नई दिल्ली: सुप्रीम कोर्ट ने पूर्व रियासतों से जुड़े संपत्ति विवादों पर एक अहम फैसला सुनाते हुए साफ कर दिया है कि ‘प्राइमोजेनिचर’ (Primogeniture Rule) यानी केवल बड़े बेटे को पूरी संपत्ति मिलने की परंपरा अब निजी संपत्तियों के बंटवारे में लागू नहीं होगी। कोर्ट ने कहा कि ऐसे मामलों में सामान्य उत्तराधिकार कानून ही मान्य होगा और सभी वैध उत्तराधिकारियों को उनका हक मिलेगा।
सुप्रीम कोर्ट ने स्पष्ट किया कि पूर्व रियासतों के शासकों की निजी संपत्तियां सामान्य उत्तराधिकार कानूनों के अनुसार परिवार के उत्तराधिकारियों में बंटेंगी।
अदालत ने कहा कि राजगद्दी या शाही पद के उत्तराधिकार और निजी संपत्ति के उत्तराधिकार को एक जैसा नहीं माना जा सकता।
यह फैसला उस विवाद के संदर्भ में आया, जिसमें एक पूर्व शाही परिवार की संपत्ति के बंटवारे को लेकर यह सवाल उठा था कि क्या पारंपरिक ‘प्राइमोजेनिचर’ नियम यानी ज्येष्ठाधिकार को आज भी लागू माना जा सकता है। सुप्रीम कोर्ट ने इस मुद्दे पर विस्तार से सुनवाई करते हुए स्पष्ट किया कि भारत के संवैधानिक ढांचे और आधुनिक कानूनी व्यवस्था में इस तरह की परंपराओं को स्वतः मान्यता नहीं दी जा सकती।
जस्टिस पंकज मिथल और जस्टिस एस. वी. एन. भट्टी की बेंच ने पंजाब एवं हरियाणा हाईकोर्ट के फैसले को रद्द करते हुए यह फैसला सुनाया। हाईकोर्ट ने कपूरथला राजघराने की निजी संपत्तियों पर बड़े बेटे ब्रिगेडियर सुखजीत सिंह का विशेष अधिकार माना था।
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बेंच ने क्या कहा?
सुप्रीम कोर्ट की पीठ ने अपने फैसले में कहा कि ‘प्राइमोजेनिचर’ एक पारंपरिक व्यवस्था रही है, जिसका इस्तेमाल राजघरानों में सत्ता और संपत्ति को एक ही उत्तराधिकारी तक सीमित रखने के लिए किया जाता था। लेकिन आज के कानूनी ढांचे में, खासकर जब मामला निजी संपत्ति का हो, तो इस नियम को लागू करना न्यायसंगत नहीं है।
कोर्ट ने स्पष्ट किया कि यदि संपत्ति निजी है और किसी वैधानिक कानून के तहत आती है, तो उसका बंटवारा संबंधित उत्तराधिकार कानूनों-जैसे हिंदू उत्तराधिकार अधिनियम के अनुसार ही किया जाएगा।
‘प्राइमोजेनिचर’ क्या है?
‘प्राइमोजेनिचर’ यानी ज्येष्ठाधिकार एक पुरानी परंपरा है, जिसमें परिवार की पूरी संपत्ति और अधिकार केवल सबसे बड़े बेटे को दिए जाते थे। यह व्यवस्था खास तौर पर राजघरानों में प्रचलित थी, ताकि सत्ता का केंद्रीकरण बना रहे और संपत्ति का विभाजन न हो।
हालांकि, स्वतंत्रता के बाद भारत में लोकतांत्रिक व्यवस्था और समान अधिकारों की अवधारणा के चलते इस तरह की परंपराओं का प्रभाव धीरे-धीरे कम होता गया। सुप्रीम कोर्ट के इस फैसले ने अब इस स्थिति को और स्पष्ट कर दिया है।
किस मामले में आया फैसला?
