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राइट टू लाइफ विद डिग्निटी हर इंसान का अधिकार है, चाहे वह भारतीय हो या विदेशी नागरिक, हाईकोर्ट ने किडनी ट्रांसप्लांट केस में बांग्लादेशियों को दी जमानत

Rajasthan High Court Grants Bail to Bangladeshi Nationals in Kidney Transplant Racket Case, Says Article 21 Applies to Foreigners Too

हाईकोर्ट ने कहा, विदेशी नागरिकों को भी है Article 21 के तहत गरिमापूर्ण जीवन और शीघ्र सुनवाई का अधिकार

जयपुर। राजस्थान हाईकोर्ट ने अवैध किडनी ट्रांसप्लांट और मानव तस्करी से जुड़े चर्चित मामले में बड़ा और महत्वपूर्ण फैसला सुनाते हुए दो बांग्लादेशी नागरिकों को जमानत दे दी है।

राजस्थान हाईकोर्ट ने स्पष्ट कहा कि संविधान का अनुच्छेद 21 केवल भारतीय नागरिकों तक सीमित नहीं है, बल्कि विदेशी नागरिकों को भी गरिमापूर्ण जीवन और शीघ्र सुनवाई का अधिकार प्राप्त है।

जस्टिस अनूप कुमार ढंड की एकलपीठ ने बांग्लादेशी नागरिक नुरुल इस्लाम और एम.डी. अहसानुल कबीर की ओर से दायर जमानत याचिका पर सुनवाई करते हुए रिपोर्टेबल जजमेंट के जरिए फैसला दिया है।

दोनों आरोपियों को जयपुर के जवाहर सर्किल थाने में दर्ज एफआईआर नंबर 319/2024 में गिरफ्तार किया गया था। उन पर आईपीसी की धारा 419, 420, 471 और 120-बी के तहत अवैध किडनी प्रत्यारोपण और मानव तस्करी से जुड़े आरोप हैं।

याचिका में क्या कहा

याचिकाकर्ताओं की ओर से कोर्ट को बताया गया कि वे मामले में “एप्रूवर” बन चुके हैं और उनके बयानों के आधार पर मुख्य आरोपियों की गिरफ्तारी हुई थी।

याचिकाकर्ताओं ने यह भी कहा कि बाद में मुख्य आरोपियों को नियमित जमानत मिल गई, लेकिन केवल एप्रूवर बनने के कारण उन्हें अब तक जेल में रखा गया। दोनों 23 अप्रैल 2024 से न्यायिक हिरासत में थे।

सरकार की ओर से दलील दी गई कि दंड प्रक्रिया संहिता की धारा 306(4) के तहत एप्रूवर को ट्रायल समाप्त होने तक हिरासत में रखा जाना आवश्यक है।

हालांकि हाईकोर्ट ने इस तर्क को स्वीकार नहीं किया।

कोर्ट ने कहा कि यदि मुख्य आरोपी जमानत पर बाहर हैं, तो एप्रूवर को अनिश्चितकाल तक जेल में रखना उसे मुख्य आरोपियों से भी बदतर स्थिति में डालना होगा।

याचिकाकर्ताओं का पक्ष

याचिकाकर्ताओं नुरुल इस्लाम और एम.डी. अहसानुल कबीर की ओर से अधिवक्ता ने हाईकोर्ट में दलील दी कि यह एफआईआर अवैध किडनी ट्रांसप्लांट और मानव तस्करी के आरोपों को लेकर दर्ज की गई थी, जिसमें उन्हें 23 अप्रैल 2024 को गिरफ्तार किया गया।

बाद में दोनों ने अभियोजन पक्ष का साथ देते हुए “एप्रूवर” बनने का निर्णय लिया और पुलिस को महत्वपूर्ण जानकारी दी, जिसके आधार पर अन्य सह-आरोपियों की गिरफ्तारी और चार्जशीट पेश की गई।

याचिकाकर्ताओं की ओर से कहा गया कि जिन मुख्य आरोपियों पर पूरे रैकेट को चलाने के आरोप हैं, उन्हें पहले ही धारा 439 Cr.P.C. के तहत नियमित जमानत मिल चुकी है, लेकिन केवल एप्रूवर बनने के कारण याचिकाकर्ताओं को जेल में रखा गया है।

अधिवक्ता का कहना था कि यह स्थिति अन्यायपूर्ण है क्योंकि उन्होंने जांच में सहयोग किया और अपने बयान भी दर्ज करा दिए हैं।

