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ITAT रिश्वत कांड: महिला जज एस. सीतालक्ष्मी को राजस्थान हाईकोर्ट से झटका, दूसरी जमानत याचिका खारिज

Rajasthan High Court Rejects Second Bail Plea of ITAT Judicial Member in Alleged Bribery Case

जयपुर। राजस्थान हाईकोर्ट ने आयकर अपीलीय अधिकरण (ITAT) की जज एस. सीतालक्ष्मी को बड़ा झटका देते हुए उनकी दूसरी जमानत याचिका खारिज कर दी है।

कोर्ट ने कहा कि आरोपी के खिलाफ लगे भ्रष्टाचार और रिश्वतखोरी के आरोप प्रथमदृष्टया गंभीर प्रकृति के हैं तथा इस स्तर पर जमानत देना उचित नहीं होगा।

जस्टिस चन्द्र प्रकाश श्रीमाली ने रिपोर्टेबल जजमेंट के जरिए जमानत याचिका को खारिज करने का फैसला सुनाया है।

क्या है मामला

सीबीआई द्वारा दर्ज मामले के अनुसार एस. सीतालक्ष्मी पर आरोप है कि उन्होंने एक निजी कंपनी के पक्ष में आदेश पारित कर लगभग 90 करोड़ रुपये की पेनल्टी में राहत दी और इसके बदले रिश्वत ली।

जांच एजेंसी का दावा है कि कथित रिश्वत राशि में से 30 लाख रुपये आरोपी के सरकारी वाहन से बरामद किए गए थे। कोर्ट में पेश रिकॉर्ड के अनुसार यह रकम सह-अभियुक्त चार्टर्ड अकाउंटेंट विजय गोयल के माध्यम से पहुंचाई गई थी।

सीबीआई ने अदालत को यह भी बताया कि जांच के दौरान आरोपी के कब्जे से एक महंगा नेकलेस और आईफोन 17 प्रो मैक्स 512 जीबी बरामद हुआ, जिन्हें कथित तौर पर रिश्वत के रूप में प्राप्त किया गया था।

जांच एजेंसी ने सरकारी वाहन चालक के बयान और सीसीटीवी फुटेज का हवाला देते हुए दावा किया कि रिश्वत राशि आरोपी के सरकारी वाहन में लाई गई थी।

बचाव पक्ष की दलीलें

बचाव पक्ष ने कोर्ट से कहा कि अभियोजन स्वीकृति निर्धारित समय सीमा में जारी नहीं हुई, इसलिए आरोपी को जमानत दी जानी चाहिए।

अधिवक्ता ने कहा कि पहली जमानत याचिका पहले ही खारिज हो चुकी थी, लेकिन अब परिस्थितियों में बदलाव आया है, इसलिए दूसरी जमानत याचिका सुनवाई योग्य है।

बचाव पक्ष ने दलील दी कि 22 जनवरी 2026 को आरोप पत्र पेश होने के बाद भी अब तक अभियोजन स्वीकृति जारी नहीं हुई थी, जबकि भ्रष्टाचार निवारण अधिनियम की धारा 19 के तहत निर्धारित समयावधि में स्वीकृति दी जानी चाहिए।

अधिवक्ता ने कहा कि इस देरी से आरोपी के संवैधानिक अधिकार प्रभावित हुए हैं और यह जमानत का आधार बनता है।

बचाव पक्ष ने यह भी दलील दी कि सह-अभियुक्तों — सुहानी मेहरवाल, मनीष शर्मा और कंपनी निदेशक सुमेर सिंह सैनी — को पहले ही जमानत मिल चुकी है तथा आरोपी महिला हैं और उनके 89 वर्षीय ससुर गंभीर रूप से बीमार हैं।

साथ ही यह भी कहा गया कि आरोपी का जयपुर से जबलपुर तबादला हो चुका है, इसलिए गवाहों को प्रभावित करने की आशंका नहीं है।

याचिकाकर्ता की ओर से यह भी तर्क दिया गया कि कथित रिश्वत राशि आरोपी के व्यक्तिगत कब्जे से बरामद नहीं हुई थी और सीबीआई यह स्पष्ट नहीं कर पाई कि कथित काले बैग में रखी रकम वास्तव में आरोपी के लिए थी।

सीबीआई ने किया विरोध

सीबीआई की ओर से विशेष लोक अभियोजक ने जमानत याचिका का कड़ा विरोध किया।

सीबीआई ने अदालत को बताया कि एस. सीतालक्ष्मी उस समय आयकर अपीलीय अधिकरण में न्यायिक सदस्य थीं और उन्होंने एक निजी कंपनी के पक्ष में आदेश पारित कर लगभग 90 करोड़ रुपये की पेनल्टी में राहत दी थी।

जांच एजेंसी का आरोप था कि इसके बदले 50 लाख रुपये की रिश्वत तय हुई, जिसमें से 30 लाख रुपये आरोपी तक पहुंचाए गए।

सीबीआई ने कोर्ट को बताया कि कथित रिश्वत राशि आरोपी के सरकारी वाहन से बरामद हुई थी और सरकारी वाहन चालक के बयान तथा सीसीटीवी रिकॉर्डिंग से इस तथ्य की पुष्टि होती है।

जांच एजेंसी ने यह भी कहा कि आरोपी के कब्जे से एक नेकलेस और आईफोन 17 प्रो मैक्स 512 जीबी भी बरामद हुए, जिन्हें रिश्वत के रूप में प्राप्त किया गया था।

सीबीआई ने दलील दी कि आरोपी के खिलाफ आरोप बेहद गंभीर हैं और अभी महत्वपूर्ण गवाहों के बयान दर्ज होने बाकी हैं।

एजेंसी ने कहा कि केवल महिला होने या सह-अभियुक्तों को जमानत मिलने के आधार पर आरोपी को राहत नहीं दी जा सकती, क्योंकि उनकी भूमिका अलग और अधिक गंभीर है।

हाईकोर्ट का फैसला

हालांकि, हाईकोर्ट ने इन दलीलों को स्वीकार करने से इनकार कर दिया। दोनों पक्षों की दलीलें सुनने के बाद हाईकोर्ट ने माना कि प्रथमदृष्टया आरोपी के खिलाफ गंभीर आरोप और पर्याप्त सामग्री मौजूद है।

कोर्ट ने स्पष्ट कहा कि केवल महिला होने, बीमारी या अभियोजन स्वीकृति में देरी के आधार पर जमानत का अधिकार स्वतः उत्पन्न नहीं होता।

अदालत ने माना कि मामले में अभी महत्वपूर्ण गवाहों के बयान बाकी हैं और आरोपी को रिहा किए जाने पर जांच एवं ट्रायल प्रभावित होने की आशंका से इनकार नहीं किया जा सकता।

हाईकोर्ट ने यह भी कहा कि सह-अभियुक्तों को मिली जमानत का लाभ एस. सीतालक्ष्मी को नहीं दिया जा सकता, क्योंकि मामले में उनकी भूमिका अलग और अधिक गंभीर बताई गई है।

अदालत ने दूसरी जमानत याचिका खारिज करते हुए ट्रायल कोर्ट को मामले की शीघ्र सुनवाई सुनिश्चित करने के निर्देश दिए।

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