नई दिल्ली: देशभर की अदालतों में लंबे समय से चली आ रही बुनियादी समस्याओं जैसे अधूरी सुविधाएं, तकनीकी कमी और मामलों में देरी को दूर करने की दिशा में एक बड़ा कदम उठाया गया है।
सुप्रीम कोर्ट के चीफ जस्टिस सूर्यकांत ने देशभर की अदालतों के आधुनिकीकरण और न्यायिक ढांचे को मजबूत करने के लिए एक बड़ी पहल की है।
सुप्रीम कोर्ट ने “Judicial Infrastructure Advisory Committee” का गठन किया है, जो भारत की न्यायिक व्यवस्था के लिए 40 हजार करोड़ से 50 हजार करोड़ रुपये तक की जरूरत का विस्तृत खाका तैयार करेगी।
यह समिति देशभर की अदालतों में बुनियादी सुविधाओं, डिजिटल इंफ्रास्ट्रक्चर, ई-कोर्ट सिस्टम, आधुनिक कोर्ट कॉम्प्लेक्स और न्यायिक कर्मचारियों की कार्य परिस्थितियों में सुधार के लिए सुझाव देगी।
समिति अपनी रिपोर्ट केंद्र सरकार को सौंपेगी ताकि आने वाले वर्षों में न्यायिक ढांचे के बड़े स्तर पर विस्तार और आधुनिकीकरण की योजना बनाई जा सके।
अदालतों के लिए बनेगा 50 हजार करोड़ रुपये तक का रोडमैप
सुप्रीम कोर्ट के महासचिव भारत पराशर द्वारा 8 मई 2026 को जारी संचार के अनुसार समिति का मुख्य उद्देश्य देशभर की अदालतों की वास्तविक आधारभूत जरूरतों का आकलन करना है।
समिति यह तय करेगी कि अदालतों के बुनियादी ढांचे को मजबूत करने, डिजिटल सिस्टम विकसित करने और आधुनिक सुविधाएं उपलब्ध कराने के लिए कितनी वित्तीय सहायता की आवश्यकता होगी।
अनुमान है कि इसके लिए 40 हजार करोड़ से 50 हजार करोड़ रुपये तक का बड़ा वित्तीय पैकेज प्रस्तावित किया जा सकता है।
यह प्रस्ताव प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की आर्थिक सलाहकार परिषद के सदस्य Sanjeev Sanyal के समक्ष रखा जाएगा।
सुप्रीम कोर्ट जज अरविंद कुमार होंगे समिति के अध्यक्ष
सुप्रीम कोर्ट ने इस समिति की कमान जस्टिस अरविंद कुमार को सौंपी है। उन्हें समिति का अध्यक्ष बनाया गया है।
समिति में कई हाईकोर्ट जज और वरिष्ठ अधिकारी भी शामिल किए गए हैं।
समिति के प्रमुख सदस्य:
- केंद्रीय लोक निर्माण विभाग (CPWD) के महानिदेशक
- जस्टिस अरविंद कुमार (अध्यक्ष)
- जस्टिस देबांगसु बसाक (कलकत्ता हाईकोर्ट)
- जस्टिस अश्विनी कुमार मिश्रा (पंजाब-हरियाणा हाईकोर्ट)
- जस्टिस सोमशेखर सुंदरासन (बॉम्बे हाईकोर्ट)
सुप्रीम कोर्ट के महासचिव समिति के सदस्य सचिव के रूप में काम करेंगे।
अदालतों की कौन-कौन सी कमियां खोजेगी समिति?
