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Breaking : आसाराम को करना होगा सरेंडर-गैंगरेप के गंभीर आरोपों से बरी, लेकिन दुष्कर्म के मामले में आजीवन कारावास की सजा बरकरार

Asaram Gets Partial Relief: Acquitted of IPC 376D and POCSO Charges, Conviction Under Section 376 IPC Upheld

जोधपुर। राजस्थान हाईकोर्ट की जोधपुर पीठ ने स्वयंभू धर्मगुरु आसाराम बापू को नाबालिग से यौन उत्पीड़न के बहुचर्चित मामले में बड़ा झटका देते हुए उसकी उम्रकैद की सजा को बरकरार रखा है।

बुधवार को जस्टिस अरुण मोंगा और जस्टिस योगेंद्र कुमार पुरोहित की डिवीजन बेंच ने यह महत्वपूर्ण फैसला सुनाया।

अदालत ने पॉक्सो एक्ट और दुष्कर्म के गंभीर आरोपों में ट्रायल कोर्ट के फैसले को सही माना, हालांकि गैंगरेप से जुड़ी धारा 376-डी अपराधिक षडयंत्र के आरोप से आसाराम को राहत देते हुए दोषमुक्त कर दिया।

इसके साथ ही सह-आरोपी शिल्पी और शरतचंद को अदालत ने बरी कर दिया।

हाईकोर्ट ने स्पष्ट किया कि आसाराम को अब सरेंडर करना होगा, हालांकि पहले से मिली अंतरिम जमानत 7 जुलाई 2026 तक या विस्तृत निर्णय आने तक प्रभावी रहेगी।

क्या है पूरा मामला?

यह मामला अगस्त 2013 का है, जब उत्तर प्रदेश की रहने वाली एक नाबालिग छात्रा ने जोधपुर के मणाई स्थित आसाराम आश्रम में अपने साथ यौन उत्पीड़न और दुष्कर्म का आरोप लगाया था। पीड़िता उस समय आश्रम संचालित गुरुकुल में पढ़ाई कर रही थी।

शिकायत के अनुसार, पीड़िता की तबीयत खराब होने पर उसे “आध्यात्मिक उपचार” के बहाने आसाराम के पास भेजा गया, जहां कथित तौर पर उसके साथ दुष्कर्म किया गया। मामला सामने आने के बाद देशभर में भारी विरोध हुआ और राजस्थान पुलिस ने जांच शुरू की।

आसाराम को 31 अगस्त 2013 को मध्यप्रदेश के इंदौर से गिरफ्तार किया गया था। इसके बाद लंबी न्यायिक प्रक्रिया चली।

2018 में ट्रायल कोर्ट ने सुनाई थी उम्रकैद

करीब पांच साल चली सुनवाई के बाद जोधपुर की विशेष पॉक्सो अदालत ने 25 अप्रैल 2018 को आसाराम को दोषी करार दिया था। कोर्ट ने उसे नाबालिग से दुष्कर्म और पॉक्सो एक्ट के तहत अपराध का दोषी मानते हुए आजीवन कारावास की सजा सुनाई थी।

उस समय अदालत ने सह-आरोपी शिल्पी और शरतचंद को भी दोषी माना था। ट्रायल कोर्ट के फैसले को चुनौती देते हुए आसाराम और अन्य आरोपियों ने राजस्थान हाईकोर्ट में अपील दायर की थी।

करीब तीन महीने चली डे-टू-डे सुनवाई

राजस्थान हाईकोर्ट में इस मामले की सुनवाई 16 फरवरी 2026 से 20 अप्रैल 2026 तक लगातार डे-टू-डे आधार पर हुई। दोनों पक्षों की लंबी बहस के बाद खंडपीठ ने 20 अप्रैल को फैसला सुरक्षित रख लिया था।

करीब एक महीने बाद 27 मई को अदालत ने अपना निर्णय सुनाया। कोर्ट रूम में फैसले को लेकर भारी उत्सुकता थी, क्योंकि यह मामला न केवल कानूनी बल्कि सामाजिक और राजनीतिक रूप से भी अत्यधिक संवेदनशील माना जाता रहा है।

बचाव पक्ष ने क्या दलीलें दीं?

आसाराम की ओर से वरिष्ठ अधिवक्ता देवदत्त कामत ने पैरवी की। बचाव पक्ष ने अदालत में कहा कि यह मामला “मनगढ़ंत” और “षड्यंत्र” का परिणाम है।

उन्होंने दलील दी कि पीड़िता और उसके माता-पिता के बयानों में कई विरोधाभास हैं। बचाव पक्ष ने यह भी कहा कि घटना की रात आसाराम और पीड़िता के बीच किसी प्रकार का कॉल रिकॉर्ड या इलेक्ट्रॉनिक साक्ष्य मौजूद नहीं है।

वकीलों ने “समानता के सिद्धांत” का हवाला देते हुए कहा कि जब समान साक्ष्यों के आधार पर अन्य सह-आरोपियों को राहत दी जा सकती है, तो अकेले आसाराम को दोषी नहीं ठहराया जाना चाहिए।

बचाव पक्ष ने यह भी तर्क दिया कि अभियोजन की कहानी में कई तथ्यात्मक कमियां हैं और मेडिकल साक्ष्य भी निर्णायक नहीं हैं।

अभियोजन पक्ष ने क्या कहा?

