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एकलपीठ रिट याचिका मे अनुतोष से बाहर जाकर PIL का क्षेत्राधिकार exercise नहीं कर सकती, विशेषकर जब उस प्रकार की मांग याचिका में नहीं की गई: Rajasthan Highcourt

Rajasthan High Court Sets Aside Single Bench Orders, Rules Courts Cannot Exercise PIL Jurisdiction Beyond Scope of Writ Petition

याचिका में PIL जैसा रुख अपनाने पर हाईकोर्ट की टिप्पणी, सिंगल बेंच की कार्रवाई पर रोक, FIR दर्ज करने का आदेश रद्द

जयपुर। Rajasthan Highcourt जयपुर पीठ की खंडपीठ ने गांधी नगर स्थित सरकारी आवासों के दुरुपयोग, अवैध कब्जे और कथित रूप से न्यायिक आदेशों की अवहेलना से जुड़े मामले में दिए गए एकलपीठ के आदेशों को अधिकार क्षेत्र से बाहर बताया है।

Rajasthan Highcourt की खंडपीठ ने एक समाप्त हो चुकी याचिका में PIL जैसा रुख अपनाने पर एकलपीठ द्वारा दिए गए आदेशों-जिनमें एफआईआर दर्ज करने और जमानती वारंट जारी करने के आदेश शामिल थे—को अधिकार क्षेत्र से परे मानते हुए रद्द कर दिया है।

खंडपीठ ने न्यायिक अनुशासन और अधिकार क्षेत्र की सीमाओं को लेकर टिप्पणी करते हुए कहा कि रिट याचिका को PIL का स्वरूप देकर व्यापक आदेश देना अधिकार क्षेत्र का अतिक्रमण है।

जस्टिस इन्द्रजीत सिंह और जस्टिस रवि चिरानिया की खंडपीठ ने स्पष्ट कहा कि सिंगल बेंच ने अपने अधिकार क्षेत्र से आगे बढ़कर कार्यवाही की और मामले को ऐसे लिया जैसे वह जनहित याचिका (PIL) या आपराधिक रिट याचिका हो, जबकि मूल याचिका में विवाद समाप्त हो चुका था।

अपीलकर्ता उपेन्द्र सिंह जादौन की ओर से दायर स्पेशल अपील पर सुनवाई करते हुए खंडपीठ ने यह आदेश दिया है।

क्या था मूल विवाद?

याचिकाकर्ता डॉ. राज कुमार एवं अन्य ने आरोप लगाया कि उन्हें गांधी नगर में विधिवत रूप से आवंटित सरकारी आवासों से हटाया गया, जबकि बाद में उन आवासों का उपयोग प्रभावशाली व्यक्तियों द्वारा किया गया।

सुनवाई के दौरान यह तथ्य सामने आया कि संबंधित परिसर में व्यावसायिक गतिविधियां संचालित हो रही हैं और कई ऐसे लोग रह रहे हैं, जिन्हें आवंटन का अधिकार नहीं था।

एकलपीठ ने मामले की गंभीरता को देखते हुए अधिवक्ता को कोर्ट कमिश्नर नियुक्त किया।

कोर्ट कमिश्नर की निरीक्षण रिपोर्ट में जी-774 सहित कई मकानों में केटरिंग, फूड बिजनेस, बीएनबी और डेयरी जैसी गतिविधियों का उल्लेख किया गया। रिपोर्ट के अनुसार बड़े गैस सिलेंडर, भारी मात्रा में खाद्य सामग्री और अन्य व्यावसायिक उपकरण पाए गए।

निरीक्षण के दौरान विवाद

मामले की सुनवाई के दौरान एक विवाद सामने आया जब अदालत को बताया गया कि कोर्ट के आदेश से निरीक्षण के दौरान सहायक सचिव जीएडी योगिता बिश्नोई को रोका गया और धमकाया गया। उनकी ओर से यह भी कहा गया कि उनकी पुत्री पर हमला करने का प्रयास किया गया।

