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हर मामले में टेस्ट आइडेंटिफिकेशन परेड जरूरी नहीं, कोर्ट में हुई पहचान भी मान्य: सुप्रीम कोर्ट का फैसला-“पहचान परेड न होने भर से आरोपी बरी नहीं होगा”

Supreme Court Says Absence Of Test Identification Parade Not Fatal To Prosecution

नई दिल्ली: सुप्रीम कोर्ट ने एक अहम आपराधिक मामले में यह स्पष्ट किया है कि यदि किसी गवाह ने आरोपी की पहचान पहली बार अदालत (डॉक) में की है और उससे पहले टेस्ट आइडेंटिफिकेशन परेड (TIP) नहीं हुई, तो मात्र इस आधार पर अभियोजन का मामला कमजोर नहीं माना जा सकता।

कोर्ट ने कहा कि हर मामले में परिस्थितियां अलग होती हैं और यदि गवाह के पास आरोपी को पहचानने के पर्याप्त आधार हैं, तो ऐसी पहचान को नजरअंदाज नहीं किया जा सकता।

सुप्रीम कोर्ट ने कहा है कि यदि किसी मामले में टेस्ट आइडेंटिफिकेशन परेड (टीआईपी) नहीं कराई गई हो, तो केवल इसी आधार पर अभियोजन का पूरा मामला खारिज नहीं किया जा सकता।

अदालत ने स्पष्ट किया कि यदि गवाह ने घटना के समय आरोपी को पर्याप्त रूप से देखा हो, उसकी विशेषताओं को नोट किया हो या आरोपी घटना के तुरंत बाद गिरफ्तार हुआ हो, तो अदालत में पहली बार की गई पहचान भी साक्ष्य के रूप में स्वीकार की जा सकती है।

सुप्रीम कोर्ट ने यह टिप्पणी उत्तर प्रदेश के एक चर्चित अपहरण और फिरौती मामले में दो दोषियों की सजा बरकरार रखते हुए की। अदालत ने कहा कि पहचान परेड जांच का एक महत्वपूर्ण साधन जरूर है, लेकिन यह कोई अनिवार्य कानूनी शर्त नहीं है, जिसकी अनुपस्थिति में हर मामले में अभियोजन स्वतः विफल हो जाए।

जस्टिस पंकज मिथल और जस्टिस प्रसन्ना बी. वराले की पीठ ने कहा कि प्रत्येक मामले के तथ्य अलग होते हैं और पहचान संबंधी साक्ष्यों का मूल्यांकन भी उन्हीं तथ्यों के आधार पर किया जाना चाहिए।

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अपहरण, फिरौती और पहचान पर विवाद मामाला

मामला वर्ष 2003 में उत्तर प्रदेश में हुए एक अपहरण और फिरौती कांड से जुड़ा था।

अभियोजन के अनुसार कुछ लोगों ने दिनदहाड़े एक व्यक्ति का अपहरण कर लिया था और बाद में उसकी रिहाई के बदले फिरौती की मांग की गई। मामले की जांच के दौरान पुलिस ने आरोपियों को गिरफ्तार किया और उनके खिलाफ मुकदमा चलाया।

ट्रायल कोर्ट ने उपलब्ध साक्ष्यों के आधार पर आरोपियों को दोषी ठहराया। बाद में हाईकोर्ट ने भी सजा को बरकरार रखा।

इसके बाद दोषियों ने सुप्रीम कोर्ट का दरवाजा खटखटाया।

उनका मुख्य तर्क था कि जिन गवाहों ने अदालत में उनकी पहचान की, उन्होंने घटना के बाद पहली बार कोर्ट में ही उन्हें पहचाना था। चूंकि जांच के दौरान टेस्ट आइडेंटिफिकेशन परेड नहीं कराई गई थी, इसलिए ऐसी पहचान पर भरोसा नहीं किया जा सकता।

टेस्ट आइडेंटिफिकेशन परेड क्या होती है?