सरकारी वकीलों और पीड़िता की ओर से अधिवक्ता पी.सी. सोलंकी ने अदालत में जोरदार विरोध दर्ज कराया।

अभियोजन पक्ष ने कहा कि पॉक्सो मामलों में पीड़िता का बयान अत्यंत महत्वपूर्ण साक्ष्य होता है और सुप्रीम कोर्ट कई मामलों में स्पष्ट कर चुका है कि यदि पीड़िता का बयान विश्वसनीय है तो केवल उसी आधार पर दोषसिद्धि संभव है।

सरकारी पक्ष ने यह भी कहा कि मामले से जुड़े गवाहों पर लगातार हमले हुए और कुछ गवाहों की हत्या तक कर दी गई। अभियोजन ने इसे साक्ष्य मिटाने और गवाहों को डराने की साजिश बताया।

अभियोजन का कहना था कि इस प्रकार की घटनाएं स्वयं इस बात का संकेत हैं कि आरोप गंभीर और वास्तविक थे।

गैंगरेप की धारा से क्यों मिली राहत?

हाईकोर्ट ने अपने फैसले में आसाराम को भारतीय दंड संहिता की धारा 376-डी यानी गैंगरेप के आरोप से राहत दी है। अदालत ने माना कि इस विशेष धारा के तहत अभियोजन पर्याप्त साक्ष्य प्रस्तुत नहीं कर पाया।

हालांकि अदालत ने यह भी स्पष्ट किया कि इससे मुख्य अपराध की गंभीरता कम नहीं होती और पॉक्सो एक्ट व दुष्कर्म के अन्य आरोपों में दोषसिद्धि कायम रहेगी।

यानी आसाराम की उम्रकैद की सजा पर कोई प्रभाव नहीं पड़ेगा।

सह-आरोपी शिल्पी और शरतचंद बरी

हाईकोर्ट ने मामले में सह-आरोपी शिल्पी और शरतचंद को संदेह का लाभ देते हुए बरी कर दिया। अदालत ने कहा कि उनके खिलाफ पर्याप्त प्रत्यक्ष साक्ष्य नहीं पाए गए।

यह फैसला ट्रायल कोर्ट के निर्णय से अलग माना जा रहा है, क्योंकि निचली अदालत ने उन्हें भी दोषी माना था।

अंतरिम जमानत पर क्या कहा कोर्ट ने?

आसाराम फिलहाल अंतरिम जमानत पर बाहर है। 86 वर्षीय आसाराम ने बढ़ती उम्र और खराब स्वास्थ्य का हवाला देते हुए राहत मांगी थी।

राजस्थान हाईकोर्ट ने सुप्रीम कोर्ट के निर्देशों के तहत 29 अक्टूबर 2025 को उसे छह महीने की अंतरिम जमानत दी थी। बाद में इस राहत को कई बार बढ़ाया गया।

बुधवार को अदालत ने कहा कि पूर्व में दी गई अंतरिम जमानत की शर्तें फिलहाल जारी रहेंगी और यह राहत 7 जुलाई 2026 तक या विस्तृत निर्णय आने तक प्रभावी रहेगी।

हालांकि अदालत ने साफ किया कि अंतिम रूप से उसे सरेंडर करना होगा।

डबल बेंच ने सुनाया अहम फैसला

यह फैसला राजस्थान हाईकोर्ट की डबल बेंच, जस्टिस अरुण मोंगा और जस्टिस योगेन्द्र कुमार पुरोहित ने सुनाया।

हाईकोर्ट ने अंतिम बहस पूरी होने के बाद 20 अप्रैल को फैसला सुरक्षित रख लिया था। मंगलवार को अदालत ने अपना विस्तृत आदेश सुनाते हुए कहा कि रिकॉर्ड पर मौजूद साक्ष्यों के आधार पर गैंगरेप और पॉक्सो एक्ट की कुछ धाराओं में आरोप संदेह से परे सिद्ध नहीं हो सके।

हालांकि अदालत ने यह भी स्पष्ट किया कि दुष्कर्म से जुड़े मुख्य आरोपों में पर्याप्त साक्ष्य मौजूद हैं। इसी आधार पर भारतीय दंड संहिता की धारा 376 के तहत आसाराम की दोषसिद्धि और आजीवन कारावास की सजा को बरकरार रखा गया।

2018 में सुनाई गई थी उम्रकैद

गौरतलब है कि 25 अप्रैल 2018 को जोधपुर की स्पेशल पॉक्सो कोर्ट ने आसाराम को दोषी करार देते हुए अंतिम सांस तक कारावास की सजा सुनाई थी। अदालत ने माना था कि नाबालिग पीड़िता के साथ यौन शोषण और दुष्कर्म किया गया।

उसी मामले में सह-आरोपी शिवा और शिल्पी को भी 20-20 साल की सजा सुनाई गई थी। ट्रायल कोर्ट के फैसले को चुनौती देते हुए आसाराम और अन्य सह-आरोपियों ने राजस्थान हाईकोर्ट में अपील दायर की थी।

एक और दुष्कर्म मामले में भी उम्रकैद

आसाराम पहले से ही गुजरात के गांधीनगर स्थित आश्रम में एक महिला अनुयायी के साथ दुष्कर्म मामले में सजा काट रहा है।

जनवरी 2023 में गांधीनगर की अदालत ने उसे उस मामले में भी आजीवन कारावास की सजा सुनाई थी।

इस तरह अब दो अलग-अलग मामलों में आसाराम के खिलाफ गंभीर आपराधिक दोषसिद्धि कायम है।

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