नई दिल्ली: सुप्रीम कोर्ट ने एक अहम और दूरगामी असर वाला फैसला सुनाते हुए यह स्पष्ट कर दिया है कि वसीयत (प्रॉबेट) से जुड़े मामलों में हाईकोर्ट की भूमिका केवल दस्तावेजों की जांच तक सीमित नहीं है।
अगर हाईकोर्ट को यह महसूस होता है कि संपत्ति के प्रबंधन में गड़बड़ी हो रही है या किसी तरह की धोखाधड़ी की जा रही है, तो वह सीधे हस्तक्षेप कर सकती है।
कोर्ट ने साफ शब्दों में कहा कि प्रॉबेट जूरिस्डिक्शन के तहत काम करते हुए भी हाईकोर्ट अपने संवैधानिक अधिकारों से वंचित नहीं होता।इसका मतलब यह है कि वह जरूरत पड़ने पर पुलिस जांच के आदेश देने का भी अधिकार रखता है।
यह फैसला ऐसे समय आया है जब संपत्ति विवादों में फर्जीवाड़ा और हेराफेरी के मामलों को लेकर चिंता बढ़ रही है।
सुप्रीम कोर्ट का यह रुख साफ संकेत देता है कि अब अदालतें सिर्फ औपचारिक भूमिका नहीं निभाएंगी, बल्कि सक्रिय रूप से न्याय सुनिश्चित करेंगी।
“कोर्ट मूक दर्शक नहीं बन सकता”-सुप्रीम कोर्ट का संदेश
जस्टिस पंकज मिथल और जस्टिस प्रसन्ना बी. वराले की बेंच ने इस मामले में बेहद सख्त रुख अपनाया।
उन्होंने कहा कि प्रॉबेट कोर्ट का मुख्य काम भले ही वसीयत की वैधता और उसके सही तरीके से निष्पादन की जांच करना हो, लेकिन यह उसकी अंतिम सीमा नहीं है।
अगर सुनवाई के दौरान यह सामने आता है कि किसी एग्जीक्यूटर या संबंधित पक्ष ने गड़बड़ी की है, तो कोर्ट चुप नहीं रह सकता। कोर्ट ने कहा कि ऐसी स्थिति में “मूक दर्शक” बने रहना न्याय के साथ अन्याय होगा।
बेंच ने यह भी कहा कि अगर संपत्ति के प्रबंधन में “गंभीर अनियमितताएं” या “शरारत” दिखाई देती है, तो अदालत को अपनी संवैधानिक शक्तियों का इस्तेमाल करना ही होगा। यह न केवल उसका अधिकार है, बल्कि उसकी जिम्मेदारी भी है।
कोर्ट ने साफ किया कि संविधान के अनुच्छेद 215 के तहत हाईकोर्ट के पास व्यापक (plenary) शक्तियां हैं। इन शक्तियों का उपयोग करके वह किसी भी तरह की धोखाधड़ी या गड़बड़ी को रोक सकता है।
₹100 करोड़ की संपत्ति, 2 वसीयतें और शुरू हुआ विवाद
यह पूरा मामला मुंबई के एक संपन्न पारसी व्यवसायी, पुरवेज बुरजोर दलाल, की संपत्ति से जुड़ा हुआ है। दलाल का निधन 7 दिसंबर 2011 को हुआ था और उन्होंने लगभग 100 करोड़ रुपये की संपत्ति छोड़ी थी।
दिलचस्प बात यह रही कि उनकी मृत्यु के बाद दो अलग-अलग वसीयतें सामने आईं। पहली वसीयत 22 नवंबर 2010 की बताई गई, जबकि दूसरी 8 सितंबर 2011 की थी। दोनों वसीयतों में अलग-अलग दावे किए गए थे।
एक पक्ष ने संपत्ति के बंटवारे का दावा किया, जबकि दूसरे पक्ष ने कहा कि पूरी संपत्ति दान (चैरिटी) के लिए छोड़ी गई है। यहीं से विवाद गहराने लगा। मामला आखिरकार बॉम्बे हाईकोर्ट तक पहुंचा, जहां इस पर विस्तृत सुनवाई शुरू हुई।
एडमिनिस्ट्रेटर की नियुक्ति और चौंकाने वाली जानकारियां
