हाईकोर्ट ने कहा-अगर जांच के दौरान गिरफ्तारी आवश्यक नहीं समझी गई, तो केवल जमानत के लिए आरोपी को हिरासत में लेना उचित नहीं
जोधपुर। राजस्थान हाईकोर्ट ने चार्जशीट दायर होने के बाद गिरफ्तारी से जुड़े एक मामले में रिपोर्टेबल जजमेंट के जरिए महत्वपूर्ण फैसला सुनाते हुए आपराधिक न्याय प्रणाली में व्यक्तिगत स्वतंत्रता (Personal Liberty) के सिद्धांत को फिर से मजबूती प्रदान की है।
राजस्थान हाईकोर्ट ने स्पष्ट किया कि यदि जांच के दौरान आरोपी की गिरफ्तारी आवश्यक नहीं समझी गई, तो केवल चार्जशीट दाखिल होने के बाद उसे हिरासत में लेना और जमानत के लिए मजबूर करना कानून के अनुरूप नहीं है।
जस्टिस बलजिंदर सिंह संधू की एकलपीठ ने यह रिपोर्टेबल जजमेंट अतीक मोहम्मद व अन्य की ओर से दायर याचिका पर सुनवाई करते हुए दिया है।
याचिका में याचिकाकर्ताओं ने जोधपुर महानगर के मुख्य न्यायिक मजिस्ट्रेट द्वारा जारी जमानती वारंट को चुनौती दी थी। हाईकोर्ट ने जमानती वारंट के आदेश को रद्द करते हुए जांच एजेंसियों के लिए महत्वपूर्ण दिशानिर्देश भी स्थापित किए।
मामला क्या था?
यह पूरा मामला एक मारवाड़ एज्युकेशनल एंड वेलफेयर सोसायटी के प्रबंधन से जुड़ा हुआ है।
मामले में याचिकाकर्ताओं—मोहम्मद अतीक, मोहम्मद अली चुंदरीगर, निसार अहमद खिलजी और अताउर्रहमान कुरैशी—पर धोखाधड़ी और दस्तावेजों में जालसाजी के आरोप लगाए गए थे।
आरोप लगाया गया कि सोसायटी के संविधान में बदलाव कर वित्तीय अनियमितताओं को छिपाया गया तथा बैठक की कार्यवाही (Minutes) में हेरफेर की गई।
हालांकि, यह विवाद मुख्य रूप से प्रशासनिक और सिविल प्रकृति का बताया गया और इस विषय पर सिविल न्यायालय में भी मामला लंबित है।
जांच एजेंसी ने पूरे मामले की जांच की और अंततः चार्जशीट दाखिल की।
महत्वपूर्ण बात यह थी कि जांच के दौरान किसी भी याचिकाकर्ता को गिरफ्तार नहीं किया गया।
ट्रायल कोर्ट का आदेश और विवाद
चार्जशीट दाखिल होने के बाद जब आरोपी ट्रायल कोर्ट में उपस्थित नहीं हुए, तो मुख्य न्यायिक मजिस्ट्रेट ने उनके खिलाफ जमानती वारंट जारी कर दिए और यह टिप्पणी की कि उनकी जमानत पर विचार उनकी उपस्थिति के बाद किया जाएगा।
याचिकाकर्ताओं ने इस आदेश को हाईकोर्ट में चुनौती दी और कहा कि जांच के दौरान गिरफ्तारी आवश्यक नहीं समझी गई।
याचिकाकर्ताओं का पक्ष
याचिकाकर्ताओं की ओर से वरिष्ठ अधिवक्ता मनीष सिंघवी, वसिम खान, मोनिस खान, फिरोज खान व अन्य ने अदालत को बताया कि ट्रायल कोर्ट द्वारा जारी किया गया आदेश न केवल कानून के विपरीत है, बल्कि यह व्यक्तिगत स्वतंत्रता के मौलिक अधिकार का भी उल्लंघन करता है।
