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उदयपुर की झीलों पर मंडराते खतरे पर राजस्थान हाईकोर्ट ने लिया स्वत: संज्ञान, अतिक्रमण और प्रदूषण से बिगड़ते हालत पर सरकार से मांगा जवाब

Rajasthan High Court Takes Suo Motu Cognisance Of Threats To Udaipur Lakes, Seeks Government Response

जोधपुर: राजस्थान हाईकोर्ट ने उदयपुर की झीलों, नहरों और अन्य जल निकायों पर बढ़ते पर्यावरणीय दबाव को गंभीरता से लेते हुए स्वत: संज्ञान लिया है।

हाईकोर्ट ने कहा कि उदयपुर की झीलें केवल शहर की सुंदरता और पर्यटन का केंद्र नहीं हैं, बल्कि जल सुरक्षा, ग्राउंडवाटर रिचार्ज (ग्राउंडवाटर रिचार्ज), जैव विविधता संरक्षण और पर्यावरणीय संतुलन की महत्वपूर्ण आधारशिला हैं।

ऐसे में अतिक्रमण, प्रदूषण, सीवेज बहाव और अनियंत्रित शहरी विकास के कारण इन जल स्रोतों को नुकसान पहुंचने देना स्वीकार नहीं किया जा सकता।

डॉ. जस्टिस पुष्पेंद्र सिंह भाटी और जस्टिस रेखा बोराना की खंडपीठ ने विभिन्न समाचार रिपोर्टों के आधार पर स्वत: संज्ञान लेते हुए राज्य सरकार और संबंधित विभागों से विस्तृत रिपोर्ट तलब की है।

अदालत ने मामले को जनहित और पर्यावरणीय संरक्षण से जुड़ा गंभीर विषय बताते हुए कहा कि उदयपुर की झीलों का संरक्षण केवल स्थानीय जरूरत नहीं, बल्कि भविष्य की जल सुरक्षा से जुड़ा प्रश्न है।

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समाचार रिपोर्टों ने खींचा अदालत का ध्यान

हाईकोर्ट ने विभिन्न समाचार पत्रों और स्थानीय मीडिया में प्रकाशित रिपोर्टों का उल्लेख करते हुए कहा कि उदयपुर की झीलों और जल निकायों के सामने कई गंभीर चुनौतियां खड़ी हो गई हैं।

इन रिपोर्टों में झील क्षेत्रों में अतिक्रमण, झीलों की सीमाओं को लेकर विवाद, जल निकायों का क्षरण, नहरों की खराब स्थिति, पर्यावरणीय रूप से संवेदनशील क्षेत्रों के आसपास निर्माण गतिविधियों और जल संसाधनों के कमजोर प्रबंधन का उल्लेख किया गया था।

हाइकोर्ट ने माना कि ये केवल अलग-अलग घटनाएं नहीं हैं, बल्कि पूरे झील तंत्र और उससे जुड़े पारिस्थितिक ढांचे के लिए खतरे का संकेत हैं।

कोर्ट ने कहा कि यदि समय रहते प्रभावी कदम नहीं उठाए गए तो आने वाले वर्षों में इन जल स्रोतों को गंभीर नुकसान हो सकता है।

झीलें सिर्फ पर्यटन नहीं, जीवन और पर्यावरण की आधारशिला

फैसले की शुरुआत में अदालत ने कवि एवं विद्वान जयकृष्ण चौधरी ‘हबीब’ की प्रसिद्ध रचना “उदयपुर” का उल्लेख किया, जिसमें शहर की झीलों की सुंदरता का वर्णन करते हुए उदयपुर को “रश्क-ए-फिरदौस-ए-जमाना” कहा गया है।

कोर्ट ने कहा कि उदयपुर की पहचान सदियों से झीलों के शहर के रूप में रही है।

पिचोला, फतहसागर, स्वरूप सागर, रंग सागर, गोवर्धन सागर, बड़ी झील और अन्य जल निकाय केवल पर्यटन स्थलों की श्रेणी में नहीं आते, बल्कि ये पूरे क्षेत्र की पर्यावरणीय और सामाजिक संरचना का हिस्सा हैं।