याचिकाकर्ताओं ने कोर्ट को बताया कि ट्रायल में कोई विशेष प्रगति नहीं हो रही थी, इसलिए उन्होंने पहले भी हाईकोर्ट में याचिका दायर की थी। उस समय कोर्ट ने ट्रायल कोर्ट को निर्देश दिया था कि धारा 306(4) Cr.P.C. के तहत उनके बयान रिकॉर्ड किए जाएं। अब उनके बयान PW-1 और PW-2 के रूप में दर्ज हो चुके हैं, इसलिए उन्हें ट्रायल समाप्त होने तक जेल में रखना उचित नहीं होगा।

याचिकाकर्ताओं की ओर से यह भी कहा गया कि वे पिछले दो वर्षों से अधिक समय से न्यायिक हिरासत में हैं और ट्रायल जल्द समाप्त होने की कोई संभावना दिखाई नहीं दे रही है। ऐसे में उनकी निरंतर हिरासत संविधान के अनुच्छेद 21 के तहत प्राप्त “शीघ्र सुनवाई के अधिकार” का उल्लंघन है।

इसके अतिरिक्त यह तर्क भी रखा गया कि विदेशी नागरिक होने के बावजूद उन्हें भारतीय संविधान के तहत गरिमापूर्ण जीवन और व्यक्तिगत स्वतंत्रता का अधिकार प्राप्त है। इसलिए उन्हें अनिश्चितकाल तक जेल में नहीं रखा जा सकता।

राज्य सरकार का विरोध

राज्य सरकार की ओर से Government Advocate-cum-Additional Advocate General ने जमानत याचिका का विरोध किया।

सरकार ने दलील दी कि दंड प्रक्रिया संहिता की धारा 306(4) Cr.P.C. के अनुसार, किसी भी एप्रूवर को ट्रायल समाप्त होने तक हिरासत में रखा जाना आवश्यक है। इसलिए याचिकाकर्ताओं को जमानत नहीं दी जा सकती।

राज्य की ओर से यह भी कहा गया कि दोनों याचिकाकर्ता बांग्लादेश के नागरिक हैं और मेडिकल वीजा पर भारत आए थे। अवैध किडनी ट्रांसप्लांट मामले में गिरफ्तारी के बाद उनका मेडिकल वीजा समाप्त हो चुका है। यदि उन्हें जमानत देकर भारत छोड़ने की अनुमति दी जाती है, तो उनके वापस भारत लौटने की संभावना बेहद कम होगी।

सरकार ने यह आशंका भी जताई कि ट्रायल अभी जारी है और कई गवाहों के बयान बाकी हैं। ऐसे में विदेशी नागरिकों को रिहा करने से मुकदमे की कार्यवाही प्रभावित हो सकती है।

हालांकि सुनवाई के दौरान Additional Solicitor General और वरिष्ठ अधिवक्ताओं ने कोर्ट को बताया कि विदेशी नागरिकों को भी अनुच्छेद 21 के तहत मौलिक अधिकार प्राप्त हैं और यदि उन्हें जमानत दी जाती है, तो राज्य सरकार तथा जांच एजेंसी संबंधित इमिग्रेशन अथॉरिटी को इसकी सूचना देकर आवश्यक कानूनी कदम उठा सकती है।

हाईकोर्ट का फैसला – एप्रूवर को जेल कब तक..

राजस्थान हाईकोर्ट के न्यायाधीश जस्टिस अनूप कुमार ढंड ने अपने विस्तृत फैसले में कई महत्वपूर्ण संवैधानिक और कानूनी टिप्पणियां कीं।

कोर्ट ने कहा कि याचिकाकर्ताओं को केवल इस आधार पर अनिश्चितकाल तक जेल में नहीं रखा जा सकता कि वे “एप्रूवर” बन गए हैं, जबकि मुख्य आरोपी पहले ही जमानत पर रिहा हो चुके हैं।

कोर्ट ने स्पष्ट कहा कि ऐसी स्थिति उन्हें मुख्य आरोपियों से भी बदतर परिस्थिति में डालती है।

कोर्ट ने माना कि धारा 306(4) Cr.P.C. के तहत एप्रूवर के बयान दर्ज होने तक उसे हिरासत में रखने का उद्देश्य है, लेकिन बयान दर्ज हो जाने के बाद परिस्थितियों का अलग ढंग से परीक्षण किया जाना चाहिए।

