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AI मददगार है, जज नहीं’ डिजिटल क्रांति ने बदला है न्याय का चेहरा, लेकिन सावधानी जरूरी – जस्टिस हिमा कोहली की बड़ी चेतावनी

AI Is a Tool, Not a Judge: Justice Hima Kohli Warns of Risks of Generative AI in Courts

जयपुर। सुप्रीम कोर्ट की पूर्व जज Justice Hima Kohli ने कहा है कि एआई कानून और तकनीक के बीच संबंध केवल सुविधाजनक बदलाव नहीं, बल्कि एक गहरा न्यायशास्त्रीय (jurisprudential) परिवर्तन है।

उन्होंने कहा कि आज का डिजिटल युग न केवल न्याय तक पहुंच को बदल रहा है, बल्कि अधिकारों के प्रयोग, दायित्वों के निर्धारण और न्याय की प्रक्रिया को भी नए सिरे से परिभाषित कर रहा है।

जस्टिस कोहली ने आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस (AI) के अदालतों में उपयोग पर भी गंभीर चेतावनी दी। उन्होंने कहा कि जनरेटिव AI कई बार “हैलुसिनेशन” यानी काल्पनिक निर्णय और संदर्भ उत्पन्न कर सकता है।

अमेरिका और भारत में ऐसे मामले सामने आए हैं जहां वकीलों ने AI द्वारा तैयार किए गए फर्जी केस संदर्भ अदालत में पेश कर दिए।

उन्होंने स्पष्ट किया कि AI अनुसंधान और ड्राफ्टिंग में सहायक हो सकता है, लेकिन यह पेशेवर निर्णय, नैतिक जिम्मेदारी और मानवीय विवेक का विकल्प नहीं बन सकता।

उन्होंने कहा, ‘AI मददगार है, जज नहीं।’

तकनीक बदलेगी माध्यम, न्याय रहेगा मानवीय

अपने संबोधन में जस्टिस कोहली ने कहा कि कानून की असली ताकत उसके उपकरणों में नहीं, बल्कि उसकी संवैधानिक आत्मा में है।

तकनीक बदलती रहेगी, लेकिन न्याय का मूल तत्व—मानवीय संवेदना, निष्पक्षता और संवैधानिक मूल्यों की रक्षा—सदैव स्थिर रहेगा।

उन्होंने युवा विधि छात्रों से कहा कि वे एक ऐसे पेशे में प्रवेश करने जा रहे हैं जो AI और डिजिटल न्यायालयों से परिवर्तित हो चुका है, लेकिन उनका कर्तव्य वही रहेगा—स्पष्ट सोच, ईमानदार तर्क और संविधान के मूल्यों की रक्षा।

उन्होंने कहा, “तकनीक माध्यम को बदल सकती है, लेकिन न्याय हमेशा एक मानवीय प्रयास रहेगा।”

जस्टिस एस.सी. अग्रवाल मेमोरियल लेक्चर

Justice Hima Kohli ने शनिवार को राजस्थान एजुकेशन ट्रस्ट और कानोरिया स्कूल ऑफ लॉ फॉर वूमेन के संयुक्त तत्वावधान में आयोजित चौथे ‘जस्टिस एस.सी. अग्रवाल मेमोरियल लेक्चर’ में मुख्य वक्ता के रूप में व्याख्यान देते हुए यह बात कही।

“Technology and the Legal System: From Tech Laws to Tech in Law” विषय पर अपनी बात कहते हुए जस्टिस कोहली ने कहा कि तकनीक अब केवल सुविधा का साधन नहीं रही, बल्कि यह न्यायशास्त्र और संवैधानिक विमर्श के केंद्र में आ चुकी है।

उन्होंने स्पष्ट शब्दों में कहा कि डिजिटल क्रांति ने न्याय तक पहुंच, अधिकारों के प्रयोग और राज्य की जवाबदेही—तीनों को मूल रूप से बदल दिया है।

लाइब्रेरी से डिजिटल स्क्रीन तक का सफर

अपने व्याख्यान में जस्टिस कोहली ने 1980 के दशक के अपने छात्र जीवन को याद करते हुए कहा कि उस समय कानून की पढ़ाई धैर्य, मेहनत और पुस्तकों के गहन अध्ययन पर आधारित थी।

