टॉप स्टोरी

चर्चित खबरें

देश का 99% सोशल मीडिया डेटा भारत में नहीं, “हमारा डेटा कहां-कहां है हमें खुद नहीं पता”- जस्टिस पुष्पेंद्र सिंह भाटी

99% of Social Media Data Not in India, We Don’t Even Know Where Our Data Is: Justice Pushpendra Singh Bhati Warns at Cyber Security Conference

साइबर सुरक्षा सम्मेलन में डेटा संप्रभुता पर उठाए गंभीर सवाल, निजता को मानव गरिमा से जोड़ते हुए मजबूत कानूनी सुरक्षा की मांग।

जयपुर, 22 फरवरी। साइबर सुरक्षा पर आयोजित तीन दिवसीय राष्ट्रीय सम्मेलन में संबोधित करते हुए Justice Pushpendra Singh Bhati ने साफ शब्दों में चेताया-“हमने एक साल में करोड़ों नए इंटरनेट यूजर्स जोड़े हैं। आप अंदाज़ा लगा सकते हैं कि हम कितनी तेज़ी से डिजिटल भविष्य की ओर बढ़ रहे हैं। लेकिन सवाल है—क्या हमारी निजता और गरिमा भी उतनी ही सुरक्षित है?”

जस्टिस भाटी ने कहा कि आज हमारा डेटा कहां-कहां है-हमें खुद नहीं पता।

उन्होंने कॉन्फ्रेंस हॉल में बैठे हाईकोर्ट जजों से लेकर प्रदेशभर के 500 से अधिक जजों से कहा कि हम सब जो डेटा उपयोग कर रहे हैं, उसका अधिकांश भारत में नहीं है। उन्होने कहा

“मैं दावे के साथ कह सकता हूं कि सोशल मीडिया पर इस्तेमाल हो रहा 99% डेटा हमारे पास नहीं है।”

जस्टिस भाटी ने कहा कि डेटा प्राइवेसी को अब सीधे “ह्यूमन डिग्निटी” से जोड़ा जाना चाहिए। “हर व्यक्ति की अपनी निजता है, उसकी अपनी गरिमा है-और वह कहीं भी, किसी भी कीमत पर समझौता नहीं होनी चाहिए।”

डेटा की सीमाएं टूटीं, नियंत्रण की चुनौती बढ़ी

जस्टिस पुष्पेंद्र सिंह भाटी रविवार को राज्य विधिक सेवा प्राधिकरण की तीन दिवसीय साइबर सुरक्षा राष्ट्रीय कॉन्फ्रेंस के चौथे सत्र को संबोधित कर रहे थे।

कॉन्फ्रेंस के सत्र को संबोधित करते हुए जस्टिस पुष्पेंद्र सिंह भाटी ने कहा कि 70 वर्षों तक हमें निजता के अधिकार की उतनी तीव्र आवश्यकता इसलिए महसूस नहीं हुई, क्योंकि डेटा घर, अस्पताल, स्कूल या दफ्तर की फाइलों तक सीमित था। वह राष्ट्रीय या अंतरराष्ट्रीय सीमाएं पार नहीं करता था।

उन्होंने आगाह किया कि डेटा अब एक ‘कमोडिटी’ की तरह सीमाओं के पार जा रहा है और विश्व की बड़ी कंपनियों के सर्वरों में केंद्रित हो रहा है। ऐसे में कानून और शासन व्यवस्था को तकनीक से एक कदम आगे रहना होगा।

निजता का संवैधानिक सफर: एमपी शर्मा से पुट्टस्वामी तक

अपने भाषण में जस्टिस भाटी ने निजता के अधिकार की संवैधानिक यात्रा को भी रेखांकित किया।

उन्होंने बताया कि शुरुआती फैसलों-जैसे M.P. Sharma v. Satish Chandra और Kharak Singh v. State of Uttar Pradesh-में सर्वोच्च न्यायालय ने निजता को मौलिक अधिकार के रूप में स्वीकार नहीं किया था।

1975 में Gobind v. State of Madhya Pradesh में पहली बार एक “उम्मीद की किरण” दिखी, जहां अदालत ने संकेत दिया कि निजता संवैधानिक अधिकार हो सकती है।

लेकिन निर्णायक मोड़ आया 2017 में Justice K.S. Puttaswamy (Retd.) v. Union of India फैसले के साथ, जब नौ-न्यायाधीशीय पीठ ने सर्वसम्मति से निजता को मौलिक अधिकार घोषित कर दिया।

“पुट्टस्वामी ने हमें सिखाया कि व्यक्ति को अपने डेटा पर नियंत्रण का अधिकार है। उसके चारों ओर एक संवैधानिक सुरक्षा कवच होना चाहिए,” जस्टिस भाटी ने कहा।

डेटा प्रोटेक्शन कानून: वापसी के बाद मजबूत वापसी

उन्होंने बताया कि डेटा सुरक्षा कानून बनाने की प्रक्रिया आसान नहीं थी। श्रीकृष्ण समिति की सिफारिशों से शुरू हुई यह यात्रा कई संसदीय बहसों और संशोधनों से गुजरी। एक समय ऐसा भी आया जब मसौदा वापस लेना पड़ा और अंतरराष्ट्रीय स्तर पर यह सुर्खियां बनीं कि भारत डेटा प्रोटेक्शन कानून वापस ले आया।

“हमने हार नहीं मानी थी, हम उसे और बेहतर बनाना चाहते थे,” उन्होंने स्पष्ट किया।

आखिरकार 2023 में संसद ने Digital Personal Data Protection Act, 2023 पारित किया, जो अब देश में पूर्ण रूप से लागू है।

पहली बार स्पष्ट परिभाषाएं

जस्टिस भाटी ने बताया कि इस कानून ने पहली बार “पर्सनल डेटा”, “डेटा प्रिंसिपल”, “डेटा फिड्युशियरी” और “सिग्निफिकेंट डेटा फिड्युशियरी” जैसी स्पष्ट परिभाषाएं दीं।

धारा 11 के तहत डेटा प्रिंसिपल को अपने डेटा की प्रोसेसिंग संबंधी जानकारी पाने का प्रवर्तनीय अधिकार मिला है। वहीं धारा 8 डेटा फिड्युशियरी पर डेटा की सटीकता, पूर्णता और सुरक्षा सुनिश्चित करने का दायित्व डालती है।

धारा 7 पर ‘संवैधानिक तनाव’

हालांकि, उन्होंने माना कि धारा 7-जो राज्य को कुछ वैध उद्देश्यों के लिए बिना सहमति डेटा प्रोसेस करने की अनुमति देती है-आगे चलकर संवैधानिक बहस का विषय बन सकती है।

“राष्ट्रीय सुरक्षा, सेवा वितरण और कानूनी दायित्वों के लिए यह प्रावधान जरूरी है। लेकिन हमें सावधान रहना होगा कि हम उस पुराने दौर में वापस न लौट जाएं, जहां फोन टैपिंग और डेटा केयरलेस ट्रांसफर आम बात थी,” उन्होंने चेताया।

भविष्य की चेतावनी

जस्टिस भाटी ने स्पष्ट किया कि डेटा नियंत्रण और निजता का प्रश्न अभी अपने प्रारंभिक चरण में है। “ये कानून अभी नेसेंट स्टेज पर हैं। बदलाव बहुत तेजी से आएगा। युवा पीढ़ी को इस यात्रा को आगे बढ़ाना होगा।”

जस्टिस भाटी ने कहा, “डिजिटल क्रांति अपरिहार्य है, लेकिन निजता और गरिमा की कीमत पर नहीं।”

सबसे अधिक लोकप्रिय