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‘मेडिकल नेग्लिजेंस’ पर बड़ा फैसला:, ड्यूटी खत्म होने के बाद नर्स की गलती के लिए ऑफ-ड्यूटी डॉक्टर पर नहीं चलेगा आपराधिक केस: सुप्रीम कोर्ट

Supreme Court Rules Off-Duty Doctors Not Criminally Liable in Medical Negligence Case
सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि हर मेडिकल गलती आपराधिक लापरवाही नहीं, डॉक्टर की गंभीर और प्रत्यक्ष चूक साबित होना जरूरी। अदालत ने स्पष्ट किया कि सामान्य मेडिकल गलती और ‘गंभीर आपराधिक लापरवाही’ अलग चीजें हैं।

नई दिल्ली: मेडिकल नेग्लिजेंस से जुड़े मामलों में सुप्रीम कोर्ट ने मेडिकल लापरवाही और डॉक्टरों की आपराधिक जिम्मेदारी को लेकर बड़ा फैसला सुनाया है।

कोर्ट ने फैसला सुनाते हुए कहा है कि

ड्यूटी खत्म होने के बाद किसी नर्स द्वारा की गई प्रक्रिया संबंधी गलती के लिए डॉक्टर को आपराधिक रूप से जिम्मेदार नहीं ठहराया जा सकता। किसी डॉक्टर पर भारतीय दंड संहिता की धारा 304-A के तहत आपराधिक मामला चलाने के लिए केवल सामान्य चिकित्सा त्रुटि पर्याप्त नहीं है। इसके लिए गंभीर और प्रत्यक्ष लापरवाही साबित होना जरूरी है।

जस्टिस पंकज मिथल और जस्टिस प्रसन्ना बी. वराले की बेंच ने केरल की एक एनेस्थेटिस्ट डॉक्टर के खिलाफ चल रही आपराधिक कार्यवाही रद्द करते हुए यह फैसला सुनाया।

अदालत ने कहा कि यदि ड्यूटी खत्म होने के बाद डॉक्टर फोन पर सामान्य चिकित्सा सलाह देता है और बाद में अस्पताल स्टाफ द्वारा प्रक्रिया लागू करने में गलती हो जाती है, तो हर स्थिति में डॉक्टर को आपराधिक रूप से दोषी नहीं माना जा सकता।

फोन पर दी सलाह से शुरू हुआ विवाद

मामला केरल के कन्नूर जिले के एक अस्पताल से जुड़ा है। वर्ष 2002 में केपी मुरलीधर नामक मरीज का piles surgery हुआ था। ऑपरेशन के बाद मरीज को दर्द और बेचैनी की शिकायत हुई।

आरोप था कि अस्पताल की एनेस्थेटिस्ट डॉ. सुप्रिया कुमारी उस समय ड्यूटी पर नहीं थीं। अभियोजन पक्ष के अनुसार अस्पताल से उन्हें फोन किया गया, जिसके बाद उन्होंने नर्स को दर्द निवारक इंजेक्शन देने का निर्देश दिया।

इसके बाद मरीज की तबीयत अचानक बिगड़ गई और वह बेहोश होकर गिर पड़ा। बाद में उसकी मौत हो गई।

पोस्टमार्टम रिपोर्ट में सामने आया कि मरीज की बाईं coronary artery में लगभग 80 प्रतिशत ब्लोकेज था और मौत का कारण acute coronary insufficiency यानी गंभीर हृदय संबंधी समस्या थी।

इसके बावजूद पुलिस ने मामले में लापरवाही से मौत का मामला दर्ज कर लिया। शुरुआत में FIR केवल सर्जन के खिलाफ दर्ज हुई थी, लेकिन बाद की जांच में सर्जन, एनेस्थेटिस्ट और नर्स तीनों के खिलाफ आरोपपत्र दाखिल किया गया।

डॉक्टर पर क्या आरोप लगे ?