इस मामले में शिकायत के बाद भी एफआईआर दर्ज नहीं करने पर 29 अप्रैल 2025 को एकलपीठ ने राजस्थान पुलिस अधिनियम, 2007 और सुप्रीम कोर्ट के निर्णय ललिता कुमारी बनाम उत्तर प्रदेश सरकार का हवाला देते हुए तत्काल एफआईआर दर्ज करने और निष्पक्ष जांच के आदेश दिए।

इसके साथ ही एकलपीठ ने जी-774 के निवासी उपेन्द्र सिंह के विरुद्ध जमानती वारंट जारी करने के आदेश भी दिए।

इसके साथ ही एकलपीठ ने गांधी नगर योजना के समूचे क्षेत्र में अनधिकृत कब्जाधारियों को 30 दिन में बेदखल करने और आवासीय इकाइयों में चल रही अवैध व्यावसायिक गतिविधियां रोकने के आदेश दिए।

विशेष अपील में दलीलें

एकलपीठ द्वारा दिए गए आदेश को चुनौती देते हुए उपेन्द्र सिंह ने अधिवक्ता सुनील समदड़िया और अरिहंत समदड़िया के जरिए खंडपीठ में स्पेशल अपील दायर की।

अपीलकर्ता की ओर से अधिवक्ताओं ने दलील दी कि मूल रिट याचिका व्यक्तिगत राहत से संबंधित थी, जिसे जनहित याचिका (PIL) की तरह विस्तारित कर दिया गया और अदालत ने प्रार्थना पत्र से परे जाकर व्यापक आदेश दे दिए।

अधिवक्ता ने सुप्रीम कोर्ट के कई फैसलों का हवाला देते हुए कहा कि एकलपीठ ने अपने अधिकार क्षेत्र से परे जाकर आपराधिक प्रकृति के निर्देश जारी किए, जिसमें रिट याचिका में सीधे एफआईआर दर्ज करने का आदेश देना न्यायिक सीमाओं से बाहर है।

अधिवक्ता ने कहा कि यह प्रक्रिया दंड प्रक्रिया संहिता के तहत निर्धारित है, कि रिट को आपराधिक रिट में परिवर्तित नहीं किया जा सकता।

उन्होंने कहा कि इससे उनके खिलाफ “क्रिमिनल ट्रायल” जैसी स्थिति उत्पन्न हो गई।

अधिवक्ता ने दलील दी कि बिना आपराधिक कार्यवाही के औपचारिक प्रारंभ के जमानती वारंट जारी करना अनुचित है और यह प्राकृतिक न्याय के सिद्धांतों के विरुद्ध है।

अधिवक्ता ने यह भी कहा कि संबंधित परिसर का संचालन दूर के रिश्तेदार करते हैं, वे स्वयं एनजीओ कार्य में संलग्न हैं और उन्हें जवाब दाखिल करने का अवसर दिया जाए।

याचिकाकर्ता का पक्ष

याचिकाकर्ताओं की ओर से दलील दी गई कि एकलपीठ ने मामले में उचित निर्णय दिया है और कोर्ट के आदेश से निरीक्षण करने गए कोर्ट कमिश्नर के साथ विवाद किया गया था।

हाईकोर्ट का आदेश

दलीलें सुनने के बाद Rajasthan Highcourt की खंडपीठ ने कहा कि जब मूल विवाद समाप्त हो चुका था, तो मामले को आगे बढ़ाने का औचित्य नहीं था और रिट याचिका को PIL का स्वरूप देकर व्यापक आदेश देना अधिकार क्षेत्र का अतिक्रमण है।

खंडपीठ ने कहा कि एफआईआर दर्ज कराने का आदेश ऐसे दिया गया मानो यह आपराधिक याचिका हो। सुप्रीम कोर्ट के स्थापित सिद्धांतों के विपरीत सीधे एफआईआर दर्ज कराने का निर्देश पारित किया गया।

सभी पक्षों की दलीलें सुनने और रिकॉर्ड का परीक्षण करने के बाद खंडपीठ ने माना कि सिंगल जज ने अधिकार क्षेत्र का अतिक्रमण किया है और याचिका की सीमा से परे जाकर आदेश पारित किए।

इसी आधार पर अपील स्वीकार करते हुए सिंगल जज के दोनों आदेश—एफआईआर दर्ज करने और जमानती वारंट जारी करने संबंधी—रद्द करने का आदेश दिया।

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