घंटों लाइब्रेरी में बैठकर कमेंट्री और डाइजेस्ट खंगालने पड़ते थे। तकनीक मौजूद थी, लेकिन वह कानून की समझ का आधार नहीं थी।

उन्होंने कहा कि आज हर फैसला ऑनलाइन डाउनलोड होता है, फाइलिंग डिजिटल रूप से होती है और सुनवाई वीडियो कॉन्फ्रेंसिंग के माध्यम से की जाती है।

कई विवाद पूरी तरह ऑनलाइन सुलझाए जा रहे हैं। यह बदलाव केवल तकनीकी नहीं, बल्कि संवैधानिक विमर्श के केंद्र में आ चुका है।

तकनीक: कानून का विषय और साधन दोनों

जस्टिस कोहली ने तकनीक और कानून के संबंध को दो आयामों में विभाजित किया — तकनीक कानून का विषय (Technology as a Subject of Law)।

इसमें डिजिटल कंटेंट का नियमन, डेटा सुरक्षा, इंटरनेट शटडाउन, इलेक्ट्रॉनिक साक्ष्य, मध्यस्थों की जिम्मेदारी जैसे मुद्दे शामिल हैं।

उन्होंने बताया कि भारत में वर्ष 2000 में सूचना प्रौद्योगिकी अधिनियम के माध्यम से डिजिटल नियमन की शुरुआत हुई। इसके बाद डेटा संरक्षण और निजता के अधिकार को लेकर महत्वपूर्ण न्यायिक निर्णय सामने आए।

तकनीक कानून का साधन (Technology as an Instrument of Law)।

तकनीक ने न्यायिक प्रशासन को भी बदल दिया है। ई-फाइलिंग, डिजिटल वकालतनामा, QR आधारित केस ट्रैकिंग, वर्चुअल कोर्ट, हाइब्रिड सुनवाई, रियल टाइम ट्रांसक्रिप्शन और AI आधारित सिस्टम अब न्यायालयों का हिस्सा बन चुके हैं।

निजता का अधिकार और संविधान

उन्होंने ऐतिहासिक फैसले Justice K.S. Puttaswamy vs Union of India का उल्लेख करते हुए कहा कि यह भारतीय संवैधानिक इतिहास का मील का पत्थर है। 9 जजों की पीठ ने सर्वसम्मति से निजता को मौलिक अधिकार घोषित किया।

उन्होंने कहा कि इस फैसले में अदालत ने स्पष्ट किया कि निजता केवल ‘अकेले छोड़े जाने का अधिकार’ नहीं है, बल्कि व्यक्ति को अपने व्यक्तिगत डेटा के संग्रह, उपयोग और प्रसार को नियंत्रित करने का अधिकार भी है।

इस फैसले के आधार पर बाद में डिजिटल पर्सनल डेटा प्रोटेक्शन एक्ट, 2023 अस्तित्व में आया।

कोविड-19 और वर्चुअल कोर्ट का विस्तार

जस्टिस कोहली ने कहा कि कोविड-19 महामारी के दौरान जब भौतिक अदालतें बंद हो गईं, तब तकनीक ने न्याय प्रणाली को ठहरने नहीं दिया।

जस्टिस कोहली ने अपने अनुभव साझा करते हुए बताया कि दिल्ली और चेन्नई से अलग-अलग स्थानों पर बैठकर भी उन्होंने वर्चुअल बेंच संचालित की।

उन्होंने कहा कि डिजिटल हस्ताक्षर, PDF फाइलिंग और वीडियो कॉन्फ्रेंसिंग ने यह साबित कर दिया कि न्यायालय समय और स्थान की सीमाओं से परे कार्य कर सकते हैं। यहां तक कि एक न्यायाधीश अमेरिका के शिकागो से और दूसरे हैदराबाद से सुनवाई कर रहे थे—और न्याय की प्रक्रिया निर्बाध चलती रही।

ई-कोर्ट्स और डिजिटल पारदर्शिता

भारत में अदालतों के डिजिटलीकरण के तीन चरण चल रहे हैं, और वर्तमान में तीसरा चरण लागू है, जिसका उद्देश्य पूर्णतः पेपरलेस अदालतें स्थापित करना है।

