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‘नाता प्रथा’ महिलाओं की गरिमा पर हमला, ये प्रथा कानूनी और नैतिक रूप से दिवालिया अमानवीय सौदा- राजस्थान हाईकोर्ट

Rajasthan High Court Rejects Divorce Plea Over ‘Nata’ Marriage, Says Custom Violates Women’s Rights

कोर्ट बोला- “गलत काम करने वाला अपने ही अपराध का लाभ नहीं ले सकता”, दूसरी शादी करने वाले पति की तलाक अपील खारिज

जोधपुर। राजस्थान हाईकोर्ट ने ‘नाता प्रथा’ को लेकर बेहद सख्त और ऐतिहासिक टिप्पणी करते हुए कहा है कि यह प्रथा महिलाओं की गरिमा, समानता और वैवाहिक अधिकारों के खिलाफ है।

राजस्थान हाईकोर्ट ने स्पष्ट कहा कि पहली पत्नी को बिना कानूनी तलाक दिए दूसरी शादी करना हिंदू विवाह अधिनियम की मूल भावना के विपरीत है और ऐसी प्रथा को किसी भी स्थिति में कानूनी मान्यता नहीं दी जा सकती।

राजस्थान हाईकोर्ट की जोधपुर मुख्यपीठ में जस्टिस अरुण मोंगा और जस्टिस संदीप शाह की खंडपीठ ने यह महत्वपूर्ण फैसला राजसमंद फैमिली कोर्ट के निर्णय को बरकरार रखते हुए सुनाया।

हाईकोर्ट ने लक्ष्मीलाल नामक व्यक्ति की तलाक अपील को खारिज कर दिया, जिसने अपनी पहली पत्नी पार्वती के रहते दूसरी महिला कृष्णा से ‘नाता विवाह’ कर लिया था।

कोर्ट ने फैसले में कहा कि कोई भी व्यक्ति अपने ही गलत कृत्य का फायदा नहीं उठा सकता। जो पति खुद वैवाहिक कानूनों का उल्लंघन करे, दूसरी शादी करे और फिर पहली पत्नी पर क्रूरता व परित्याग का आरोप लगाकर तलाक मांगे, उसे कानून से राहत नहीं मिल सकती।

1992 में शादी, 1997 में दूसरी महिला से ‘नाता’

मामले के अनुसार लक्ष्मीलाल और पार्वती की शादी 5 मई 1992 को हिंदू रीति-रिवाजों से हुई थी। दोनों के दो बेटे हुए। शादी के बाद कुछ समय तक दोनों साथ रहे, लेकिन बाद में विवाद शुरू हो गए। पति ने अदालत में दावा किया कि पत्नी परिवार से अलग रहना चाहती थी और अक्सर झगड़ा करती थी।

पति का कहना था कि पत्नी सरकारी शिक्षक होने के कारण दूसरी जगह ट्रांसफर होकर रहने लगी और उसके बाद वैवाहिक संबंध टूट गए। इसी दौरान उसने वर्ष 1997 में कृष्णा नाम की महिला से ‘नाता विवाह’ कर लिया। उसने अदालत में यह तक कहा कि यह विवाह पत्नी की सहमति से हुआ था।

वहीं पत्नी पार्वती ने इन आरोपों को सिरे से खारिज करते हुए कहा कि पति ने दूसरी महिला से अवैध संबंध बना लिए और उसी कारण उसे छोड़ दिया गया। उसने यह भी आरोप लगाया कि पति ने अपने प्रभाव का इस्तेमाल कर उसका ट्रांसफर करवाया।

फैमिली कोर्ट ने खारिज की थी तलाक याचिका

लक्ष्मीलाल ने फैमिली कोर्ट में पत्नी पर क्रूरता और लंबे समय तक अलग रहने का आरोप लगाते हुए तलाक की मांग की थी।

उसने यह भी कहा कि पत्नी ने उसके खिलाफ झूठे आपराधिक मामले दर्ज करवाए। हालांकि फैमिली कोर्ट ने 24 मई 2023 को उसकी याचिका खारिज कर दी थी।

इसके बाद पति ने राजस्थान हाईकोर्ट में अपील दायर की।

अपील में उसने दावा किया कि दोनों पिछले 27 वर्षों से अलग रह रहे हैं और विवाह पूरी तरह खत्म हो चुका है। उसने यह भी कहा कि पत्नी द्वारा दर्ज करवाए गए केस मानसिक क्रूरता के समान हैं।

हाईकोर्ट ने कहा-‘गलती खुद की, दोष पत्नी पर’

राजस्थान हाईकोर्ट ने पति की दलीलों को पूरी तरह खारिज करते हुए कहा कि वैवाहिक संबंध टूटने की असली वजह स्वयं पति का आचरण है।

अदालत ने कहा कि उसने पहली पत्नी के रहते दूसरी महिला से विवाह किया और अब उसी गलत कार्य के परिणामों से बचने के लिए अदालत का सहारा लेना चाहता है।