अभियोजन पक्ष का आरोप था कि एनेस्थेटिस्ट डॉक्टर को खुद इंजेक्शन देना चाहिए था, लेकिन उन्होंने नर्स को निर्देश देकर जिम्मेदारी से बचने की कोशिश की।

यह भी कहा गया कि नर्स द्वारा इंजेक्शन गलत तरीके से लगाने के बाद मरीज की हालत बिगड़ी और उसकी मौत हो गई।

मामले में डॉक्टर पर भारतीय दंड संहिता की धारा 304-A यानी लापरवाही से मौत का आरोप लगाया गया। साथ ही धारा 34 के तहत साझा मंशा का आरोप भी जोड़ा गया।

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उपभोक्ता आयोग ने डॉक्टर को पहले ही दी थी राहत

मृतक के परिवार ने जिला उपभोक्ता विवाद निवारण आयोग में भी मामला दायर किया था। वहां अस्पताल की सेवाओं और इलाज में लापरवाही का मुद्दा उठाया गया।

साल 2017 में उपभोक्ता आयोग ने अपने फैसले में कहा था कि एनेस्थेटिस्ट डॉक्टर ने नर्स को इंजेक्शन लगाने का निर्देश नहीं दिया था। आयोग ने अस्पताल को जिम्मेदार माना, लेकिन डॉक्टर को राहत दे दी।

महत्वपूर्ण बात यह रही कि मृतक के परिवार ने इस निष्कर्ष को ऊपरी उपभोक्ता मंच पर चुनौती नहीं दी। इस कारण डॉक्टर के पक्ष में दिया गया निष्कर्ष अंतिम माना गया।

हाईकोर्ट से नहीं मिली राहत, सुप्रीम कोर्ट पहुंचीं डॉक्टर

डॉ. सुप्रिया कुमारी ने ट्रायल कोर्ट में डिस्चार्ज अप्लिकेशन (discharge application) दाखिल कर कहा था कि उनके खिलाफ आपराधिक मुकदमा चलाने का कोई आधार नहीं है। लेकिन ट्रायल कोर्ट ने यह याचिका खारिज कर दी।

इसके बाद सत्र अदालत में भी उन्हें राहत नहीं मिली। फिर केरल हाईकोर्ट ने अक्टूबर 2024 में आपराधिक कार्यवाही रद्द करने से इनकार कर दिया।

हाईकोर्ट के फैसले के बाद डॉक्टर ने सुप्रीम कोर्ट का दरवाजा खटखटाया।

सुप्रीम कोर्ट ने क्या कहा ?

पूरे मामले की जांच के बाद सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि अभियोजन पक्ष यह साबित ही नहीं कर पाया कि डॉक्टर ने वास्तव में नर्स को इंजेक्शन लगाने का निर्देश दिया था।

अदालत ने कहा कि यदि अभियोजन की कहानी को मान भी लिया जाए, तब भी फोन पर दर्द निवारक दवा देने की सलाह सामान्य चिकित्सा प्रक्रिया का हिस्सा थी और इसे “गंभीर आपराधिक लापरवाही” नहीं कहा जा सकता।

सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि

ऑपरेशन के बाद दर्द होने पर दर्द निवारण दवा देना सामान्य चिकित्सकीय सलाह मानी जाती है। यदि अस्पताल स्टाफ ने उसे लागू करने में तकनीकी गलती की, तो उसके लिए हर स्थिति में ऑफ ड्यूटी डॉक्टर को जिम्मेदार नहीं ठहराया जा सकता।

सामान्य मेडिकल गलती और आपराधिक लापरवाही अलग चीजें

सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि चिकित्सा क्षेत्र में हर त्रुटि को आपराधिक अपराध नहीं माना जा सकता।

अदालत ने कहा कि आपराधिक लापरवाही साबित करने के लिए यह दिखाना जरूरी है कि डॉक्टर का आचरण इतना गंभीर था कि कोई सामान्य और समझदार चिकित्सक ऐसा नहीं करता।