केरल के कालपेट्टा जैसे जिलों में AI-सहायता प्राप्त डिजिटल कोर्टरूम स्थापित किए जा चुके हैं।

अब केस की स्थिति, लंबित मामलों की संख्या और निपटान का डेटा लाइव “जस्टिस क्लॉक” के माध्यम से प्रदर्शित होता है।

ई-सेवा केंद्र डिजिटल साक्षरता से वंचित लोगों की मदद करते हैं, ताकि तकनीक न्याय तक पहुंच को सीमित न करे।

जस्टिस पानाचंद जैन को श्रद्धांजलि

कार्यक्रम को संबोधित करते हुए जस्टिस वी.एस. दवे ने हाल ही में दिवंगत हुई कई शख्सियतों को श्रद्धांजलि अर्पित की।

उन्होंने खासतौर से जस्टिस पानाचंद जैन को याद करते हुए उनके साथ 1948 से 77 वर्षों के लंबे साथ, मित्रता और वैचारिक भिन्नताओं के बावजूद अटूट संबंधों का उल्लेख किया।

उन्होंने बताया कि दोनों ने स्वतंत्रता के बाद कांग्रेस अधिवेशन में स्वयंसेवक के रूप में साथ कार्य किया और जीवनभर घनिष्ठ मित्र रहे। काकाजी की विनम्रता, नेतृत्व क्षमता और उदार व्यक्तित्व को याद करते हुए वक्ता ने कहा कि उन्हें शब्दों में बांधना कठिन है।

जस्टिस सुरेश चंद्र अग्रवाल को किया याद

जस्टिस जे.के. रांका ने जस्टिस सुरेश चंद्र अग्रवाल के व्यक्तित्व और उनके ऐतिहासिक निर्णयों को याद करते हुए कहा कि वे असाधारण विधिवेत्ता थे।

उन्होंने कहा कि पी.वी. नरसिम्हा राव बनाम भारत संघ (प्रसिद्ध जेएमएम रिश्वत कांड) मामले में जस्टिस अग्रवाल द्वारा दिया गया अल्पमत निर्णय समय से आगे की सोच का उदाहरण था।

उन्होंने अनुच्छेद 105(2) के तहत सांसदों की प्रतिरक्षा की व्याख्या करते हुए स्पष्ट किया कि रिश्वत का अपराध धन स्वीकार करते ही पूर्ण हो जाता है, यह अवैध वादे के पालन पर निर्भर नहीं करता। बाद में सात न्यायाधीशों की पीठ ने 2024 में उनके दृष्टिकोण को सही ठहराते हुए बहुमत निर्णय को पलट दिया।

सेवानिवृत्ति के बाद भी उन्होंने सामाजिक और शैक्षणिक संस्थाओं में सक्रिय भूमिका निभाई तथा अपनी संपूर्ण संपत्ति रामकृष्ण मिशन को दान कर दी।

चार दशक से सक्रिय

राजस्थान एजुकेशन ट्रस्ट के प्रतिनिधि डी.सी. अग्रवाल ने भावुक शब्दों में अपने मार्गदर्शक एस.सी. अग्रवाल को याद करते हुए कहा कि करीब चार वर्ष पहले शुरू हुई इस व्याख्यान श्रृंखला को दिशा देने में उनका महत्वपूर्ण योगदान रहा और ट्रस्ट उन्हें सदैव याद रखेगा।

उन्होंने ट्रस्ट की जानकारी देते हुए बताया कि 1962 में स्वर्गीय श्रेयस सी. एल. अग्रवाल द्वारा स्थापित राजस्थान एजुकेशन ट्रस्ट पिछले चार दशकों से विधि शिक्षा, छात्रवृत्ति, संविधान जागरूकता और कानूनी सहायता के क्षेत्र में सक्रिय है।

ट्रस्ट ने अब तक लगभग तीन करोड़ रुपये शिक्षा व चिकित्सा सहायता पर व्यय किए हैं और युवाओं में संवैधानिक मूल्यों के प्रति जागरूकता फैलाने के लिए निरंतर प्रयासरत है।

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