खंडपीठ ने कहा—

“जो व्यक्ति खुद आग लगाए, वह बाद में जलने का मुआवजा नहीं मांग सकता।”

कोर्ट ने कहा कि हिंदू विवाह अधिनियम के तहत तलाक कोई अधिकार नहीं बल्कि न्यायसंगत राहत है, जो केवल उसी व्यक्ति को मिल सकती है जो अदालत के सामने ‘स्वच्छ हाथों’ से आए।

‘नाता’ सिर्फ कानून से बचने की कोशिश

फैसले में अदालत ने कहा कि पति ने दूसरी शादी को वैध ठहराने के लिए ‘नाता प्रथा’ का सहारा लिया, लेकिन यह केवल कानून से बचने की कोशिश है।

अदालत ने साफ कहा कि कोई भी प्रथा संसद द्वारा बनाए गए कानून से ऊपर नहीं हो सकती।

कोर्ट ने पाया कि पति दूसरी महिला कृष्णा के साथ रह रहा है और उससे उसके तीन बच्चे भी हैं। इतना ही नहीं, उसने अपने आधार कार्ड में भी कृष्णा का नाम पत्नी के रूप में दर्ज करवा रखा है।

अदालत ने कहा कि यह पूरी स्थिति पहली पत्नी पार्वती की गरिमा और वैवाहिक अधिकारों का खुला उल्लंघन है।

उसे एक ऐसी स्थिति में छोड़ दिया गया जहां वह कानूनन पत्नी तो है, लेकिन व्यवहार में परित्यक्त जीवन जीने को मजबूर है।

पत्नी का विरोध ‘क्रूरता’ नहीं

हाईकोर्ट ने कहा कि यदि कोई पत्नी पति की दूसरी शादी का विरोध करती है, पुलिस में शिकायत दर्ज करवाती है या उसके साथ रहने से इनकार करती है, तो इसे ‘क्रूरता’ नहीं कहा जा सकता। यह एक सामान्य और वैध प्रतिक्रिया है।

कोर्ट ने कहा कि पति की दूसरी शादी ही वैवाहिक टूटन का असली कारण थी और पत्नी के सभी कदम उसी के जवाब में उठाए गए।

इसलिए पति यह नहीं कह सकता कि पत्नी ने उसे छोड़ दिया या उसके साथ क्रूरता की।

सरकारी नौकरी के कारण अलग रहना ‘परित्याग’ नहीं

अदालत ने यह भी कहा कि पति-पत्नी दोनों सरकारी शिक्षक थे और अलग-अलग स्थानों पर पोस्टिंग होना सामान्य बात है।

केवल अलग-अलग शहरों में रहना ‘डेजर्शन’ यानी परित्याग नहीं माना जा सकता।

कोर्ट ने कहा कि पत्नी अलग इसलिए रह रही थी क्योंकि पति दूसरी महिला के साथ रह रहा था। ऐसे में उसका पति के साथ रहने से इनकार करना पूरी तरह जायज था।

‘नाता प्रथा’ महिलाओं के खिलाफ अन्याय

फैसले के अंत में हाईकोर्ट ने ‘नाता प्रथा’ पर व्यापक टिप्पणी करते हुए कहा कि इस प्रथा का सबसे ज्यादा नुकसान महिलाओं को होता है।

पहली पत्नी कानूनी रूप से विवाह में बंधी रहती है लेकिन वास्तविक जीवन में परित्यक्त हो जाती है, जबकि दूसरी महिला को भी कोई वैधानिक सुरक्षा नहीं मिलती।

कोर्ट ने कहा कि ऐसी स्थिति संविधान के अनुच्छेद 14 और 15 के तहत महिलाओं को मिले समानता और गरिमा के अधिकारों के खिलाफ है।

अदालत ने स्पष्ट कहा कि हिंदू विवाह अधिनियम एकपत्नी प्रथा, समानता और कानूनी जवाबदेही के सिद्धांतों पर आधारित है, जबकि ‘नाता’ प्रथा इन मूल सिद्धांतों का सीधा उल्लंघन करती है।

खंडपीठ ने अपने फैसले में कहा—

“नाता प्रथा को समाज द्वारा स्पष्ट रूप से अस्वीकार किया जाना चाहिए। इसे स्वीकार्य सामाजिक प्रथा की सीमाओं से पूरी तरह बाहर कर देना चाहिए।”

अपील खारिज, फैमिली कोर्ट का फैसला बरकरार

अंत में राजस्थान हाईकोर्ट ने पति की अपील खारिज करते हुए फैमिली कोर्ट के फैसले को सही ठहराया। अदालत ने कहा कि पति क्रूरता और परित्याग साबित करने में पूरी तरह विफल रहा है और वह किसी भी प्रकार की राहत पाने का हकदार नहीं है।

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