जमानत के दौरान आरोपी ने छिपाई आपराधिक मामलों की जानकारी, गवाहों को धमकाने और न्यायिक प्रक्रिया में हस्तक्षेप के आरोपों को गंभीर मानते हुए हाईकोर्ट का बड़ा फैसला
जयपुर। राजस्थान हाईकोर्ट ने दुष्कर्म के एक चर्चित मामले में बड़ा और महत्वपूर्ण फैसला सुनाते हुए आरोपी दानिश हनिफी को पूर्व में दी गई जमानत रद्द कर दी है।
राजस्थान हाईकोर्ट ने आरोपी की जमानत को रद्द करते हुए माना कि आरोपी ने जमानत हासिल करते समय अपने खिलाफ लंबित आपराधिक मामलों की सही जानकारी नहीं दी और जमानत मिलने के बाद न केवल पीड़िता को धमकाया बल्कि न्यायिक प्रक्रिया में हस्तक्षेप करने जैसी गतिविधियों में शामिल होने के आरोप भी रिकॉर्ड पर आए हैं।
हाईकोर्ट ने कहा कि ऐसे में आरोपी को दी गई जमानत को जारी रखना निष्पक्ष सुनवाई के हित में नहीं माना जा सकता।
जस्टिस गणेश राम मीणा ने दुष्कर्म पीड़िता की ओर से दायर जमानत रद्द करने की याचिका पर सुनवाई करते हुए कोटा के बजरंग नगर निवासी आरोपी दानिश हनिफी की जमानत को रद्द कर दिया है।
हाईकोर्ट ने अपने आदेश में कहा कि आरोपी के खिलाफ सामने आए तथ्यों से यह प्रतीत होता है कि वह गवाहों को प्रभावित करने और धमकाने का प्रयास कर रहा था।
हाईकोर्ट ने यह भी माना कि आरोपी ने जमानत आवेदन के समय अपने खिलाफ लंबित आपराधिक मामलों की वास्तविक संख्या छिपाई थी। इसी आधार पर 23 अक्टूबर 2024 को पारित जमानत आदेश को निरस्त कर दिया गया।
क्या है पूरा मामला
मामला कोटा शहर के एक थाना क्षेत्र में दर्ज एक दुष्कर्म के मुकदमे से जुड़ा है।
पीड़िता ने आरोपी दानिश हनिफी के खिलाफ भारतीय दंड संहिता की धारा 366 और 376(2)(एन) के तहत मामला दर्ज कराया था।
आरोप था कि आरोपी ने पारिवारिक निकटता और विश्वास का दुरुपयोग करते हुए उसके साथ दुष्कर्म किया।
जांच के बाद पुलिस ने आरोपी को गिरफ्तार किया और बाद में आरोप पत्र भी न्यायालय में पेश कर दिया।
आरोपी ने पहले निचली अदालत में जमानत की कोशिश की, जहां उसे राहत नहीं मिली। इसके बाद उसने हाईकोर्ट का दरवाजा खटखटाया और अक्टूबर 2024 में उसे जमानत मिल गई।
लेकिन जमानत मिलने के बाद घटनाक्रम ने नया मोड़ ले लिया।
पीड़िता ने हाईकोर्ट में जमानत निरस्तीकरण याचिका दायर कर आरोप लगाया कि आरोपी और उसके सहयोगी लगातार उसे और उसके परिवार को धमका रहे हैं तथा बयान बदलने का दबाव बना रहे हैं।
“बयान दोगी तो अंजाम भुगतोगी”
पीड़िता की ओर से अदालत में कहा गया कि जमानत मिलने के बाद आरोपी पक्ष के लोगों ने उसे खुलेआम धमकाना शुरू कर दिया।
आरोप है कि अदालत में बयान दर्ज कराने पहुंचने पर भी उसे डराया गया और कहा गया कि यदि उसने आरोपी के खिलाफ बयान दिया तो उसे और उसके परिवार को गंभीर परिणाम भुगतने होंगे।
याचिका में दावा किया गया कि आरोपी के सहयोगियों ने अदालत परिसर तक में दबाव बनाने की कोशिश की।
लगातार मिल रही धमकियों के कारण पीड़िता और उसके परिवार को पुलिस तथा न्यायालय से सुरक्षा की मांग करनी पड़ी।
पीड़िता ने यह भी आरोप लगाया कि आरोपी जमानत को ढाल बनाकर गवाहों को प्रभावित करने और मुकदमे को कमजोर करने का प्रयास कर रहा था।
22 मुकदमों का आरोपी, लेकिन कोर्ट को नहीं बताई पूरी सच्चाई
मामले की सुनवाई के दौरान पीड़िता पक्ष के अधिवक्ता प्रमेश्वर पिलानिया ने अदालत को बताया कि आरोपी एक आदतन अपराधी है और उसके खिलाफ लगभग 22 आपराधिक मामले दर्ज हैं।
हाईकोर्ट के आदेश में भी उल्लेख किया गया कि जब आरोपी की जमानत याचिका निचली अदालत में खारिज हुई थी, तब रिकॉर्ड पर केवल सात मामलों का उल्लेख किया गया था, जबकि वास्तव में उसके खिलाफ लगभग 15 अन्य आपराधिक मामले लंबित थे।
बाद में हाईकोर्ट में जमानत याचिका दाखिल करते समय भी आरोपी ने इन मामलों की सही जानकारी नहीं दी। अदालत ने इसे महत्वपूर्ण तथ्य छिपाना माना।