हाईकोर्ट ने कहा कि ये जल निकाय ग्राउंडवाटर रिचार्ज, जल संरक्षण, बाढ़ नियंत्रण, जैव विविधता संरक्षण, जल शुद्धिकरण और जलवायु संतुलन बनाए रखने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं।

राजस्थान जैसे जल संकट झेलने वाले राज्य में इनकी उपयोगिता और भी अधिक बढ़ जाती है।

संविधान और पर्यावरणीय जिम्मेदारी का हवाला

हाईकोर्ट ने अपने आदेश में संविधान के अनुच्छेद 21 का उल्लेख करते हुए कहा कि स्वच्छ और स्वस्थ पर्यावरण नागरिकों के जीवन के अधिकार का हिस्सा है।

इसके साथ ही अदालत ने अनुच्छेद 48A और अनुच्छेद 51A(g) का भी हवाला दिया, जो पर्यावरण संरक्षण को राज्य और नागरिकों दोनों का दायित्व बताते हैं।

कोर्ट ने ‘पब्लिक ट्रस्ट डॉक्ट्रिन’ का उल्लेख करते हुए कहा कि प्राकृतिक संसाधन जनता की सामूहिक संपत्ति हैं और सरकार उनकी संरक्षक मात्र है। इसलिए सरकार और स्थानीय प्रशासन की जिम्मेदारी है कि वे झीलों और जल निकायों को अतिक्रमण, प्रदूषण और अवैध गतिविधियों से सुरक्षित रखें।

कोर्ट ने कहा कि प्राकृतिक संसाधनों के क्षरण को किसी भी स्थिति में नजरअंदाज नहीं किया जा सकता, विशेष रूप से उन क्षेत्रों में जहां पानी पहले से ही एक मूल्यवान और सीमित संसाधन है।

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विकास जरूरी, लेकिन पर्यावरण की कीमत पर नहीं

सुनवाई के दौरान अदालत ने यह भी माना कि विकास गतिविधियां, शहरी विस्तार और पर्यटन आर्थिक दृष्टि से महत्वपूर्ण हैं। हालांकि कोर्ट ने स्पष्ट किया कि विकास और पर्यावरण संरक्षण के बीच संतुलन बनाए रखना आवश्यक है।

कोर्ट ने कहा कि उदयपुर जैसे शहरों में पर्यटन और रियल एस्टेट गतिविधियों के विस्तार के दौरान पर्यावरणीय सुरक्षा उपायों, अपशिष्ट प्रबंधन, झीलों की वहन क्षमता (कैरिंग कैपेसिटी) और दीर्घकालिक स्थिरता को ध्यान में रखना अनिवार्य है।

कोर्ट ने टिप्पणी की कि आर्थिक विकास के नाम पर झीलों और जल निकायों को नुकसान पहुंचाने वाली गतिविधियों को स्वीकार नहीं किया जा सकता। किसी भी विकास परियोजना को पर्यावरणीय नियमों और संरक्षण मानकों के अनुरूप होना चाहिए।

सरकार से मांगी झीलों की पूरी स्थिति रिपोर्ट

मामले की गंभीरता को देखते हुए हाईकोर्ट ने राज्य सरकार, स्थानीय निकायों और संबंधित विभागों को विस्तृत रिपोर्ट प्रस्तुत करने का निर्देश दिया है।

कोर्ट ने प्रमुख झीलों, जल निकायों और नहरों की वर्तमान स्थिति, उनके क्षेत्रफल, जल गुणवत्ता, सीमांकन, सीमा विवाद, अतिक्रमण, अवैध निर्माण, सीवेज और अन्य अपशिष्ट जल के बहाव से जुड़ी जानकारी मांगी है।

