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अपील कोर्ट को सज़ा पलटने का अधिकार, भले आरोपी ने अपील न की हो: सुप्रीम कोर्ट

Supreme Court: Appellate Courts Can Modify Sentence Even Without Accused’s Appeal
सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि अपील कोर्ट आरोपी की अपील के बिना भी सज़ा को पलट या बदल सकता है। कोर्ट ने CrPC की धारा 386 के तहत अपने व्यापक अधिकार स्पष्ट किए।

नई दिल्ली: सुप्रीम कोर्ट ने एक महत्वपूर्ण फैसले में स्पष्ट किया है कि अपील कोर्ट आरोपी द्वारा सज़ा को चुनौती न दिए जाने के बावजूद भी सज़ा को पलट, बदल या बरकरार रख सकता है।

कोर्ट ने अपने फैसले में स्पष्ट किया है कि अपील कोर्ट को सज़ा में हस्तक्षेप करने से केवल इस आधार पर नहीं रोका जा सकता कि आरोपी ने खुद उस सज़ा को चुनौती नहीं दी है।

जस्टिस Vikram Nath और जस्टिस Sandeep Mehta की खंडपीठ ने कहा कि अपीलीय अदालत को ट्रायल कोर्ट के निष्कर्षों और सज़ा की सत्यता की जांच करने का पूरा अधिकार है।

मामला State of Assam vs Moinul Haque @ Monu से जुड़ा है, जिसमें असम राज्य ने आरोपी को बरी किए जाने के खिलाफ अपील दायर की थी।

किसने क्या दलील दी?

राज्य की ओर से कहा गया कि आरोपी को गंभीर अपराधों में गलत तरीके से राहत दी गई है और फैसले में त्रुटियां हैं।

वहीं, आरोपी की ओर से सज़ा को लेकर कोई अलग अपील दायर नहीं की गई थी।

अदालत ने क्या कहा?

बेंच ने स्पष्ट कहा

अपील कोर्ट को यह अधिकार है कि वह ट्रायल कोर्ट के निष्कर्षों और सज़ा की सच्चाई की जांच करे और न्याय के हित में उसे पलटे, बदले या पक्का करे।

साथ ही कोर्ट ने कहा, “आरोपी द्वारा अपील न करना अपने आप में कोर्ट के अपीलीय अधिकार को सीमित नहीं करता।

क्या है पूरा विवाद?

यह मामला असम राज्य में मर्डर और रेप के आरोपों से जुड़ा था, जिसमें हाईकोर्ट ने आरोपी को इन गंभीर आरोपों से बरी कर दिया था। हालांकि, उसे IPC की धारा 201 (सबूत मिटाने) के तहत दोषी ठहराया गया।

सुप्रीम कोर्ट के सामने सवाल यह था कि क्या बिना आरोपी की अपील के, सज़ा में बदलाव किया जा सकता है।

सुनवाई के दौरान कोर्ट ने पाया कि सबूतों की पहचान में गंभीर खामियां थीं, हाईकोर्ट ने IPC धारा 201 के तहत सज़ा बरकरार रखने में त्रुटि की। इसलिए सज़ा में हस्तक्षेप जरूरी है।

कानूनी सिद्धांत

सुप्रीम कोर्ट ने CrPC की धारा 386 (अब भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता, 2023 की धारा 427) की व्याख्या करते हुए कहा कि अपीलीय अदालत के पास व्यापक अधिकार हैं।

इन अधिकारों के तहत कोर्ट:

  • सज़ा को पलट सकता है।
  • सज़ा में बदलाव कर सकता है।
  • या उसे बरकरार रख सकता है।

यह अधिकार न्याय के हित में इस्तेमाल किया जा सकता है, भले ही आरोपी ने खुद अपील न की हो।

क्या दिया आदेश

सुप्रीम कोर्ट ने माना कि हाईकोर्ट ने IPC की धारा 201 के तहत सज़ा को बरकरार रखने में गलती की।

अदालत ने अपने अपीलीय अधिकारों का इस्तेमाल करते हुए आरोपी को इस आरोप से भी बरी कर दिया।

क्यों अहम है फैसला

यह फैसला अपीलीय अदालतों की शक्तियों को स्पष्ट करता है और यह सुनिश्चित करता है कि न्याय केवल तकनीकी आधार पर सीमित न हो।

कोर्ट ने यह साफ कर दिया कि न्यायिक प्रक्रिया का उद्देश्य सही निष्कर्ष तक पहुंचना है, चाहे इसके लिए सज़ा में हस्तक्षेप ही क्यों न करना पड़े।

न्यायालय का उद्देश्य केवल अपील तक सीमित नहीं है, बल्कि इस फैसले से यह स्पष्ट हो गया है कि न्यायालय का उद्देश्य केवल अपील तक सीमित नहीं है, बल्कि न्याय सुनिश्चित करना है-भले ही आरोपी ने खुद सज़ा को चुनौती न दी हो।

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