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NDPS मामलों में बेल पर सुप्रीम कोर्ट सख्त: स्पीडी ट्रायल का अधिकार धारा 37 की शर्तों को नहीं कर सकता दरकिनार

सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि NDPS Act में बेल के लिए धारा 37 की शर्तें जरूरी हैं, और स्पीडी ट्रायल का अधिकार इन्हें ओवरराइड नहीं कर सकता।

नई दिल्ली: सुप्रीम कोर्ट ने एक महत्वपूर्ण रुख अपनाते हुए स्पष्ट किया है कि संविधान के अनुच्छेद 21 के तहत मिलने वाला ‘स्पीडी ट्रायल’ (त्वरित सुनवाई) का अधिकार, NDPS Act (Narcotic Drugs and Psychotropic Substances) के तहत बेल देने के लिए निर्धारित कड़े प्रावधानों को दरकिनार नहीं कर सकता।

जस्टिस संजय करोल (Justice Sanjay Karol) और जस्टिस ऑगस्टीन जॉर्ज मसीह की खंडपीठ ने यह टिप्पणी करते हुए Punjab and Haryana High Court द्वारा दिए गए बेल आदेश को रद्द कर दिया।

कोर्ट ने आरोपियों को निर्देश दिया कि वे एक सप्ताह के भीतर ट्रायल कोर्ट के समक्ष आत्मसमर्पण करें।

हाईकोर्ट का फैसला रद्द

मामला State of Punjab vs Sukhwinder Singh @ Gora से जुड़ा है, जिसमें राज्य सरकार ने हाईकोर्ट द्वारा दी गई जमानत को सुप्रीम कोर्ट में चुनौती दी थी।

सुप्रीम कोर्ट ने Punjab and Haryana High Court द्वारा दिए गए बेल आदेश को रद्द कर दिया और आरोपियों को एक सप्ताह के भीतर ट्रायल कोर्ट में सरेंडर करने का निर्देश दिया।

किसने क्या दलील दी

आरोपियों की ओर से कहा गया कि वे दो साल से अधिक समय से जेल में हैं और ट्रायल धीमा चल रहा है, जिससे उनके मौलिक अधिकारों का उल्लंघन हो रहा है।

वहीं, राज्य ने तर्क दिया कि NDPS Act में बेल के लिए सख्त शर्तें हैं, जिन्हें नजरअंदाज नहीं किया जा सकता।

कोर्ट ने क्या कहा

बेंच ने स्पष्ट कहा,

स्पीडी ट्रायल का अधिकार महत्वपूर्ण है, लेकिन NDPS Act जैसे विशेष कानून में इसे धारा 37 के प्रावधानों के साथ ही पढ़ा जाएगा, उसके स्थान पर नहीं।

अदालत ने यह भी कहा, “धारा 37 के तहत जरूरी संतुष्टि दर्ज किए बिना बेल देना कानून के खिलाफ है।

क्या है पूरा विवाद

यह मामला 10 जनवरी 2024 को पंजाब के तरनतारन जिले में दर्ज एक FIR से जुड़ा है।

  • पुलिस ने वाहन जांच के दौरान 1.465 किलोग्राम हेरोइन बरामद की।
  • यह मात्रा “कमर्शियल क्वांटिटी” की श्रेणी में आती है।
  • NDPS Act की धारा 21(c) और 29 के तहत मामला दर्ज हुआ।

इस मामले में हाईकोर्ट ने यह कहते हुए बेल दे दी कि आरोपी 2 साल से ज्यादा समय से जेल में हैं और 24 में से केवल 2 गवाहों की ही जांच हुई है

सुप्रीम कोर्ट के सामने सवाल था कि क्या केवल देरी के आधार पर NDPS जैसे मामलों में बेल दी जा सकती है।

कानूनी सिद्धांत (Legal Principle)

सुप्रीम कोर्ट ने NDPS Act की धारा 37(1)(b)(ii) के “ट्विन कंडीशंस” को अनिवार्य बताया:

  • कोर्ट को संतुष्ट होना होगा कि आरोपी प्रथम दृष्टया दोषी नहीं है।
  • और वह जमानत पर रहते हुए कोई अपराध नहीं करेगा।

कोर्ट ने कहा कि इन शर्तों को पूरा किए बिना बेल देना कानूनी रूप से टिकाऊ नहीं है, भले ही ट्रायल में देरी हो रही हो।

अदालत ने Narcotics Control Bureau vs Kashif और State of Meghalaya vs Lalrintluanga Sailo जैसे फैसलों का हवाला देते हुए कहा कि NDPS मामलों में बेल के नियम सख्ती से लागू होते हैं।

साथ ही Parwinder Singh vs State of Punjab केस में कोर्ट के उस अवलोकन को दोहराया गया, जिसमें कहा गया था कि पंजाब जैसे राज्यों में ड्रग्स की गंभीर समस्या को देखते हुए अदालतों को बेल देने में अत्यधिक सतर्क रहना चाहिए।

ड्रग्स के बढ़ते खतरे पर कोर्ट की चिंता

सुप्रीम कोर्ट ने यह भी माना कि विशेष रूप से पंजाब जैसे राज्यों में ड्रग्स का खतरा एक गंभीर सामाजिक समस्या बन चुका है। ऐसे में अदालतों को बेल देते समय अतिरिक्त सावधानी बरतनी चाहिए ताकि समाज पर इसका नकारात्मक प्रभाव न पड़े।

क्यों अहम है फैसला?

यह फैसला स्पष्ट करता है कि विशेष कानूनों में तय सख्त शर्तों को मौलिक अधिकारों के आधार पर कमजोर नहीं किया जा सकता। सुप्रीम कोर्ट ने साफ किया कि NDPS जैसे गंभीर मामलों में बेल देना एक अपवाद है, नियम नहीं।

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