नई दिल्ली: सुप्रीम कोर्ट ने कानूनी सहायता (Legal Aid) और निष्पक्ष सुनवाई के अधिकार को लेकर बड़ा फैसला सुनाया है।
कोर्ट ने फैसला सुनाते हुए कहा है कि
किसी आरोपी को दी जाने वाली कानूनी सहायता केवल ‘औपचारिक प्रक्रिया’ या ‘नाम मात्र की व्यवस्था’ नहीं हो सकती। आरोपी को वास्तविक, प्रभावी और सार्थक कानूनी प्रतिनिधित्व मिलना संवैधानिक अधिकार है।
सुप्रीम कोर्ट ने मध्य प्रदेश हाईकोर्ट के उस आदेश को रद्द कर दिया जिसमें हत्या के एक दोषी की उम्रकैद की सजा को बरकरार रखा गया था। अदालत ने पाया कि आरोपी को प्रभावी कानूनी सहायता दिए बिना जल्दबाजी में उसकी अपील खारिज कर दी गई।
Justice Dipankar Datta और Justice Satish Chandra Sharma की बेंच ने कहा कि अदालतों की जिम्मेदारी केवल वकील नियुक्त कर देने तक सीमित नहीं है। यह सुनिश्चित करना भी जरूरी है कि आरोपी को अपने बचाव की उचित तैयारी और वकील से संवाद का वास्तविक अवसर मिले।
किस मामले में आया ‘सुप्रीम’ फैसला?
मामला 74 वर्षीय नंदकिशोर मिश्रा से जुड़ा है, जिन्हें हत्या के मामले में दोषी ठहराया गया था। आरोप था कि 16 अक्टूबर 2020 को हुई घटना में उन्होंने हत्या की थी।
सत्र अदालत ने 20 दिसंबर 2022 को भारतीय दंड संहिता की धारा 302 के तहत उन्हें दोषी ठहराते हुए उम्रकैद की सजा सुनाई थी। घटना के बाद से ही नंदकिशोर मिश्रा जेल में बंद हैं।
सजा के खिलाफ उन्होंने Madhya Pradesh High Court में आपराधिक अपील दायर की। मामला Division Bench के सामने लंबित था और 20 नवंबर 2025 को सुनवाई के लिए सूचीबद्ध हुआ।
उस दिन आरोपी के निजी वकील अदालत में उपस्थित नहीं हो सके। बाद में सुप्रीम कोर्ट में बताया गया कि वह चिकित्सा उपचार के कारण पेश नहीं हो पाए थे।
हाईकोर्ट ने उसी दिन आरोपी की ओर से amicus curiae नियुक्त कर दिया और मामले को अगले सप्ताह सुनवाई के लिए तय कर दिया।
6 दिन में सुनवाई और फैसला, SC ने जताई चिंता
मध्य प्रदेश हाईकोर्ट ने 26 नवंबर 2025 को, यानी केवल 6 दिन बाद, मामले की सुनवाई की।
amicus curiae ने आरोपी की ओर से बहस की और उसी दिन हाईकोर्ट ने अपील खारिज कर दी। हाईकोर्ट ने सत्र अदालत की दोषसिद्धि और उम्रकैद की सजा को बरकरार रखा।
सुप्रीम कोर्ट ने इस पूरी प्रक्रिया पर गंभीर चिंता जताई। अदालत ने कहा कि आरोपी जेल में बंद था और उसे नए वकील की नियुक्ति की सूचना नहीं दी गई। वहीं amicus curiae को भी पर्याप्त तैयारी का समय नहीं मिला।
अदालत ने कहा कि ऐसी परिस्थितियों में प्रभावी कानूनी सहायता की बात नहीं कही जा सकती।
सुप्रीम कोर्ट में उठे अहम मुद्दे
सुप्रीम कोर्ट में आरोपी की ओर से कहा गया कि उन्हें यह जानकारी ही नहीं दी गई कि उनका मूल वकील अनुपस्थित है। अदालत ने नया वकील नियुक्त कर दिया है और उनके मामले की अंतिम सुनवाई होने जा रही है।
इसके अलावा amicus curiae ने जेल में बंद आरोपी से मुलाकात तक नहीं की थी। दोनों के बीच कोई conference या case discussion नहीं हुआ।
सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि जब कोई व्यक्ति जेल में बंद हो और उसकी व्यक्तिगत स्वतंत्रता दांव पर हो, तब अदालतों को और ज्यादा सावधानी बरतनी चाहिए।
कोर्ट ने माना कि यदि आरोपी को जानकारी दी जाती, तो वह अपने बचाव के लिए जरूरी निर्देश दे सकता था, वकील को मामले के तथ्य समझा सकता था या दूसरी कानूनी व्यवस्था कर सकता था। लेकिन इस मामले में ऐसा कोई अवसर नहीं दिया गया।
प्रक्रिया में पाई गई गंभीर कमियां
सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि
‘Legal aid to an accused person must not be a mere ritual or a token formality.’