यह मामला पंजाब के कपूरथला शाही परिवार से जुड़ा था, जहां संपत्ति के बंटवारे को लेकर विवाद सामने आया था। एक पक्ष का कहना था कि ‘प्राइमोजेनिचर’ के आधार पर पूरी संपत्ति एक ही उत्तराधिकारी को मिलनी चाहिए, जबकि दूसरे पक्ष ने सामान्य उत्तराधिकार कानून लागू करने की मांग की थी।
मामला वर्ष 1977 में शुरू हुआ था, जब दो अलग-अलग मुकदमे दायर किए गए।
पहले मुकदमे में ब्रिगेडियर सुखजीत सिंह ने दावा किया कि कुछ संपत्तियां उनकी व्यक्तिगत और विशेष संपत्ति हैं। इन संपत्तियों में कपूरथला विला,
मसूरी की “Chateau & St. Helens” संपत्ति, दिल्ली की संपत्तियां, आभूषण, सिक्योरिटीज और अन्य चल-अचल संपत्तियां शामिल थीं।
दूसरी ओर उनकी अलग रह रही पत्नी गीता देवी और बच्चों ने अदालत में कहा कि ये पैतृक और पारिवारिक संपत्तियां हैं, इसलिए इनका बंटवारा होना चाहिए।
विवाद का मुख्य सवाल यह था कि क्या इन संपत्तियों पर “Primogeniture Rule” लागू होगा, जिसके तहत केवल सबसे बड़े पुरुष उत्तराधिकारी को अधिकार मिलता है, या फिर सामान्य हिंदू उत्तराधिकार कानून लागू होगा।
सुप्रीम कोर्ट ने दोनों पक्षों की दलीलों को सुनने के बाद कहा कि यह संपत्ति निजी प्रकृति की है, इसलिए इस पर कोई पारंपरिक शाही नियम लागू नहीं होगा।
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“राजगद्दी” पर लागू हो सकता है ‘प्राइमोजेनिचर रूल’
सुप्रीम कोर्ट ने अपने फैसले में कहा कि 1948 के merger covenant यानी विलय समझौता में केवल “Gaddi” यानी राजगद्दी के उत्तराधिकार को परंपरा और प्राइमोजेनिचर यानी ज्येष्ठाधिकार के अनुसार मान्यता दी गई थी।
अदालत ने कहा कि विलय समझौते के अनुच्छेद 14 में केवल राजगद्दी और उससे जुड़े पारंपरिक अधिकारों के उत्तराधिकार को ही संरक्षण दिया गया था। लेकिन निजी संपत्तियों को लेकर स्थिति अलग थी।
सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि अनुच्छेद 12 में स्पष्ट रूप से लिखा गया था कि शासक अपनी निजी संपत्तियों पर “full ownership, use and enjoyment” यानी पूर्ण स्वामित्व, उपयोग और उपभोग का अधिकार रखेंगे।
अदालत ने माना कि इसका अर्थ यह नहीं है कि निजी संपत्तियां भी केवल बड़े बेटे को ही मिलेंगी।
सुप्रीम कोर्ट ने क्या कहा
सुप्रीम कोर्ट ने साफ शब्दों में कहा कि पूर्व शासकों की निजी संपत्तियों पर सामान्य व्यक्तिगत उत्तराधिकार कानून लागू होगा।
अदालत ने कहा:
“पूर्व शासकों की निजी संपत्तियां प्राइमोजेनिचर रूल के अनुसार नहीं बल्कि व्यक्तिगत उत्तराधिकार कानूनों के अनुसार विभाजित होंगी।” कोर्ट ने माना कि रियासतों के विलय के बाद पूर्व शासक सामान्य नागरिक बन गए थे। हालांकि उन्हें कुछ विशेष अधिकार और सुविधाएं मिली थीं, लेकिन निजी संपत्तियों को सामान्य उत्तराधिकार कानूनों से बाहर नहीं रखा गया था।
सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि विलय समझौते (Merger Covenant) ने केवल शासक के पद और उससे जुड़े विशेषाधिकारों को मान्यता दी, निजी संपत्ति के उत्तराधिकार को नियंत्रित नहीं किया।