अधिवक्ता ने कहा कि सबसे पहले यह कहा गया कि जिस विवाद को आपराधिक रूप दिया गया है, वह मूलतः एक सोसायटी के प्रबंधन से जुड़ा सिविल विवाद है।
आरोप है कि सोसायटी के संविधान में संशोधन कर वित्तीय अनियमितताओं को छिपाया गया और बैठक की कार्यवाही में हेरफेर की गई, लेकिन इस विषय पर पहले से ही सिविल न्यायालय में मुकदमा लंबित है। ऐसे में आपराधिक कार्यवाही को अनावश्यक रूप से आगे बढ़ाया जा रहा है।
वरिष्ठ अधिवक्ता ने कहा कि जांच एजेंसी ने पूरी जांच के दौरान कभी गिरफ्तारी आवश्यक नहीं समझी और सभी याचिकाकर्ता लगातार जांच में सहयोग करते रहे,
उनके खिलाफ कोई ऐसा आरोप नहीं है जिससे यह लगे कि वे फरार हो सकते हैं या साक्ष्यों से छेड़छाड़ करेंगे।
एक महत्वपूर्ण तर्क यह भी दिया गया कि प्रारंभिक जांच में तो निगेटिव फाइनल रिपोर्ट (क्लोजर रिपोर्ट) प्रस्तावित की गई थी, लेकिन बाद में चार्जशीट दाखिल कर दी गई। इससे यह संकेत मिलता है कि मामला स्वयं में स्पष्ट और मजबूत नहीं है।
याचिकाकर्ताओं ने धारा 170 CrPC का हवाला देते हुए कहा कि इस धारा के तहत हर आरोपी को गिरफ्तार करना अनिवार्य नहीं है, “कस्टडी” का अर्थ केवल कोर्ट के समक्ष प्रस्तुत होना है, न कि जेल भेजना।
वरिष्ठ अधिवक्ता ने सुप्रीम कोर्ट के महत्वपूर्ण फैसलों का भी उल्लेख किया जिसमें Siddharth vs State of UP — जिसमें कहा गया कि चार्जशीट दाखिल करते समय गिरफ्तारी जरूरी नहीं, Satender Kumar Antil vs CBI — जिसमें कहा गया कि बिना गिरफ्तारी के भी ट्रायल आगे बढ़ सकता है और
Inder Mohan Goswami केस — जिसमें वारंट जारी करने में सावधानी बरतने की बात कही गई है।
याचिकाकर्ताओं का मुख्य तर्क यह था कि जब जांच एजेंसी ने गिरफ्तारी जरूरी नहीं समझी, तो केवल जमानत पर विचार करने के लिए उन्हें हिरासत में लेना पूरी तरह से अनुचित और कानून के खिलाफ है।
सरकार और प्रतिवादी पक्ष की दलीलें
राज्य सरकार और परिवादी शौकत अली की ओर से याचिका का विरोध करते हुए कहा गया कि ट्रायल कोर्ट का आदेश पूरी तरह से वैध और न्यायसंगत है।
सरकारी वकील (Public Prosecutor) ने तर्क दिया कि जब चार्जशीट दाखिल हुई, उस समय याचिकाकर्ता कोर्ट में उपस्थित नहीं हुए। ऐसे में ट्रायल कोर्ट के पास यह अधिकार है कि वह उनकी उपस्थिति सुनिश्चित करने के लिए वारंट जारी करे।
अधिवक्ता ने कहा कि जमानत पर विचार करना ट्रायल कोर्ट का विवेकाधिकार (discretion) है।
प्रतिवादी पक्ष ने यह भी कहा कि अभी तक ट्रायल कोर्ट ने कोई कठोर या अंतिम आदेश पारित नहीं किया है केवल यह कहा गया है कि आरोपी की उपस्थिति के बाद जमानत पर विचार किया जाएगा।
इसलिए याचिकाकर्ताओं की आशंका कि उन्हें अनावश्यक रूप से हिरासत में लिया जाएगा, केवल आशंका मात्र है।