विवाद को देखते हुए बॉम्बे हाईकोर्ट ने एक महत्वपूर्ण कदम उठाया। अदालत ने इंडियन सक्सेशन एक्ट की धारा 247 के तहत एक “एडमिनिस्ट्रेटर पेंडेंटे लाइट” नियुक्त किया।
इसका उद्देश्य था कि जब तक मामला अदालत में लंबित है, तब तक संपत्ति की सुरक्षा और प्रबंधन ठीक तरीके से किया जा सके।
लेकिन जांच के दौरान जो तथ्य सामने आए, उन्होंने पूरे मामले को और गंभीर बना दिया। एडमिनिस्ट्रेटर ने पाया कि मृतक के नाम पर एक नया बैंक खाता खोला गया था।
जांच में सामने आया कि कारोबारी की मौत के तुरंत बाद “Estate of Purvez Burjor Dalal” के नाम से एक बैंक खाता खोला गया। इस खाते से बड़ी रकम अलग-अलग संस्थाओं में ट्रांसफर की गई थी। कुछ ट्रांजैक्शन में लाखों रुपये ट्रस्ट और निजी संस्थाओं को भेजे गए थे।
रिकॉर्ड के अनुसार 15 लाख रुपये Bai Avabai Hormusji Tata Trust को ट्रांसफर किए गए जबकि 17.08 लाख रुपये एक अन्य निजी संस्था को भेजे गए।
इन लेन-देन पर संदेह हुआ। जांच में यह भी सामने आया कि कई संस्थाओं के पते एक जैसे थे और उनके बीच आपसी संबंध भी थे। इन तथ्यों ने यह संकेत दिया कि कहीं संपत्ति को व्यवस्थित तरीके से बाहर निकाला जा रहा है।
अदालत के सामने क्या-क्या संदेह आए ?
एडमिनिस्ट्रेटर ने अदालत को बताया कि यह केवल सामान्य लेनदेन नहीं बल्कि संपत्ति से धन निकालने और उसे दूसरी संस्थाओं में भेजने की बड़ी साजिश का हिस्सा हो सकता है।
एडमिनिस्ट्रेटर ने अदालत को बताया कि कई संस्थाओं के पते एक जैसे थे, वित्तीय लेनदेन आपस में जुड़े हुए थे और कुछ संस्थाओं का संबंध उन लोगों से था जो वसीयत विवाद में शामिल थे।
अदालत को यह भी बताया गया कि संपत्ति से जुड़े खातों और वित्तीय गतिविधियों की पूरी जानकारी नहीं दी जा रही थी।
सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि रिकॉर्ड से प्रथम दृष्टया यह संकेत मिल रहे थे कि संपत्ति को “siphon” यानी अलग-अलग माध्यमों से बाहर निकालने की कोशिश की जा रही थी।
गड़बड़ी की आशंका पर हाईकोर्ट का एक्शन
इन सभी परिस्थितियों को देखते हुए बॉम्बे हाईकोर्ट ने मामले को हल्के में नहीं लिया। अदालत ने महसूस किया कि यह सिर्फ सिविल विवाद नहीं है, बल्कि इसमें आपराधिक तत्व भी शामिल हो सकते हैं।
इसी के चलते हाईकोर्ट ने एक बड़ा फैसला लेते हुए पुलिस जांच के आदेश दिए। साथ ही यह भी सुनिश्चित किया गया कि जांच कोर्ट की निगरानी में हो।
इस फैसले को कुछ पक्षों ने सुप्रीम कोर्ट में चुनौती दी। उनका कहना था कि प्रॉबेट कोर्ट को इस तरह की आपराधिक जांच का आदेश देने का अधिकार नहीं है।
सुप्रीम कोर्ट ने हाईकोर्ट के फैसले को बताया सही
सुप्रीम कोर्ट ने सभी दलीलों को सुनने के बाद स्पष्ट रूप से हाईकोर्ट के फैसले का समर्थन किया। कोर्ट ने कहा कि इंडियन सक्सेशन एक्ट एक स्व-निहित कानून (self-contained statute) जरूर है, लेकिन यह किसी को आपराधिक जिम्मेदारी से बचाव नहीं देता।
अगर किसी मामले में धोखाधड़ी, जालसाजी या आपराधिक विश्वासघात के संकेत मिलते हैं, तो कोर्ट कार्रवाई कर सकता है।