हाईकोर्ट ने कहा कि इस मामले में दोनों याचिकाकर्ताओं के बयान ट्रायल कोर्ट में PW-1 और PW-2 के रूप में दर्ज हो चुके हैं, इसलिए अब उनकी जमानत याचिका पर विचार किया जा सकता है।

जस्टिस अनूप कुमार ढंड ने 1987 के “नूर टाकी उर्फ मम्मू बनाम राजस्थान राज्य” फैसले का उल्लेख करते हुए कहा कि हाईकोर्ट के पास धारा 482 Cr.P.C. के अंतर्गत अंतर्निहित शक्तियां हैं, जिनका प्रयोग असाधारण परिस्थितियों में एप्रूवर को जमानत देने के लिए किया जा सकता है।

कोर्ट ने कहा कि यदि ट्रायल में अत्यधिक देरी हो रही हो और एप्रूवर ने अभियोजन का पूरा सहयोग किया हो, तो उसे अनिश्चितकाल तक जेल में रखना न्यायसंगत नहीं होगा।

Right to Life with Dignity -अनुच्छेद 21

राजस्थान हाईकोर्ट ने अपने आदेश में अनुच्छेद 21 की व्यापक व्याख्या करते हुए कहा कि “जीवन और व्यक्तिगत स्वतंत्रता का अधिकार” केवल भारतीय नागरिकों तक सीमित नहीं है, बल्कि यह प्रत्येक मानव को प्राप्त है, जिसमें विदेशी नागरिक भी शामिल हैं।

अदालत ने कहा कि विदेशी नागरिकों को भी गरिमापूर्ण जीवन, निष्पक्ष प्रक्रिया और शीघ्र सुनवाई का समान अधिकार है।

जस्टिस अनूप कुमार ढंड ने कहा कि “Right to Life with Dignity” सीमाओं से परे एक सार्वभौमिक अधिकार है और यह हर इंसान की सुरक्षा करता है।

कोर्ट ने सुप्रीम कोर्ट के Sunil Batra तथा K.S. Puttaswamy मामलों का हवाला देते हुए कहा कि किसी भी व्यक्ति की व्यक्तिगत स्वतंत्रता और गरिमा को कानून द्वारा निर्धारित उचित प्रक्रिया के बिना छीना नहीं जा सकता।

हाईकोर्ट ने यह भी टिप्पणी की कि लंबे समय तक बिना ट्रायल के हिरासत में रखना अनुच्छेद 21 का उल्लंघन है।

कोर्ट ने माना कि याचिकाकर्ता 23 अप्रैल 2024 से जेल में हैं, जबकि ट्रायल अभी भी लंबित है और कई गवाहों के बयान बाकी हैं। ऐसे में उनकी निरंतर हिरासत “Right to Speedy Trial” के खिलाफ होगी।

भारत छोड़ने के मुद्दे

विदेशी नागरिकों के भारत छोड़ने के मुद्दे पर कोर्ट ने कहा कि जमानत मिलने का अर्थ यह नहीं है कि उन्हें स्वतः भारत छोड़ने की अनुमति मिल जाएगी।

अदालत ने स्पष्ट किया कि Immigration and Foreigners Act, 2025 तथा संबंधित आदेशों के तहत यह निर्णय इमिग्रेशन अथॉरिटी के अधिकार क्षेत्र में आता है कि किसी विदेशी नागरिक को देश छोड़ने की अनुमति दी जाए या नहीं।

ट्रायल कोर्ट पर टिप्पणी -घोंघे की चाल

जस्टिस अनूप कुमार ढंड ने ट्रायल कोर्ट की कार्यप्रणाली पर भी गंभीर टिप्पणी की। कोर्ट ने कहा कि 2024 से लंबित यह मुकदमा “घोंघे की चाल” से चल रहा है और इसे अनिश्चितकाल तक लंबित नहीं रखा जा सकता।

हाईकोर्ट ने ट्रायल कोर्ट को निर्देश दिया कि गवाहों की पेशी सुनिश्चित कर जल्द सुनवाई पूरी की जाए और किसी भी आरोपी की ओर से अपनाई जाने वाली अनावश्यक देरी की रणनीति को स्वीकार न किया जाए।

अंतिम आदेश

राजस्थान हाईकोर्ट ने दोनों याचिकाकर्ताओं को पांच-पांच लाख रुपए के निजी मुचलके और ढाई-ढाई लाख रुपए की दो जमानतों पर रिहा करने का आदेश दिया।

साथ ही राज्य सरकार, पुलिस और इमिग्रेशन अधिकारियों को आदेश की सूचना भेजने के निर्देश भी दिए गए।

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