।

सुपम्री कोर्ट ने कहा कि किसी आरोपी के खिलाफ पहले से आपराधिक मामले दर्ज होना ही अग्रिम जमानत देने से इनकार करने का अकेला आधार नहीं हो सकता।

अगर आरोपी जांच में पूरा सहयोग कर रहा है और कोर्ट की शर्तों का पालन कर रहा है, तो उसे राहत दी जा सकती है।

सुप्रीम कोर्ट ने यही बात दोहराते हुए राजस्थान हाईकोर्ट का आदेश रद्द कर आरोपी को अग्रिम जमानत दे दी।

जस्टिस उज्जल भुइयां और जस्टिस अतुल एस. चांदुरकर की बेंच ने कहा कि आरोपी को पहले दी गई अंतरिम सुरक्षा के दौरान उसने जांच में पूरा सहयोग किया।

इस तथ्य का राजस्थान सरकार ने भी विरोध नहीं किया। ऐसे में सुप्रीम कोर्ट ने अंतरिम सुरक्षा को स्थायी राहत में बदल दिया।

हालांकि, सुप्रीम कोर्ट ने यह भी साफ कर दिया कि आरोपी को आगे भी जांच में पूरा सहयोग करना होगा।

कैसे पहुंचा मामला सुप्रीम कोर्ट?

यह मामला राजस्थान के श्रीगंगानगर जिले के लालगढ़ जाटान थाना क्षेत्र में दर्ज एक एफआईआर से जुड़ा है।

रणजीत सिंह उर्फ राजा के खिलाफ भारतीय न्याय संहिता की धाराओं 126(2), 115(2) और 189(2) के तहत मामला दर्ज किया गया था। आरोप था कि उसने शिकायतकर्ता को चोट पहुंचाई।

आरोपी ने गिरफ्तारी से बचने के लिए राजस्थान हाईकोर्ट में अग्रिम जमानत की याचिका दायर की थी। हालांकि, 23 मार्च 2026 को हाईकोर्ट ने उसकी याचिका खारिज कर दी।

इसके बाद उसने सुप्रीम कोर्ट में विशेष अनुमति याचिका दाखिल कर हाईकोर्ट के आदेश को चुनौती दी।

सुप्रीम कोर्ट ने 13 अप्रैल 2026 को मामले की शुरुआती सुनवाई के दौरान आरोपी को अंतरिम सुरक्षा देते हुए जांच में सहयोग करने का निर्देश दिया था। अंतिम सुनवाई में इसी पहलू को कोर्ट ने अहम माना।

राजस्थान सरकार ने किया विरोध

सुनवाई के दौरान राजस्थान सरकार ने अग्रिम जमानत का विरोध करते हुए कहा कि आरोपी के खिलाफ पहले से कई आपराधिक मामले दर्ज हैं।

सरकार का कहना था कि मौजूदा मामले में शिकायतकर्ता को चोट पहुंचाने का आरोप है, इसलिए आरोपी को अग्रिम जमानत नहीं दी जानी चाहिए।

शिकायतकर्ता की ओर से पेश वकील ने भी राज्य सरकार की दलील का समर्थन किया और कहा कि मामले की प्रकृति को देखते हुए आरोपी को राहत नहीं दी जानी चाहिए।

आरोपी की दलील

आरोपी की ओर से कहा गया कि जिन पुराने मामलों का हवाला दिया जा रहा है, उनमें एक मामले में वह पहले ही बरी हो चुका है।

बाकी मामलों में मुकदमे चल रहे हैं और उनमें उसे पहले से जमानत मिली हुई है।

वहीं, अवैध जुआ कानून से जुड़े एक मामले में उसे केवल जुर्माने की सजा हुई थी।

आरोपी ने यह भी कहा कि सुप्रीम कोर्ट से अंतरिम सुरक्षा मिलने के बाद से उसने जांच में पूरा सहयोग किया है और जांच एजेंसी के हर निर्देश का पालन किया है।

इस बात से राज्य सरकार ने भी इनकार नहीं किया।

हाईकोर्ट का आदेश रद्द

सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि रिकॉर्ड से साफ है कि अंतरिम सुरक्षा मिलने के बाद आरोपी लगातार जांच में सहयोग कर रहा है।

राज्य सरकार भी यह नहीं कह सकी कि उसने जांच में किसी तरह की बाधा डाली या कोर्ट की शर्तों का उल्लंघन किया।

इन्हीं परिस्थितियों को देखते हुए कोर्ट ने कहा कि पहले दी गई अंतरिम सुरक्षा को स्थायी किया जाना चाहिए।

इसके साथ ही सुप्रीम कोर्ट ने राजस्थान हाईकोर्ट का आदेश रद्द कर आरोपी को अग्रिम जमानत दे दी।

राहत के साथ शर्तें लगाईं

सुप्रीम कोर्ट ने साफ किया कि अग्रिम जमानत का मतलब यह नहीं है कि आरोपी को पूरी छूट मिल गई है।

उसे आगे भी जांच में पूरा सहयोग करना होगा और जांच एजेंसी के बुलाने पर उपस्थित होना पड़ेगा।

सुप्रीम कोर्ट ने यह भी कहा कि अगर आरोपी गवाहों को प्रभावित करने की कोशिश करता है, सबूतों से छेड़छाड़ करता है या जांच में सहयोग नहीं करता, तो राजस्थान सरकार उसकी अग्रिम जमानत रद्द कराने के लिए आवेदन दे सकती है।

सुप्रीम कोर्ट ने साफ कर दिया कि अग्रिम जमानत पर फैसला करते समय केवल पुराने आपराधिक मामलों को ही आधार नहीं बनाया जा सकता।

कोर्ट यह भी देखती है कि आरोपी का मौजूदा आचरण कैसा है, वह जांच में सहयोग कर रहा है या नहीं और क्या उसने कोर्ट से मिली राहत का सही इस्तेमाल किया है।

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