कोर्ट ने कहा कि डॉक्टर की भूमिका, मरीज की वास्तविक मेडिकल स्थिति, इलाज की परिस्थितियां और मौत के प्रत्यक्ष कारण इन सभी बातों को ध्यान में रखना जरूरी है।

सुप्रीम कोर्ट ने पाया कि इस मामले में मरीज पहले से गंभीर हृदय समस्या से पीड़ित था। पोस्टमार्टम रिपोर्ट में coronary artery blockage स्पष्ट रूप से सामने आया था।

अदालत ने कहा कि यदि दर्द कम न होने के कारण तनाव बढ़ा और उससे हार्ट अटैक की स्थिति बनी, तो भी उस पूरी घटनाक्रम को कानूनी रूप से सीधे डॉक्टर से नहीं जोड़ा जा सकता।

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नर्स की तकनीकी गलती पर भी सुप्रीम कोर्ट की टिप्पणी

सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि यदि नर्स एपिड्यूरल स्पेस में इंजेक्शन सही तरीके से नहीं लगा सकी, तो यह अधिकतम “service deficiency” या सामान्य लापरवाही का मामला हो सकता है। लेकिन इसे आपराधिक मानसिकता या गंभीर आपराधिक दोष नहीं माना जा सकता।

अदालत ने कहा कि ऑफ ड्यूटी डॉक्टर उस समय अस्पताल में मौजूद नहीं थीं और इंजेक्शन लगाने की वास्तविक प्रक्रिया उनके प्रत्यक्ष नियंत्रण में नहीं थी। इसलिए पूरी जिम्मेदारी उन पर डालना उचित नहीं होगा।

विशेषज्ञ समिति की रिपोर्ट पर भी सवाल

सुप्रीम कोर्ट ने मामले की जांच करने वाली एक्सपर्ट पैनल पर भी सवाल उठाए। अदालत ने कहा कि समिति में कोई एनेस्थेटिस्ट विशेषज्ञ शामिल ही नहीं था।

कोर्ट ने कहा कि पिड्यूरल एनेस्थीसिया और कैथेटर मैनेजमेंट जैसे तकनीकी मामलों का मूल्यांकन बिना विशेषज्ञ डॉक्टर के नहीं किया जा सकता।

अदालत ने माना कि इस वजह से एक्सपर्ट पैनल की रिपोर्ट तकनीकी रूप से कमजोर हो गई।

सुप्रीम कोर्ट ने तय की ‘क्रिमिनल नेग्लिजेंस’ की सीमा

सुप्रीम कोर्ट ने इस मामले में स्पष्ट किया कि मेडिकल लापरवाही को आपराधिक अपराध मानने के लिए कुछ तय कानूनी सीमाएं और मानदंड पूरे होना जरूरी हैं। कोर्ट ने कहा कि हर गलती को क्रिमिनल केस में बदलना न्यायसंगत नहीं है, बल्कि इसके लिए ठोस और गंभीर आधार होना चाहिए।

1. साधारण गलती को अपराध नहीं माना जाएगा
केवल सामान्य लापरवाही या उपचार में छोटी चूक को आपराधिक लापरवाही की श्रेणी में नहीं रखा जा सकता।


2. ‘गंभीर लापरवाही’ (Gross Negligence) का होना अनिवार्य
डॉक्टर की गलती इतनी गंभीर होनी चाहिए कि वह स्पष्ट रूप से अस्वीकार्य और खतरनाक साबित हो।


3. डॉक्टर के आचरण की तुलना ‘सामान्य प्रैक्टिस’ से होगी
यह देखा जाएगा कि क्या ऐसा व्यवहार कोई समझदार और प्रशिक्षित डॉक्टर सामान्य परिस्थितियों में करता या नहीं।


4. सीधा और स्पष्ट कारण (Direct Nexus) जरूरी
डॉक्टर की कार्रवाई और मरीज की मौत के बीच सीधा और ठोस संबंध होना चाहिए।


5. अप्रत्यक्ष या दूर की भूमिका पर आपराधिक केस नहीं
अगर डॉक्टर की भूमिका घटना में बहुत दूर या अप्रत्यक्ष है, तो उसे आपराधिक जिम्मेदार नहीं ठहराया जा सकता।