किसी अपराध के बाद जब आरोपी पुलिस की गिरफ्त में आता है और गवाह उसे पहले से नहीं जानता, तब उसकी पहचान की पुष्टि के लिए टेस्ट आइडेंटिफिकेशन परेड कराई जाती है।

इस प्रक्रिया में आरोपी को कई अन्य लोगों के बीच खड़ा किया जाता है और गवाह से पूछा जाता है कि वह अपराध करने वाले व्यक्ति की पहचान कर सकता है या नहीं।

इसका उद्देश्य यह जांचना होता है कि गवाह वास्तव में आरोपी को पहचानता है या नहीं।

अक्सर बचाव पक्ष यह तर्क देता है कि यदि टीआईपी नहीं कराई गई तो बाद में अदालत में की गई पहचान विश्वसनीय नहीं मानी जानी चाहिए।

इसी मुद्दे पर सुप्रीम कोर्ट ने इस मामले में महत्वपूर्ण स्पष्टीकरण दिया है।

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सुप्रीम कोर्ट ने क्यों खारिज की आरोपियों की दलील?

सुनवाई के दौरान अदालत ने पाया कि इस मामले के गवाहों को आरोपियों को देखने का पर्याप्त अवसर मिला था। घटना सुबह लगभग साढ़े 6 बजे हुई थी। उस समय पर्याप्त रोशनी थी और गवाहों का आरोपियों के साथ कई मिनट तक सीधा सामना हुआ था।

रिकॉर्ड के अनुसार दो युवा लड़कियों ने अपहरणकर्ताओं को बहुत नजदीक से देखा था। घटना के दौरान बातचीत हुई, धक्का-मुक्की हुई और आरोपी पंजाबी भाषा में बातचीत कर रहे थे।

सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि ऐसी परिस्थितियों में गवाहों को आरोपियों की शारीरिक बनावट, हावभाव और अन्य विशेषताओं को देखने का पर्याप्त अवसर मिला।

कोर्ट ने यह भी नोट किया कि गवाहों ने घटना के तुरंत बाद पुलिस को आरोपियों का सटीक विवरण दिया था। यही कारण था कि अदालत ने माना कि केवल टीआईपी न होने के आधार पर उनकी गवाही को खारिज नहीं किया जा सकता।

पूर्व फैसलों का हवाला: ‘Ronny केस’ बना आधार

अपने फैसले में सुप्रीम कोर्ट ने 1998 के एक महत्वपूर्ण निर्णय “रोनी उर्फ रोनाल्ड जेम्स अल्वारिस बनाम महाराष्ट्र राज्य” का उल्लेख किया।

उस फैसले में भी सर्वोच्च अदालत ने कहा था कि यदि गवाह को आरोपी के साथ पर्याप्त संपर्क का अवसर मिला हो या उसने आरोपी की विशेषताओं को ध्यान से देखा हो, तो अदालत में पहली बार की गई पहचान को केवल इसलिए खारिज नहीं किया जा सकता क्योंकि पहचान परेड नहीं हुई।

वर्तमान मामले में भी अदालत ने इसी सिद्धांत को लागू किया। पीठ ने कहा कि पहचान परेड का उद्देश्य केवल जांच एजेंसी को सहायता देना होता है। यह स्वयं कोई स्वतंत्र साक्ष्य नहीं होती।

वास्तविक साक्ष्य वह पहचान होती है जो गवाह अदालत में करता है। इसलिए यदि अदालत को लगता है कि गवाह की पहचान विश्वसनीय है, तो टीआईपी का अभाव हमेशा घातक नहीं माना जा सकता।

हर मामले में एक जैसा नियम लागू नहीं होगा: सुप्रीम कोर्ट

सुप्रीम कोर्ट ने यह भी स्पष्ट किया कि उसका फैसला यह नहीं कहता कि पहचान परेड की जरूरत ही नहीं है।

