राजस्थान हाईकोर्ट ने सरकारी कर्मचारियों—अधिकारियों के खिलाफ दर्ज अपराधिक मुकदमों के मामले में एक ऐतिहासिक फैसला सुनाया हैं. जस्टिस आनंद शर्मा की एकलपीठ ने स्पष्ट किया हैं कि अगर कोई सरकारी कर्मचारी किसी अपराध में बरी हो जाता है तो उस कर्मचारी को जेल में बिताई गई अवधि का वेतन और समस्त परिलाभ देय होंगे.
रेप के आरोपी कांस्टेबल हरभजन सिंह की ओर से दायर याचिका पर सुनवाई करते हुए हाईकोर्ट ने यह आदेश दिया हैं.
राजस्थान हाईकोर्ट ने दुष्कर्म और एससी-एसटी एक्ट के मामले से बरी होने पर पुलिस कांस्टेबल हरभजन सिंह को उसके द्वारा जेल में न्यायिक अभिरक्षा में बिताए गए करीब 2 साल का वेतन और समस्त परिलाभ देने का आदेश दिया.
हाईकोर्ट ने पुलिस विभाग के उस आदेश को भी रद्द कर दिया हैं जिसके जरिए जेल में बिताई अवधि का अवैतनिक अवकाश माना था.
आरोपी पुलिस कॉन्स्टेबल को 21 अगस्त 2000 को रेप के आरोप में गिरफ्तार किया गया था. गिरफतारी के साथ ही पुलिस विभाग ने कांस्टेबल को निलबित भी कर दिया.
इस मामले में ट्रायल कोर्ट ने सभी पक्षों को सुनने के बाद 1 अगस्त 2002 को आरोपी कांस्टेबल को बरी कर दिया था.
बरी होने के आधार पर विभाग ने कांस्टेबल को 11 सितम्बर 2002 का निलंबन रद्द करते हुए उसे शामिल किया.
लेकिन विभाग ने कांस्टेबल द्वारा जेल में बितायी गई अवधि 21 अगस्त 2000 से 1 अगस्त 2002 तक की अवधि को उसे अनुपस्थित मानते हुए अवैतनिक अवकाश के रूप में शामिल किया.
कांस्टेबल ने विभाग के इस आदेश को चुनौति देते हुए राजस्थान हाईकोर्ट में याचिका दायर की. जिस पर सुनवाई करते हुए राजस्थान हाईकोर्ट ने आदेश दिया है कि याचिकाकर्ता ने हाईकोर्ट में चुनौती दी।