नई दिल्ली: सुप्रीम कोर्ट ने आपराधिक मामलों में अप्रूवर यानी सहयोगी आरोपी की गवाही के महत्व को लेकर महत्वपूर्ण फैसला सुनाते हुए कानून की स्थिति स्पष्ट की है।
आपराधिक मामलों में अक्सर यह सवाल उठता है कि क्या किसी सहयोगी आरोपी (अप्रूवर) की गवाही के आधार पर किसी व्यक्ति को दोषी ठहराया जा सकता है।
सुप्रीम कोर्ट ने इस महत्वपूर्ण कानूनी मुद्दे पर स्पष्टता देते हुए कहा है कि अप्रूवर की गवाही को केवल इस आधार पर खारिज नहीं किया जा सकता कि उसके हर कथन की स्वतंत्र पुष्टि नहीं हुई है।
यदि अदालत को उसका बयान विश्वसनीय और भरोसेमंद लगता है, तो उस पर दोषसिद्धि आधारित की जा सकती है।
सुप्रीम कोर्ट ने यह टिप्पणी 1984 के एक चर्चित डबल मर्डर और ट्रक लूटकांड मामले में की, जिसमें दिल्ली हाईकोर्ट द्वारा बरकरार रखी गई दोषसिद्धि को चुनौती दी गई थी।
जस्टिस पी.एस. नरसिम्हा और जस्टिस मनोज मिश्रा की पीठ ने कहा कि भारतीय साक्ष्य अधिनियम की धारा 133 के अनुसार सहयोगी आरोपी की अपुष्ट गवाही भी दोषसिद्धि का आधार बन सकती है। हालांकि अदालतों को सावधानी बरतनी चाहिए और सामान्यतः ऐसे बयानों को प्रत्यक्ष या परिस्थितिजन्य साक्ष्यों से पुष्ट करने की कोशिश करनी चाहिए।
कोर्ट ने कहा कि
कानून में अप्रूवर की गवाही के पुष्टिकरण का सिद्धांत सावधानी (रूल ऑफ प्रूडेंस) का नियम है, न कि ऐसा अनिवार्य कानूनी नियम जिसके बिना दोषसिद्धि असंभव हो जाए।
हालांकि, अदालत ने यह भी स्पष्ट किया कि ऐसे मामलों में न्यायालय को विशेष सतर्कता बरतनी होगी और यह सुनिश्चित करना होगा कि गवाही स्वाभाविक, विश्वसनीय और परिस्थितियों से मेल खाने वाली हो।
42 साल पुराने डबल मर्डर केस से जुड़ा मामला
यह मामला जुलाई 1984 का है। उस समय दिल्ली में दो अलग-अलग स्थानों पर दो शव बरामद हुए थे। जांच में पता चला कि मृतक अरुण कुमार और जसबीर एक ट्रक के ड्राइवर और क्लीनर थे।
अभियोजन के अनुसार कुछ लोगों ने ट्रक लूटने की साजिश रची और उसी योजना के तहत दोनों की हत्या कर दी गई।
जांच में सामने आया कि ट्रक को कथित रूप से माल ढुलाई के बहाने किराये पर लिया गया था। बाद में ड्राइवर और क्लीनर को अलग-अलग स्थानों पर ले जाकर मार डाला गया और ट्रक लूट लिया गया।
पुलिस ने कई आरोपियों को गिरफ्तार किया। इनमें से एक आरोपी अशोक कुमार बाद में सरकारी गवाह यानी अप्रूवर बन गया और उसने पूरी साजिश तथा घटनाक्रम का विस्तृत विवरण अदालत के सामने रखा।
इसी गवाही के आधार पर अन्य आरोपियों के खिलाफ मुकदमा आगे बढ़ा और निचली अदालत ने उन्हें दोषी ठहराया। बाद में हाईकोर्ट ने भी इस फैसले को बरकरार रखा।
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आरोपी ने सुप्रीम कोर्ट में क्या दलील दी?
सुप्रीम कोर्ट में अपील करने वाले आरोपी गोपी चंद उर्फ पप्पू की ओर से कहा गया कि पूरे मामले की नींव एक अप्रूवर की गवाही पर टिकी हुई है। ऐसे में केवल उसी के बयान के आधार पर दोषसिद्धि नहीं की जा सकती।
आरोपी की ओर से यह भी तर्क दिया गया कि अशोक कुमार का बयान स्वयं को बचाने वाला था। उसने अपने ऊपर कम और अन्य आरोपियों पर अधिक दोष मढ़ने की कोशिश की।
इसलिए उसकी गवाही पर भरोसा नहीं किया जा सकता। साथ ही यह भी कहा गया कि उसके बयान की पर्याप्त स्वतंत्र पुष्टि नहीं हुई है, इसलिए दोषसिद्धि टिक नहीं सकती।
अप्रूवर की गवाही पर कानून क्या कहता है?