कोर्ट ने कहा कि कई मामलों में टीआईपी अत्यंत महत्वपूर्ण होती है, विशेषकर तब जब:

  1. घटना बहुत कम समय में हुई हो।
  2. गवाह को आरोपी को देखने का अवसर नहीं मिला हो।
  3. आरोपी पहले से अपरिचित हो।
  4. या पहचान को लेकर संदेह की स्थिति हो।

लेकिन यदि मामले के तथ्य यह दर्शाते हैं कि गवाह ने आरोपी को पर्याप्त रूप से देखा और पहचानने योग्य विवरण दिया, तो केवल टीआईपी न होने के कारण अभियोजन का मामला अस्वीकार नहीं किया जा सकता।

कोर्ट ने कहा कि कानून को यांत्रिक तरीके से लागू नहीं किया जा सकता और प्रत्येक मामले का मूल्यांकन उसके तथ्यों के आधार पर होना चाहिए।

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अदालत ने किन तथ्यों को सबसे महत्वपूर्ण माना?

फैसले में सुप्रीम कोर्ट ने कुछ विशेष परिस्थितियों का उल्लेख किया जिन्हें उसने महत्वपूर्ण माना।

  • घटना दिन के उजाले में हुई थी।
  • गवाहों का आरोपियों के साथ आमना-सामना कई मिनट तक चला।
  • गवाहों ने पुलिस को आरोपियों का स्पष्ट शारीरिक विवरण दिया था।
  • आरोपियों की गिरफ्तारी घटना के तुरंत बाद हुई थी।
  • रिकॉर्ड में ऐसा कोई ठोस कारण नहीं था जिससे गवाहों की पहचान पर संदेह किया जा सके।

अदालत ने कहा कि इन सभी परिस्थितियों को एक साथ देखने पर यह निष्कर्ष निकलता है कि गवाहों द्वारा अदालत में की गई पहचान विश्वसनीय थी।

सुप्रीम कोर्ट का अंतिम फैसला

सभी तथ्यों और साक्ष्यों पर विचार करने के बाद सुप्रीम कोर्ट ने दोषियों की अपील खारिज कर दी। सुप्रीम कोर्ट ने ट्रायल कोर्ट और हाईकोर्ट द्वारा दिए गए दोषसिद्धि के आदेश को बरकरार रखा।

पीठ ने कहा कि रिकॉर्ड में उपलब्ध साक्ष्य यह साबित करने के लिए पर्याप्त हैं कि आरोपियों ने अपराध किया था।

कोर्ट ने माना कि इस मामले में गवाहों की पहचान विश्वसनीय थी और केवल टेस्ट आइडेंटिफिकेशन परेड न होने के आधार पर उसे अस्वीकार नहीं किया जा सकता।

भविष्य के मामलों पर असर

यह फैसला भारतीय आपराधिक न्याय प्रणाली में पहचान संबंधी साक्ष्यों के मूल्यांकन को लेकर महत्वपूर्ण मार्गदर्शन प्रदान करता है।

सुप्रीम कोर्ट ने स्पष्ट किया है कि टेस्ट आइडेंटिफिकेशन परेड जांच का उपयोगी साधन है, लेकिन यह कोई ऐसा नियम नहीं है जिसकी अनुपस्थिति में हर मुकदमा विफल हो जाए।

यदि गवाहों को आरोपी को देखने का पर्याप्त अवसर मिला हो और उनकी पहचान अन्य परिस्थितियों से पुष्ट होती हो, तो अदालत में पहली बार की गई पहचान भी दोषसिद्धि का आधार बन सकती है।

सुप्रीम कोर्ट ने स्पष्ट कर दिया है कि कोर्ट केवल तकनीकी आधारों पर नहीं बल्कि पूरे साक्ष्य और परिस्थितियों को देखकर निर्णय करेगा। यदि अन्य साक्ष्य मजबूत हैं और पहचान विश्वसनीय है, तो केवल पहचान परेड न होने से दोषसिद्धि समाप्त नहीं होगी।

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