कोर्ट ने यह भी कहा कि जैसे ही किसी संपत्ति के लिए एडमिनिस्ट्रेटर नियुक्त होता है, वह संपत्ति “कानून की निगरानी” में आ जाती है।
इसे “in custodia legis” कहा जाता है। ऐसी स्थिति में कोर्ट की जिम्मेदारी और भी बढ़ जाती है।
उसे यह सुनिश्चित करना होता है कि संपत्ति का दुरुपयोग या लूट न हो। अगर अदालत को किसी तरह की अनियमितता नजर आती है, तो वह जांच के आदेश देने के लिए पूरी तरह सक्षम है।
संवैधानिक शक्तियों पर ‘सुप्रीम’ जोर
सुप्रीम कोर्ट ने अपने फैसले में यह भी साफ किया कि हाईकोर्ट की संवैधानिक शक्तियां बहुत व्यापक हैं। प्रॉबेट जूरिस्डिक्शन में बैठते समय भी ये शक्तियां खत्म नहीं होतीं।
कोर्ट ने कहा कि न्याय सुनिश्चित करना अदालत का सर्वोच्च कर्तव्य है। अगर इसके लिए पुलिस जांच जरूरी हो, तो उसमें कोई बाधा नहीं होनी चाहिए।
बेंच ने यह भी कहा कि अगर अदालतें ऐसे मामलों में हस्तक्षेप नहीं करेंगी, तो इससे गलत संदेश जाएगा। यह कानून के शासन (rule of law) को कमजोर कर सकता है।
‘सुप्रीम’ फैसला: हाईकोर्ट का आदेश बरकरार
सुप्रीम कोर्ट ने अपील खारिज करते हुए बॉम्बे हाईकोर्ट के आदेश को बरकरार रखा।
अदालत ने कहा कि रिकॉर्ड में मौजूद परिस्थितियां संपत्ति प्रबंधन में गंभीर गड़बड़ी, संभावित धोखाधड़ी और धन के दुरुपयोग की ओर संकेत करती हैं। इसलिए हाईकोर्ट द्वारा जांच के आदेश देना पूरी तरह उचित था।
सुप्रीम कोर्ट ने स्पष्ट किया कि Probate Court केवल वसीयत की वैधता तय करने तक सीमित नहीं है। यदि संपत्ति को नुकसान पहुंचाने या धन निकालने की कोशिश सामने आती है, तो हाईकोर्ट जांच के आदेश देकर संपत्ति की रक्षा कर सकता है।
क्यों अहम है यह फैसला ?
सुप्रीम कोर्ट का यह फैसला भविष्य के कई मामलों के लिए एक मजबूत उदाहरण बनेगा। अब यह साफ हो गया है कि वसीयत से जुड़े मामलों में अगर कोई गड़बड़ी होती है, तो अदालतें सख्त रुख अपना सकती हैं।
इससे उन लोगों के लिए खतरा बढ़ गया है जो संपत्ति विवादों में फर्जीवाड़ा करने की कोशिश करते हैं। साथ ही यह फैसला ईमानदार पक्षों के लिए राहत की खबर भी है।
अब अदालतें केवल कागजी प्रक्रिया पूरी करने तक सीमित नहीं रहेंगी। वे सक्रिय रूप से यह सुनिश्चित करेंगी कि न्याय हो और संपत्ति सुरक्षित रहे।
‘न्याय की रक्षा के लिए अदालतें अब और सशक्त’
इस पूरे मामले ने यह साफ कर दिया है कि न्यायपालिका केवल विवादों का निपटारा करने वाली संस्था नहीं है। वह समाज में कानून और व्यवस्था बनाए रखने की भी जिम्मेदार है।
सुप्रीम कोर्ट का यह फैसला इसी दिशा में एक मजबूत कदम है। यह न केवल अदालतों की शक्तियों को स्पष्ट करता है, बल्कि यह भी बताता है कि कानून के साथ खिलवाड़ करने वालों को अब आसानी से बचने का मौका नहीं मिलेगा।
आने वाले समय में यह निर्णय कई महत्वपूर्ण मामलों में मार्गदर्शक साबित हो सकता है।