इसके अलावा पिछले पांच वर्षों में संरक्षण और रखरखाव के लिए आवंटित तथा खर्च किए गए बजट का ब्योरा भी प्रस्तुत करने को कहा गया है। कोर्ट ने यह भी निर्देश दिया कि झीलों के संरक्षण के लिए अल्पकालिक, मध्यम अवधि और दीर्घकालिक कार्ययोजना तैयार कर प्रस्तुत की जाए।

कोर्ट ने यह स्पष्ट किया कि केवल आंकड़े देने से काम नहीं चलेगा, बल्कि विभागों को यह भी बताना होगा कि झीलों को बचाने के लिए अब तक क्या कदम उठाए गए हैं और भविष्य में क्या किया जाएगा।

सभी प्रमुख झीलों के निरीक्षण के आदेश

हाईकोर्ट ने पिचोला झील, फतहसागर झील, स्वरूप सागर झील, रंग सागर झील, रूप सागर तालाब, दूध तलाई, गोवर्धन सागर झील, बड़ी झील (जियान सागर), उदय सागर झील, मदार झील, बड़ा मदार, छोटा मदार और कुम्हारिया तालाब सहित अन्य जुड़े हुए जल निकायों का निरीक्षण करने का निर्देश दिया है।

कोर्ट ने कहा कि संबंधित एजेंसियां इन जल निकायों की वर्तमान पारिस्थितिक स्थिति, जल गुणवत्ता, कैचमेंट क्षेत्र की दशा, अतिक्रमण की स्थिति और संरक्षण संबंधी आवश्यकताओं का आकलन करें।

इसके साथ ही कोर्ट ने यह भी सुनिश्चित करने को कहा कि किसी भी झील में बिना उपचारित सीवेज, औद्योगिक अपशिष्ट या अन्य गंदे पानी का प्रवाह न हो। प्रदूषण के स्रोतों की पहचान कर उनके खिलाफ कार्रवाई की जाए और जल गुणवत्ता की नियमित निगरानी सुनिश्चित की जाए।

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झीलों की मौजूदा स्थिति में बदलाव नहीं होगा

अंतरिम राहत के रूप में हाईकोर्ट ने निर्देश दिया कि प्रमुख झीलों और जल निकायों की मौजूदा भौतिक स्थिति और क्षेत्रफल को बनाए रखा जाए। कोर्ट ने कहा कि अगली सुनवाई तक किसी भी प्रकार का नया अतिक्रमण, अवैध निर्माण या ऐसा कोई कदम नहीं उठाया जाए जिससे झीलों के स्वरूप में बदलाव आए।

हालांकि अदालत ने यह स्पष्ट किया कि यदि किसी क्षेत्र में कानून के अनुसार संरक्षण या पुनर्स्थापन (रेस्टोरेशन) का कार्य चल रहा है, तो उस पर रोक नहीं होगी।

कोर्ट का मानना है कि मामले के अंतिम निष्कर्ष तक यथास्थिति बनाए रखना झीलों और जल निकायों के हित में आवश्यक है।

13 जुलाई को होगी अगली सुनवाई

राजस्थान हाईकोर्ट ने मामले को “उदयपुर में झीलों और जल निकायों के संरक्षण” से जुड़े व्यापक जनहित के मुद्दे के रूप में दर्ज किया है। अदालत ने सभी संबंधित विभागों को समयबद्ध तरीके से रिपोर्ट दाखिल करने के निर्देश दिए हैं।

अब इस मामले की अगली सुनवाई 13 जुलाई 2026 को होगी।

उस दिन अदालत विभागों द्वारा प्रस्तुत रिपोर्टों, संरक्षण योजनाओं और झीलों की वर्तमान स्थिति की समीक्षा करेगी। साथ ही यह भी देखा जाएगा कि झीलों को अतिक्रमण, प्रदूषण और अवैध गतिविधियों से बचाने के लिए प्रशासन ने अब तक क्या कदम उठाए हैं।

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