हाईकोर्ट ने अपने आदेश में कहा कि आरोपी ने लंबित आपराधिक मामलों की वास्तविक संख्या न्यायालय के समक्ष नहीं रखी, जो जमानत पर विचार करते समय अत्यंत महत्वपूर्ण तथ्य था।
जमानत के बाद दर्ज हुए कई मामले
सुनवाई के दौरान पीड़िता के अधिवक्ता ने अदालत को बताया कि लगातार पीड़िता और उसके परिजनों को मिल रही धमकियों से परेशान होकर आरोपी के खिलाफ जमानत आदेश के बाद भी कई आपराधिक प्रकरण दर्ज हुए।
अधिवक्ता ने अदालत को बताया कि रेलवे कॉलोनी थाना, कोटा में दर्ज एक मामले में जांच पूरी होने के बाद आरोपी के खिलाफ चार्जशीट पेश की जा चुकी है।
इसी प्रकार नयापुरा थाना क्षेत्र में दर्ज एक अन्य मामले में भी आरोप था कि आरोपी के निर्देश पर उसके सहयोगियों ने पीड़िता को धमकाया। पुलिस ने जांच के बाद इस मामले में भी आरोप पत्र पेश किया।
इसके अतिरिक्त एक अन्य धमकी से जुड़े मामले में भी पुलिस द्वारा चार्जशीट दाखिल किए जाने की जानकारी अदालत के समक्ष रखी गई।
सुप्रीम कोर्ट के फैसलों का लिया सहारा
सुनवाई के दौरान पीड़िता पक्ष ने सुप्रीम कोर्ट के उस फैसले का हवाला दिया जिसमें कहा गया था कि जमानत मांगने वाला व्यक्ति अपने आपराधिक इतिहास की पूरी और सही जानकारी देना अनिवार्य है।
हाईकोर्ट ने भी अपने आदेश में इस सिद्धांत का उल्लेख करते हुए कहा कि आरोपी द्वारा लंबित मामलों की वास्तविक संख्या का खुलासा नहीं किया गया।
हालांकि संबंधित सुप्रीम कोर्ट का फैसला बाद में आया, लेकिन न्यायालय के समक्ष सही तथ्य रखना प्रत्येक आवेदक का दायित्व है।
हाईकोर्ट ने क्या कहा
जस्टिस गणेश राम मीणा ने अपने आदेश में सुप्रीम कोर्ट द्वारा तय किए गए उन सिद्धांतों का भी उल्लेख किया जिनके आधार पर किसी आरोपी की जमानत रद्द की जा सकती है।
इनमें गवाहों को प्रभावित करना, साक्ष्यों से छेड़छाड़ करना, न्यायिक प्रक्रिया में बाधा उत्पन्न करना, अपराधी गतिविधियों में दोबारा शामिल होना तथा निष्पक्ष सुनवाई को प्रभावित करने वाली परिस्थितियां पैदा करना शामिल हैं।
हाईकोर्ट ने कहा कि रिकॉर्ड पर आए तथ्यों से यह स्पष्ट होता है कि आरोपी के खिलाफ दर्ज मामलों में जांच के बाद चार्जशीट प्रस्तुत की गई है तथा उसके खिलाफ गवाहों को प्रभावित करने और धमकाने के आरोप सामने आए हैं।
ऐसी परिस्थितियां निष्पक्ष सुनवाई के अनुकूल नहीं मानी जा सकतीं।
डेढ़ साल बाद भी नहीं भरे जमानती बॉन्ड
राजस्थान हाईकोर्ट ने अपने आदेश में एक और महत्वपूर्ण तथ्य का उल्लेख किया।
हाईकोर्ट ने कहा कि 23 अक्टूबर 2024 को जमानत मिलने के बावजूद आरोपी ने करीब डेढ़ वर्ष बीत जाने के बाद भी जमानती बॉन्ड प्रस्तुत नहीं किए थे।
अदालत ने इस पहलू को भी अपने निर्णय में महत्वपूर्ण माना और कहा कि पूरे मामले की परिस्थितियों को देखते हुए जमानत आदेश को जारी रखना उचित नहीं होगा।
आखिरकार जमानत हुई रद्द
सभी तथ्यों, पुलिस जांच, चार्जशीट, गवाहों को प्रभावित करने के आरोपों और आपराधिक मामलों की जानकारी छिपाने के बिंदुओं पर विचार करने के बाद राजस्थान हाईकोर्ट ने पीड़िता की जमानत निरस्तीकरण याचिका स्वीकार कर ली।
हाईकोर्ट ने आरोपी दानिश हनिफी के पक्ष में 23 अक्टूबर 2024 को पारित जमानत आदेश को रद्द करते हुए स्पष्ट किया कि यदि उस आदेश के आधार पर कोई जमानती बॉन्ड या जमानतदार स्वीकार किए गए हैं तो वे भी स्वतः निरस्त माने जाएंगे।
अपने फैसले में हाईकोर्ट ने स्पष्ट संदेश दिया है कि यदि कोई आरोपी जमानत का दुरुपयोग करता है, गवाहों को प्रभावित करने का प्रयास करता है या न्यायालय के समक्ष महत्वपूर्ण तथ्य छिपाता है, तो उसे मिली राहत वापस ली जा सकती है।
यह फैसला दुष्कर्म मामलों में गवाहों और पीड़ितों की सुरक्षा तथा न्यायिक प्रक्रिया की निष्पक्षता को लेकर एक महत्वपूर्ण नज़ीर माना जा रहा है।
Case Details
HIGH COURT OF JUDICATURE FOR RAJASTHAN
BENCH AT JAIPUR
S.B. Criminal Bail Cancellation Application No. 17/2026
In
S.B. Criminal 2nd Bail Application No. 12251/2024