समिति को देश की न्याय व्यवस्था में मौजूद आधारभूत ढांचे की कमियों की पहचान करने की जिम्मेदारी दी गई है।
इसके तहत अदालतों में:
- कोर्ट रूम की कमी,
- जजों और स्टाफ के लिए सुविधाएं,
- वकीलों और पक्षकारों के बैठने की व्यवस्था,
- रिकॉर्ड मैनेजमेंट,
- डिजिटल फाइलिंग,
- इंटरनेट और तकनीकी ढांचे
जैसे मुद्दों का अध्ययन किया जाएगा।
समिति यह भी देखेगी कि अदालतों में आने वाले आम लोगों के लिए सुविधाओं को कैसे बेहतर बनाया जा सकता है ताकि न्यायिक प्रक्रिया ज्यादा सुगम और नागरिक-केंद्रित बन सके।
ई-कोर्ट और डिजिटल सिस्टम पर बड़ा फोकस
सुप्रीम कोर्ट की इस पहल का बड़ा हिस्सा तकनीक आधारित न्यायिक सुधारों पर केंद्रित है।
समिति को निर्देश दिया गया है कि वह ई-कोर्ट परियोजना के तहत अदालतों के कंप्यूटरीकरण और डिजिटल सेवाओं को मजबूत करने के उपाय सुझाए।
इसके अलावा केस डेटा का तेज आदान-प्रदान, डिजिटल रिकॉर्ड सिस्टम, ऑनलाइन सुनवाई व्यवस्था, नागरिकों के लिए ऑनलाइन सेवाएं और डिजिटल असमानता कम करने जैसे विषयों पर भी विस्तृत सुझाव दिए जाएंगे।
कानूनी विशेषज्ञों के अनुसार यह कदम लंबित मामलों को तेजी से निपटाने और न्यायिक प्रक्रिया को अधिक पारदर्शी बनाने में मदद कर सकता है।
आधुनिक कोर्ट कॉम्प्लेक्स पर भी होगा काम
समिति केवल तकनीकी सुधार तक सीमित नहीं रहेगी। उसे आधुनिक अदालत परिसरों के निर्माण और न्यायिक अधिकारियों की कार्य परिस्थितियों में सुधार के उपाय सुझाने की जिम्मेदारी भी दी गई है।
सुप्रीम कोर्ट चाहता है कि भविष्य की अदालतें केवल पारंपरिक भवन न होकर आधुनिक न्यायिक केंद्र के रूप में विकसित हों, जहां:
- बेहतर डिजिटल सुविधाएं,
- सुरक्षित रिकॉर्ड सिस्टम,
- पर्याप्त कोर्ट रूम,
- वीडियो कॉन्फ्रेंसिंग व्यवस्था,
- आम नागरिकों के लिए सुविधाजनक वातावरण
उपलब्ध हो।
लंबित मामलों और धीमी प्रक्रिया पर असर पड़ने की उम्मीद
देशभर की अदालतों में इस समय करोड़ों मामले लंबित हैं। कई अदालतें आज भी स्टाफ की कमी, पुराने भवन, रिकॉर्ड प्रबंधन की समस्याओं और सीमित डिजिटल संसाधनों से जूझ रही हैं।
ऐसे में सुप्रीम कोर्ट की यह पहल न्यायिक सुधारों की दिशा में बड़ा कदम मानी जा रही है। विशेषज्ञों का मानना है कि यदि पर्याप्त फंडिंग और इंफ्रास्ट्रक्चर सुधार लागू हुए, तो मामलों के निपटारे की गति तेज हो सकती है।
विशेष रूप से ई-कोर्ट सिस्टम और डिजिटल केस मैनेजमेंट न्यायपालिका पर बढ़ते बोझ को कम करने में अहम भूमिका निभा सकते हैं।
31 अगस्त तक देनी होगी अंतरिम रिपोर्ट
सुप्रीम कोर्ट ने समिति को 31 अगस्त 2026 तक अपनी अंतरिम रिपोर्ट सौंपने के लिए कहा है। माना जा रहा है कि रिपोर्ट में अदालतों की मौजूदा स्थिति, जरूरी सुधारों और संभावित बजट का विस्तृत विवरण होगा।
यह रिपोर्ट आने वाले वर्षों में भारत की न्यायिक व्यवस्था के सबसे बड़े इंफ्रास्ट्रक्चर अपग्रेड की आधारशिला बन सकती है।
कानूनी हलकों में इसे न्यायपालिका के “next generation modernization plan” के रूप में देखा जा रहा है, जिसका असर सुप्रीम कोर्ट से लेकर जिला अदालतों तक दिखाई दे सकता है।