अदालत ने कहा कि कानूनी सहायता का उद्देश्य केवल औपचारिक रूप से वकील उपलब्ध कराना नहीं, बल्कि आरोपी को प्रभावी और वास्तविक कानूनी मदद देना है।
सुप्रीम कोर्ट ने यह भी कहा कि High Court की मंशा भले ही मामले का शीघ्र निपटारा करने की रही हो, लेकिन निष्पक्ष सुनवाई का अधिकार उससे कहीं ज्यादा महत्वपूर्ण है।
अदालत ने माना कि यदि आरोपी जेल में बंद है, तो अदालत को:
- उसे सुनवाई की जानकारी देनी चाहिए।
- नए प्रतिनिधित्व की सूचना देनी चाहिए।
- नए वकील को पर्याप्त तैयारी का समय देना चाहिए।
पुराने फैसलों का भी दिया हवाला
सुप्रीम कोर्ट ने अपने फैसले में कई पुराने निर्णयों का भी उल्लेख किया। अदालत ने विशेष रूप से Bhola Mahto बनाम State of Jharkhand और Anokhi Lal बनाम State of Madhya Pradesh (2019) मामलों का हवाला दिया।
अदालत ने कहा कि Anokhi Lal मामले में पहले ही स्पष्ट किया जा चुका है कि:
amicus curiae को मामले की तैयारी के लिए पर्याप्त समय दिया जाना चाहिए।
आरोपी या दोषी व्यक्ति से मुलाकात और बातचीत का अवसर मिलना चाहिए।
सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि वर्तमान मामले में इन दोनों महत्वपूर्ण निर्देशों का पालन नहीं किया गया।
सुप्रीम कोर्ट ने हाईकोर्ट का आदेश किया रद्द
सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि रिकॉर्ड में ऐसा कोई दस्तावेज नहीं था जिससे यह साबित हो सके कि आरोपी को सुनवाई की जानकारी दी गई,
नए वकील की नियुक्ति बताई गई या मामले की अंतिम सुनवाई की सूचना दी गई।
अदालत ने कहा कि यह प्राकृतिक न्याय के सिद्धांतों के खिलाफ है। कोर्ट ने माना कि जब किसी व्यक्ति की स्वतंत्रता और उम्रकैद जैसी सजा का सवाल हो, तब अदालतों को procedural fairness पर विशेष ध्यान देना चाहिए।
सुप्रीम कोर्ट ने यह भी कहा कि केवल तेजी से मामलों का निपटारा कर देना न्याय का उद्देश्य नहीं हो सकता। निष्पक्ष सुनवाई और प्रभावी कानूनी सहायता उससे ज्यादा महत्वपूर्ण हैं।
सुप्रीम कोर्ट का अंतिम आदेश
सुप्रीम कोर्ट ने मध्य प्रदेश हाईकोर्ट का 26 नवंबर 2025 का आदेश रद्द कर दिया और मामले को fresh hearing के लिए फिर से हाईकोर्ट भेज दिया।
अदालत ने निर्देश दिया कि अपील को दो महीने के भीतर सूचीबद्ध किया जाए और संभव हो तो वही Division Bench इसकी सुनवाई करे जिसने पहले फैसला दिया था।
सुप्रीम कोर्ट ने यह भी स्पष्ट किया कि आरोपी अब अपने निजी वकील के जरिए पैरवी करना चाहता है। इसलिए यदि अगली तारीख पर उसका वकील अनुपस्थित रहता है, तो अदालत को नया amicus curiae नियुक्त करने की जरूरत नहीं होगी, बशर्ते Registry एक सप्ताह पहले सुनवाई की सूचना दे दे।
अदालत ने कहा कि हाईकोर्ट अब मामले की merits पर दोबारा सुनवाई करेगा। तब तक आरोपी न्यायिक हिरासत में रहेगा।
सुप्रीम कोर्ट ने यह भी कहा कि जब तक हाई कोर्ट इस मामले में दोबारा फैसला नहीं देता, तब तक आरोपी जेल में ही रहेगा। यानी फिलहाल सजा पर कोई अंतिम राहत नहीं दी गई है, बल्कि केवल प्रक्रिया को सही करने का अवसर दिया गया है।
क्यों अहम है यह फैसला
सुप्रीम कोर्ट का यह फैसला Legal Aid, fair trial और criminal appeals से जुड़े मामलों में बड़ी राष्ट्रीय मिसाल माना जा रहा है।
देशभर की अदालतों में बड़ी संख्या में आरोपी आर्थिक रूप से कमजोर होते हैं, जेल में बंद रहते हैं या पूरी तरह अदालत द्वारा नियुक्त वकीलों पर निर्भर होते हैं। यह फैसला आने वाले समय में निष्पक्ष सुनवाई और आरोपी के संवैधानिक अधिकारों से जुड़े मामलों में महत्वपूर्ण असर डाल सकता है।
यह फैसला देशभर की अदालतों के लिए एक महत्वपूर्ण संदेश भी है। इससे यह स्पष्ट होता है कि अमीकस क्यूरी की नियुक्ति केवल औपचारिक कदम नहीं होना चाहिए। अदालतों को यह सुनिश्चित करना होगा कि आरोपी को पूरी और प्रभावी कानूनी सहायता मिले। जल्दबाजी में सुनवाई करना और आरोपी को पर्याप्त अवसर न देना न्याय के सिद्धांतों के खिलाफ है।
