जयपुर। जयपुर महानगर प्रथम के फैमिली कोर्ट संख्या-1 ने भरण-पोषण से जुड़े एक महत्वपूर्ण मामले में स्पष्ट किया है कि CrPC की धारा 125 के तहत पति की मृत्यु के बाद पुत्रवधू अपने सास-ससुर, देवर या अन्य रिश्तेदारों से भरण-पोषण की मांग नहीं कर सकती.
फैमिली कोर्ट ने कहा कि CrPC की धारा 125 दायरा केवल पत्नी, संतान और माता-पिता तक सीमित है।
फैमिली कोर्ट-1 की न्यायाधीश आरती भारद्वाज ने यह आदेश पारित करते हुए पुत्रवधू द्वारा दायर आवेदन को खारिज कर दिया।
इस मामले में प्रार्थिया ने पति की मृत्यु के बाद अपने दो नाबालिग बच्चों के साथ धारा 125 सीआरपीसी के तहत अपने सास-ससुर और देवर के विरुद्ध भरण-पोषण की मांग करते हुए न्यायालय में प्रार्थना पत्र पेश किया था।
मामला क्या था
पति की मृत्यु के बाद प्रार्थिया ने अदालत से निवेदन किया था कि उसे और उसके दो नाबालिग बच्चों को आर्थिक सहायता की आवश्यकता है, इसलिए ससुराल पक्ष—विशेष रूप से सास-ससुर और देवर—को भरण-पोषण देने का आदेश दिया जाए.
प्रार्थिया पुत्रवधू का तर्क था कि पति की अनुपस्थिति और पारिवारिक परिस्थितियों के कारण ससुराल पक्ष की जिम्मेदारी बनती है कि वे उसकी और बच्चों की देखभाल करें।
प्रार्थिया ने यह भी कहा कि बच्चों की देखभाल और उनकी शिक्षा-दीक्षा के लिए आर्थिक सहयोग आवश्यक है, और चूंकि ससुराल पक्ष आर्थिक रूप से सक्षम है, इसलिए उनसे भरण-पोषण की मांग न्यायसंगत है।
सास ससुर का पक्ष
मामले की सुनवाई के दौरान ससुर की ओर से न्यायमित्र के रूप में एडवोकेट डी.एस. शेखावत ने पैरवी करते हुए कहा कि दण्ड प्रक्रिया संहिता की धारा 125 में सास-ससुर, देवर या दादा-दादी से भरण-पोषण मांगने का कोई प्रावधान नहीं है।
इसलिए इस धारा के तहत दायर आवेदन विधिक रूप से स्वीकार्य नहीं है और इसे खारिज किया जाना चाहिए।
न्यायमित्र ने कहा कि धारा 125 सीआरपीसी का उद्देश्य ऐसे व्यक्तियों को त्वरित राहत प्रदान करना है जो स्वयं अपना भरण-पोषण करने में सक्षम नहीं हैं, लेकिन यह जिम्मेदारी कानून ने स्पष्ट रूप से पति, पिता या संतान जैसे निकटतम संबंधों पर ही निर्धारित की है।
न्यायमित्र ने यह भी तर्क दिया कि यदि प्रार्थिया ससुराल पक्ष से भरण-पोषण का दावा करना चाहती है, तो उसके लिए अन्य वैधानिक उपाय उपलब्ध हैं, जैसे कि संबंधित सिविल कानूनों के अंतर्गत दावा प्रस्तुत करना। धारा 125 के तहत इस प्रकार का दावा करना कानून की मंशा के विपरीत है।
साथ ही यह भी बताया गया कि हिन्दू कानूनों के तहत कुछ परिस्थितियों में विधवा और उसके बच्चों को ससुराल की संपत्ति में अधिकार मिल सकता है, लेकिन वह प्रक्रिया अलग है और उसे धारा 125 सीआरपीसी के साथ जोड़कर नहीं देखा जा सकता।
फैमिली कोर्ट का निर्णय
फैमिली कोर्ट ने दोनों पक्षों की दलीलों को सुनने के बाद धारा 125 सीआरपीसी के प्रावधानों का विस्तार से विश्लेषण किया।
अदालत ने अपने आदेश में कहा कि यह धारा विशेष रूप से उन मामलों के लिए बनाई गई है जहां पत्नी, नाबालिग संतान या माता-पिता अपने निकटतम वैधानिक संबंधों—जैसे पति या संतान—से भरण-पोषण मांग सकते हैं।
अदालत ने स्पष्ट किया कि इस धारा में कहीं भी सास-ससुर, देवर, दादा-दादी या अन्य रिश्तेदारों से भरण-पोषण मांगने का उल्लेख नहीं है। इसलिए इस धारा का विस्तार करते हुए ऐसे रिश्तेदारों पर भरण-पोषण की जिम्मेदारी डालना कानून की सीमा से बाहर होगा।
फैमिली कोर्ट ने यह भी कहा कि हिन्दू विवाह अधिनियम या अन्य व्यक्तिगत कानूनों के अंतर्गत यदि कोई अधिकार उपलब्ध है, तो उसके लिए अलग से उचित मंच और प्रक्रिया निर्धारित है। धारा 125 सीआरपीसी और अन्य सिविल कानूनों की धाराओं को मिलाकर नहीं देखा जा सकता।
फैमिली कोर्ट ने यह महत्वपूर्ण टिप्पणी भी की कि धारा 125 सीआरपीसी एक सारांश (summary) प्रकृति की कार्यवाही है, जिसका उद्देश्य जरूरतमंद व्यक्तियों को शीघ्र राहत प्रदान करना है।
वहीं, ससुराल की संपत्ति में अधिकार या पारिवारिक संपत्ति से संबंधित दावे अलग सिविल प्रक्रिया के अंतर्गत आते हैं, जिनकी सुनवाई अलग तरीके से की जाती है।
अदालत ने कहा कि यदि इन दोनों प्रक्रियाओं को एक-दूसरे के साथ मिलाकर देखा जाएगा, तो कानून की संरचना और उद्देश्य प्रभावित होगा। इसलिए भरण-पोषण से संबंधित दावों में यह देखना आवश्यक है कि दावा किस कानून के अंतर्गत किया जा रहा है और उस कानून की सीमाएं क्या हैं।
आवेदन खारिज
सभी तथ्यों और दलीलों के बाद अदालत ने प्रार्थिया द्वारा धारा 125 सीआरपीसी के तहत सास-ससुर और देवर के विरुद्ध किया गया दावे को खारिज कर दिया हैं.