“इतनी बड़ी व्यवस्था बिना मिलीभगत कैसे चली?”-शीर्ष अदालत के तीखे सवाल; 306 टेक्सटाइल उद्योग बंद, एफआईआर और एसआईटी जांच तय
नई दिल्ली/जोधपुर। राजस्थान की जोजरी नदी में जहरीला औद्योगिक अपशिष्ट छोड़ने के मामले में सुप्रीम कोर्ट ने गुरुवार को बेहद सख्त रुख अपनाते हुए राज्य के अधिकारियों, प्रदूषण नियंत्रण तंत्र और उद्योगों की भूमिका पर गंभीर सवाल खड़े किए हैं।
जोधपुर के निकट जोजरी नदी में लगभग 4 किलोमीटर लंबी गुप्त भूमिगत पाइपलाइन के जरिए बिना उपचारित रासायनिक अपशिष्ट छोड़े जाने का खुलासा होने के बाद सुप्रीम कोर्ट ने तीखी टिप्पणी करते हुए पूछा—”आखिर यह सब किसने होने दिया?”
जस्टिस विक्रम नाथ और जस्टिस संदीप मेहता की खंडपीठ ने कहा कि इतनी विशाल अवैध पाइपलाइन वर्षों तक संचालित होती रही और किसी अधिकारी, उद्योग संचालक या नियामक एजेंसी को इसकी भनक तक नहीं लगी, यह विश्वास करना मुश्किल है।
सुप्रीम कोर्ट ने स्पष्ट संकेत दिए कि मामले में केवल निचले स्तर के कर्मचारियों को नहीं, बल्कि पूरे तंत्र की जवाबदेही तय की जाएगी।
सुनवाई के दौरान अदालत ने पूछा कि जब नदी प्रणाली न्यायिक निगरानी में है, प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड नियमित निरीक्षण का दावा करता है और सीईटीपी संचालित हो रही थी, तब फिर जोजरी नदी में जहरीला पानी पहुंचाने वाली यह गुप्त व्यवस्था कैसे फलती-फूलती रही?
सरकार का जवाब–306 उद्योग बंद
राजस्थान सरकार की ओर से अतिरिक्त महाधिवक्ता शिव मंगल शर्मा ने सुप्रीम कोर्ट को बताया कि 27 मई को न्यायालय द्वारा गठित समिति के निरीक्षण में मामला सामने आते ही प्रशासन हरकत में आ गया।
जयपुर से विशेष टीम जोधपुर भेजी गई, प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड के दो अधिकारियों को निलंबित कर दिया गया, वरिष्ठ अधिकारियों के तबादले किए गए और दोषियों के खिलाफ आपराधिक कार्रवाई शुरू कर दी गई है।
राज्य सरकार ने अदालत को बताया कि जोधपुर सीईटीपी से जुड़े सभी 306 टेक्सटाइल उद्योगों को तत्काल प्रभाव से बंद कर दिया गया है।
साथ ही सीईटीपी को भी जांच और सुधारात्मक कार्रवाई पूरी होने तक बंद रखा गया है। सरकार ने यह भी कहा कि पर्यावरणीय क्षतिपूर्ति की वसूली और जिम्मेदार लोगों के खिलाफ कठोर कार्रवाई की जाएगी।
सरकार ने किया आश्वस्त
राज्य सरकार की ओर से अतिरिक्त महाधिवक्ता शिव मंगल शर्मा ने सुप्रीम कोर्ट को आश्वस्त किया कि मामले में एफआईआर दर्ज होगी और एक वरिष्ठ आईपीएस अधिकारी की निगरानी में विशेष जांच दल (एसआईटी) गठित किया जाएगा।
यह एसआईटी उद्योगों, सीईटीपी प्रबंधन, सरकारी अधिकारियों और अन्य संबंधित पक्षों की भूमिका की गहन जांच करेगी।
जिम्मेदार लोगों की करें पहचान
सुनवाई के दौरान जस्टिस संदीप मेहता ने जोजरी-बांडी-लूनी नदी तंत्र की स्थिति पर गहरी चिंता व्यक्त करते हुए कहा कि वर्षों से अदालत के आदेशों और निगरानी के बावजूद पर्यावरण की ऐसी दुर्दशा बेहद गंभीर और चिंताजनक है।
सुप्रीम कोर्ट ने साफ कहा कि अवैध डिस्चार्ज में शामिल “नीचे से ऊपर तक” हर जिम्मेदार व्यक्ति की पहचान की जानी चाहिए और किसी को भी बख्शा नहीं जाना चाहिए।
सुप्रीम कोर्ट ने यह भी संकेत दिया कि वह मामले की जांच सीबीआई को सौंपने पर विचार कर रहा था, लेकिन राज्य सरकार द्वारा स्वतंत्र एसआईटी जांच और कठोर कार्रवाई का आश्वासन दिए जाने के बाद फिलहाल सीबीआई जांच आवश्यक नहीं समझी गई।
नदी में घुला घातक जहर
इस बीच सुप्रीम कोर्ट द्वारा नियुक्त समिति की रिपोर्ट ने भी बेहद गंभीर खतरे का संकेत दिया है।
रिपोर्ट के अनुसार जोजरी-बांडी-लूनी नदी तंत्र में बड़े पैमाने पर विषाक्त प्रदूषण फैला हुआ है और नदी तल में भारी मात्रा में जहरीला स्लज जमा है।
समिति ने चेतावनी दी है कि यदि मानसून से पहले इस स्लज का वैज्ञानिक निस्तारण नहीं किया गया तो प्रदूषण भूजल, कृषि भूमि और पूरे पारिस्थितिकी तंत्र को गंभीर नुकसान पहुंचा सकता है।
अब यह मामला केवल नदी प्रदूषण तक सीमित नहीं रह गया है, बल्कि यह सवाल बन गया है कि आखिर वर्षों तक पर्यावरणीय कानूनों की धज्जियां उड़ाने वालों को संरक्षण किसने दिया।
सुप्रीम कोर्ट की सख्त टिप्पणियों के बाद राजस्थान के प्रशासनिक और औद्योगिक हलकों में हड़कंप मच गया है। मामले की अगली सुनवाई और विस्तृत आदेश पर सभी की नजरें टिकी हुई हैं।