अधिवक्ता ने यह भी दलील दी कि यदि आरोपी कोर्ट में उपस्थित नहीं होते, तो न्यायिक प्रक्रिया बाधित होती है, इसलिए उनकी उपस्थिति सुनिश्चित करना आवश्यक है।
अधिवक्ता ने कहा कि कानून ट्रायल कोर्ट को यह अधिकार देता है कि वह आरोपी को पेश होने के लिए बाध्य करे, यदि आरोपी सहयोग नहीं करते, तो वारंट जारी करना एक उचित कदम है।
हाईकोर्ट का फैसला
दोनों पक्षों की दलीलों में हाईकोर्ट ने याचिकाकर्ताओं के पक्ष को अधिक मजबूत मानते हुए यह स्पष्ट किया कि केवल चार्जशीट दाखिल होने के बाद आरोपी को हिरासत में लेना आवश्यक नहीं है, खासकर जब उसने जांच में सहयोग किया हो और गिरफ्तारी की जरूरत पहले नहीं पड़ी हो।
हाईकोर्ट ने मामले की सुनवाई के दौरान कई अहम बिंदुओं पर फैसला दिया
गिरफ्तारी अनिवार्य नहीं — कोर्ट ने कहा कि केवल चार्जशीट दाखिल होने के आधार पर गिरफ्तारी जरूरी नहीं है।
व्यक्तिगत स्वतंत्रता सर्वोपरि— कोर्ट ने कहा कि किसी व्यक्ति की स्वतंत्रता को बिना उचित कारण के सीमित करना संविधान के मूल सिद्धांतों के खिलाफ है।
वारंट जारी करने में सावधानी जरूरी— यदि आरोपी की उपस्थिति समन के माध्यम से सुनिश्चित की जा सकती है, तो वारंट जारी करना अनुचित है।
जांच एजेंसी का आकलन महत्वपूर्ण—यदि जांच एजेंसी ने गिरफ्तारी आवश्यक नहीं समझी, तो कोर्ट को भी उसी दृष्टिकोण को ध्यान में रखना चाहिए।
सुप्रीम कोर्ट के फैसलों का हवाला —हाईकोर्ट ने अपने निर्णय में सुप्रीम कोर्ट के कई ऐतिहासिक फैसलों का उल्लेख किया:
Siddharth बनाम State of UP
Satender Kumar Antil बनाम CBI
Inder Mohan Goswami केस
हाईकोर्ट का अंतिम फैसला
राजस्थान हाईकोर्ट ने इस मामले में ट्रायल कोर्ट द्वारा जारी जमानती वारंट को रद्द करने का आदेश देते हुए कहा कि कहा कि आरोपी को केवल जमानत पर विचार के लिए हिरासत में लेना उचित नहीं।
हाईकोर्ट ने सभी याचिकाकर्ताओं को अगली तारीख पर कोर्ट में पेश होने के आदेश दिए हैं।
हाईकोर्ट ने ट्रायल कोर्ट को व्यक्तिगत मुचलका और जमानत बांड स्वीकार करने के निर्देश दिए।
साथ ही यह भी स्पष्ट किया गया कि आरोपी ट्रायल के दौरान कोर्ट की शर्तों का पालन करेंगे।
फैसला क्यों महत्वपूर्ण
राजस्थान हाईकोर्ट ने का यह फैसला पूरे देश की आपराधिक न्याय प्रणाली के लिए एक महत्वपूर्ण मार्गदर्शक सिद्ध हो सकता है, जिसमें अनावश्यक गिरफ्तारी पर रोक
की बात कहता है।
कोर्ट ने कहा कि यह निर्णय स्पष्ट करता है कि गिरफ्तारी कोई सामान्य प्रक्रिया नहीं, बल्कि अंतिम विकल्प है।
यह फैसला नागरिकों के मौलिक अधिकार—विशेष रूप से व्यक्तिगत स्वतंत्रता—को मजबूत करता है।
कोर्ट ने स्पष्ट किया कि समाज के हित और व्यक्ति की स्वतंत्रता के बीच संतुलन बनाए रखना आवश्यक है।