हाईकोर्ट के फैसले को गलत माना
सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि पंजाब एवं हरियाणा हाईकोर्ट ने पुराने फैसलों की गलत व्याख्या कर दी थी।
हाईकोर्ट ने “त्रिजुगी नारायण” मामले का हवाला देते हुए बड़े बेटे को संपत्ति का विशेष अधिकार देने वाले नियम को निजी संपत्तियों पर भी लागू मान लिया था।
लेकिन सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि बाद के कई बड़े फैसलों में यह स्पष्ट किया जा चुका है कि राजगद्दी और निजी संपत्ति अलग-अलग चीजें हैं और निजी संपत्तियों पर सामान्य उत्तराधिकार कानून (succession law) ही लागू होगा।
अदालत ने विशेष रूप से महारानी दीपिंदर कौर मामले और तलत फातिमा हसन मामले का उल्लेख करते हुए कहा कि इन फैसलों में भी यही सिद्धांत तय किया गया था।
संपत्तियों के बंटवारे का ‘सुप्रीम’ आदेश
सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि कपूरथला राजघराने की कई संपत्तियां परिवार के सदस्यों के बीच विभाजित की जाएंगी।
सुप्रीम कोर्ट ने मसूरी की “Chateau & St. Helens” संपत्ति को विभाजन योग्य माना। इसके अलावा दिल्ली की संयुक्त संपत्तियों और कपूरथला स्थित “Villa Bouna Vista” के बंटवारे के भी निर्देश दिए गए।
सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि गीता देवी की मृत्यु के बाद दिल्ली की संपत्तियों पर भी सामान्य उत्तराधिकार नियम लागू होंगे। अदालत ने संपत्ति के बंटवारे के लिए प्रारंभिक डिक्री जारी करने का निर्देश दिया।
“पूर्व शासक भी सामान्य कानून से ऊपर नहीं”
सुप्रीम कोर्ट ने अपने फैसले में महत्वपूर्ण टिप्पणी करते हुए कहा कि रियासतों के भारत में विलय के बाद पूर्व शासक सामान्य नागरिकों की तरह हो गए थे।
अदालत ने कहा कि उन्हें निजी संपत्तियों का स्वामित्व मिला, लेकिन उन संपत्तियों को सामान्य उत्तराधिकार कानूनों से अलग नहीं किया गया। कोर्ट ने माना कि यदि निजी संपत्तियों पर भी Primogeniture Rule लागू मान लिया जाए, तो यह सामान्य उत्तराधिकार व्यवस्था के खिलाफ होगा।
सुप्रीम कोर्ट का यह फैसला देशभर के पूर्व राजघरानों और बड़ी पारिवारिक संपत्तियों से जुड़े विवादों में महत्वपूर्ण माना जा रहा है।
देश के कई पुराने राजघरानों में आज भी पैतृक संपत्ति, राजमहल, विरासत संपत्तियां और शाही संपत्तियों को लेकर विवाद चलते रहते हैं। कई मामलों में बड़े बेटे द्वारा Primogeniture Rule के आधार पर पूरे अधिकार का दावा किया जाता है।
सुप्रीम कोर्ट ने इस फैसले से स्पष्ट कर दिया है कि
- राजगद्दी और निजी संपत्ति अलग हैं।
- निजी संपत्ति पर सामान्य उत्तराधिकार कानून लागू होगा।
- केवल बड़े बेटे को पूरा अधिकार नहीं दिया जा सकता।
यह फैसला आने वाले समय में देशभर के पूर्व राजघरानों और विरासत संपत्ति विवादों में बड़ी कानूनी मिसाल माना जा सकता है।