न्यायमूर्ति पी.एस. नरसिम्हा और न्यायमूर्ति मनोज मिश्रा की पीठ ने भारतीय साक्ष्य अधिनियम और पूर्व के कई फैसलों का उल्लेख करते हुए कानून की स्थिति स्पष्ट की।
कोर्ट ने कहा कि भारतीय साक्ष्य अधिनियम की धारा 133 के अनुसार अप्रूवर एक सक्षम गवाह होता है और केवल इस आधार पर दोषसिद्धि अवैध नहीं हो जाती कि वह बिना पुष्टिकरण वाली गवाही पर आधारित है।
हालांकि धारा 114 के इलस्ट्रेशन (b) के तहत न्यायालय सामान्यतः सावधानी बरतता है और स्वतंत्र पुष्टिकरण की तलाश करता है।
पीठ ने कहा कि यह कोई कठोर कानूनी बाध्यता नहीं है बल्कि न्यायिक विवेक और सावधानी का सिद्धांत है। यदि अदालत को किसी मामले में अप्रूवर का बयान पूरी तरह विश्वसनीय प्रतीत होता है, तो केवल पुष्टिकरण के अभाव में उसे अस्वीकार नहीं किया जा सकता।
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हर तथ्य का अलग-अलग सबूत जरूरी नहीं:सुप्रीम कोर्ट
सुप्रीम कोर्ट ने यह भी स्पष्ट किया कि यदि किसी मामले में अप्रूवर की गवाही का समर्थन करने वाले साक्ष्य मौजूद हों, तो कानून यह नहीं कहता कि उसके हर कथन या हर परिस्थिति का अलग-अलग स्वतंत्र प्रमाण प्रस्तुत किया जाए।
कोर्ट के अनुसार पुष्टिकरण का उद्देश्य केवल यह सुनिश्चित करना है कि गवाही काल्पनिक या मनगढ़ंत नहीं है। यदि उपलब्ध परिस्थितिजन्य या प्रत्यक्ष साक्ष्य गवाही को विश्वसनीय बनाते हैं, तो उसे स्वीकार किया जा सकता है।
पीठ ने कहा कि कई बार पुष्टिकरण प्रत्यक्ष साक्ष्य के बजाय परिस्थितिजन्य साक्ष्यों से भी मिल सकता है और यह पर्याप्त माना जाएगा।
क्या अप्रूवर खुद को बचा रहा था?
सुप्रीम कोर्ट ने इस पहलू की भी विस्तार से जांच की। कोर्ट ने अशोक कुमार की गवाही का विश्लेषण करते हुए कहा कि उसका बयान पूरी तरह स्वयं को बचाने वाला नहीं था।
पीठ ने पाया कि उसने यह स्वीकार किया था कि वह ट्रक चोरी की योजना का हिस्सा था। उसने यह भी स्वीकार किया कि वह घटनास्थल पर मौजूद था और अपराध के दौरान उसकी भूमिका रही थी।
उसने अपने बयान में यह तक कहा कि उसने एक पीड़ित को काबू में करने में मदद की थी ताकि ट्रक पर कब्जा किया जा सके।
कोर्ट ने कहा कि यदि कोई व्यक्ति स्वयं को पूरी तरह निर्दोष बताकर केवल दूसरों पर आरोप लगाता है, तो उसकी विश्वसनीयता पर प्रश्न उठ सकता है।
लेकिन इस मामले में अशोक कुमार ने अपनी संलिप्तता स्वीकार की थी। इसलिए केवल इस आधार पर उसकी गवाही को खारिज नहीं किया जा सकता कि वह अप्रूवर है।
किन साक्ष्यों से मिली गवाही को मजबूती?
सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि अशोक कुमार की कहानी को कई स्वतंत्र परिस्थितिजन्य साक्ष्यों से समर्थन मिला।
जांच में लूटा गया ट्रक बरामद हुआ। मृतकों की पहचान स्थापित हुई। पोस्टमार्टम रिपोर्ट ने हत्या की पुष्टि की। घटनास्थलों से मिले दस्तावेज और अन्य वस्तुएं अप्रूवर द्वारा बताए गए घटनाक्रम से मेल खाती थीं।
इसके अलावा शवों की बरामदगी के स्थान और परिस्थितियां भी उसकी गवाही के अनुरूप थीं।
कोर्ट ने कहा कि ये सभी तथ्य मिलकर यह दर्शाते हैं कि अप्रूवर द्वारा सुनाई गई कहानी वास्तविक घटनाओं से मेल खाती है। इसलिए उसकी गवाही को अविश्वसनीय नहीं कहा जा सकता।
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साजिश और हत्या में भूमिका पर कोर्ट की टिप्पणी
मामले में एक अन्य महत्वपूर्ण सवाल यह था कि क्या गोपी चंद को हत्या की साजिश का हिस्सा माना जा सकता है, जबकि उसने स्वयं हत्या नहीं की थी।
सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि आपराधिक साजिश के मामलों में केवल यह देखना पर्याप्त नहीं है कि अंतिम वार किसने किया। यदि कोई व्यक्ति अपराध की पूर्व योजना का हिस्सा था और उसे अपराध के संभावित परिणामों की जानकारी थी, तो वह भी साजिश के लिए जिम्मेदार ठहराया जा सकता है।
पीठ ने कहा कि ट्रक लूटने की योजना के तहत ड्राइवर और क्लीनर को अलग-अलग स्थानों पर ले जाया गया, हथियार साथ रखे गए और पूरी कार्रवाई योजनाबद्ध तरीके से की गई। ऐसे में हत्या इस योजना का अनुमानित परिणाम थी। इसलिए गोपी चंद को साजिश से अलग नहीं माना जा सकता।
दोषसिद्धि बरकरार, लेकिन सजा में राहत
सुप्रीम कोर्ट ने अंततः आरोपी की दोषसिद्धि को बरकरार रखा और कहा कि निचली अदालत तथा हाईकोर्ट के निष्कर्षों में हस्तक्षेप का कोई कारण नहीं है।
हालांकि सजा के प्रश्न पर कोर्ट ने अलग दृष्टिकोण अपनाया। कोर्ट ने ध्यान दिलाया कि यह घटना 1984 की है और आरोपी पहले ही 18 वर्ष से अधिक समय जेल में बिता चुका है। साथ ही उसके सह-अभियुक्तों को भी राज्य की नीति के तहत रिमिशन का लाभ मिल चुका था।
इन विशेष परिस्थितियों को देखते हुए अदालत ने आजीवन कारावास की सजा को पहले से भुगती गई अवधि तक सीमित कर दिया और आरोपी की रिहाई का आदेश दिया। हालांकि कोर्ट ने स्पष्ट किया कि दोषसिद्धि यथावत बनी रहेगी।
क्यों अहम है यह फैसला ?
यह फैसला कई मायनों में महत्वपूर्ण है। यह स्पष्ट करता है कि अदालतें केवल तकनीकी आधार पर गवाही को खारिज नहीं करेंगी। इससे जांच एजेंसियों को मजबूती मिलती है, खासकर उन मामलों में जहां प्रत्यक्ष साक्ष्य कम होते हैं। साथी ही यह फैसला न्यायालयों को अधिक विवेकपूर्ण निर्णय लेने की स्वतंत्रता देता है।
इस फैसले के जरिए सुप्रीम कोर्ट ने दो महत्वपूर्ण सिद्धांत दोहराए हैं। पहला, अप्रूवर की गवाही को केवल इसलिए खारिज नहीं किया जा सकता कि वह अपराध में शामिल रहा है। दूसरा, पुष्टिकरण का सिद्धांत महत्वपूर्ण जरूर है, लेकिन यह कोई ऐसा कठोर नियम नहीं है जो हर मामले में अनिवार्य रूप से लागू हो।
यदि गवाही स्वाभाविक, भरोसेमंद और उपलब्ध साक्ष्यों से मेल खाती हो, तो वह दोषसिद्धि का आधार बन सकती है। वहीं अदालतों को यह भी सुनिश्चित करना होगा कि किसी व्यक्ति को केवल कमजोर या संदिग्ध अप्रूवर गवाही के आधार पर दोषी न ठहरा दिया जाए। यही संतुलन आपराधिक न्याय व्यवस्था की निष्पक्षता का मूल आधार है।