6. फोन पर दी गई सामान्य सलाह को लापरवाही नहीं माना गया
कोर्ट ने कहा कि उपलब्ध जानकारी के आधार पर दी गई सामान्य मेडिकल सलाह को अपराध नहीं कहा जा सकता।


7. जानबूझकर या लापरवाही से खतरा पैदा करना साबित होना चाहिए
यह साबित होना जरूरी है कि डॉक्टर ने जानबूझकर या लापरवाही से मरीज की जान जोखिम में डाली।


8. हर नकारात्मक परिणाम को क्रिमिनल केस नहीं बनाया जा सकता
मेडिकल पेशे में जोखिम होते हैं, इसलिए हर असफल इलाज या मौत को अपराध नहीं माना जा सकता।

यानी मेडिकल मामलों में आपराधिक जिम्मेदारी तय करने के लिए ‘गंभीर लापरवाही’ और ‘सीधा कारण’ दोनों का साबित होना जरूरी है।

HC का आदेश रद्द, डॉक्टर को राहत

इस मामले में पहले हाईकोर्ट ने डॉक्टर के खिलाफ कार्यवाही को सही ठहराया था, लेकिन सुप्रीम कोर्ट ने उस फैसले को पलट दिया। शीर्ष अदालत ने कहा कि उपलब्ध तथ्यों और सबूतों के आधार पर यह मामला आपराधिक लापरवाही का नहीं बनता।

सुप्रीम कोर्ट ने यह भी ध्यान में रखा कि इससे पहले उपभोक्ता फोरम (कंज्यूमर फोरम) में भी डॉक्टर को राहत मिल चुकी थी, जहां यह माना गया था कि इलाज में कोई स्पष्ट लापरवाही साबित नहीं हुई।

सुप्रीम कोर्ट के इस फैसले के बाद डॉक्टर के खिलाफ दर्ज आपराधिक मामला रद्द कर दिया गया, जिससे उन्हें बड़ी राहत मिली।

डॉक्टरों को सुरक्षा, लेकिन जिम्मेदारी भी तय

सुप्रीम कोर्ट का यह फैसला केवल एक मामले तक सीमित नहीं है, बल्कि पूरे मेडिकल सिस्टम पर इसका व्यापक प्रभाव पड़ेगा। इससे डॉक्टरों को यह भरोसा मिलेगा कि हर असफल इलाज को आपराधिक मामले में नहीं बदला जाएगा।

हालांकि कोर्ट ने यह भी स्पष्ट किया कि इसका मतलब यह नहीं है कि डॉक्टरों को पूरी छूट मिल गई है। यदि किसी मामले में गंभीर और स्पष्ट लापरवाही साबित होती है, तो सख्त कार्रवाई जारी रहेगी।

इस फैसले से एक संतुलन बनाने की कोशिश की गई है—जहां मरीजों के अधिकार भी सुरक्षित रहें और डॉक्टरों को अनावश्यक कानूनी दबाव से भी बचाया जा सके।

मेडिकल पेशा स्वभाव से ही जोखिम भरा है, जहां हर निर्णय जीवन और मृत्यु के बीच फर्क पैदा कर सकता है। ऐसे में न्यायपालिका का यह रुख यह सुनिश्चित करता है कि जिम्मेदारी तय हो, लेकिन बिना ठोस आधार के किसी को अपराधी न ठहराया जाए।

यह फैसला मेडिकल लापरवाही, डॉक्टरों की आपराधिक जिम्मेदारी और अस्पतालों में उपचार संबंधी विवादों से जुड़े मामलों में महत्वपूर्ण मिसाल माना जा रहा है।

यह निर्णय न केवल डॉक्टरों के लिए राहत लेकर आया है, बल्कि न्याय प्रणाली की उस संवेदनशीलता को भी दर्शाता है, जो जटिल पेशेवर निर्णयों को सतही नजर से नहीं आंकती।

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