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चेक बाउंस केस में राजस्थान हाईकोर्ट का अहम फैसला: ‘सिग्नेचर और लिखावट से इनकार के बाद शिकायतकर्ता रसीद को लेन-देन से अलग नहीं बता सकता’

Rajasthan High Court Says Complainant Cannot Disown Receipt After Denying Signature And Handwriting

जोधपुर: राजस्थान हाईकोर्ट ने चेक बाउंस मामलों में दस्तावेजी साक्ष्यों के महत्व को लेकर एक अहम फैसला सुनाया है।

हाईकोर्ट ने कहा है कि यदि कोई शिकायतकर्ता किसी दस्तावेज पर मौजूद अपने हस्ताक्षर और लिखावट दोनों से पूरी तरह इंकार कर देता है, तो वह बाद में यह दलील नहीं दे सकता कि उस दस्तावेज का विवादित लेनदेन से कोई संबंध नहीं है।

हाईकोर्ट ने माना कि ऐसी स्थिति में दस्तावेज की वैज्ञानिक जांच आवश्यक हो जाती है और उसे फोरेंसिक साइंस लेबोरेटरी (एफएसएल) भेजने से इनकार नहीं किया जा सकता।

जस्टिस फरजंद अली की एकल पीठ ने यह टिप्पणी करते हुए जोधपुर की विशेष एनआई एक्ट अदालत के उस आदेश को रद्द कर दिया, जिसमें आरोपी की ओर से विवादित दस्तावेज की एफएसएल जांच कराने की मांग खारिज कर दी गई थी।

हाईकोर्ट ने ट्रायल कोर्ट को निर्देश दिया कि विवादित दस्तावेज को हस्ताक्षर और लिखावट की जांच के लिए एफएसएल भेजा जाए। साथ ही एफएसएल रिपोर्ट आने तक मुकदमे की आगे की कार्यवाही स्थगित रखने का आदेश भी दिया।

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क्या है पूरा मामला?

मामला जोधपुर निवासी विक्रम सिंह और वीरेन्द्र सिंह के बीच चल रहे चेक बाउंस विवाद से जुड़ा है।

रिकॉर्ड के अनुसार वीरेन्द्र सिंह ने परक्राम्य लिखत अधिनियम (Negotiable Instruments Act) की धारा 138 के तहत शिकायत दर्ज कराते हुए आरोप लगाया था कि उन्होंने विक्रम सिंह को ₹10 लाख का ऋण दिया था। इसके बदले विक्रम सिंह ने 25 दिसंबर 2016 का एक चेक जारी किया था।

जब चेक बैंक में प्रस्तुत किया गया तो वह “Funds Insufficient” यानी खाते में पर्याप्त राशि नहीं होने के कारण अनादृत हो गया।

इसके बाद शिकायतकर्ता ने चेक बाउंस का मुकदमा दायर किया। मामले की सुनवाई के दौरान शिकायतकर्ता वीरेन्द्र सिंह और एक अन्य गवाह गोपाल सिंह के बयान दर्ज किए गए। बाद में आरोपी विक्रम सिंह का बयान भी दर्ज किया गया।

आरोपी ने पेश की ₹10 लाख की रसीद

मुकदमे की सुनवाई के दौरान विक्रम सिंह ने अपने बचाव में एक महत्वपूर्ण दस्तावेज पेश किया, जिसे रिकॉर्ड पर Exhibit D01A के रूप में दर्ज किया गया।

आरोपी का दावा था कि यह एक रसीद है और उसी ₹10 लाख की राशि से संबंधित है जो चेक बाउंस शिकायत का आधार बनी हुई है।

विक्रम सिंह का तर्क था कि यह दस्तावेज इस बात का प्रमाण है कि विवादित राशि के संबंध में लेनदेन हुआ था और इसलिए इसकी सत्यता की जांच होना जरूरी है।

आरोपी ने अदालत से मांग की कि रसीद को फोरेंसिक जांच के लिए भेजा जाए ताकि हस्ताक्षर और लिखावट की वास्तविकता सामने आ सके।

मामले में असली विवाद तब पैदा हुआ जब शिकायतकर्ता ने इस दस्तावेज को पूरी तरह नकार दिया।

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शिकायतकर्ता ने हस्ताक्षर और लिखावट दोनों से किया इनकार

हाईकोर्ट के समक्ष रिकॉर्ड से यह स्पष्ट हुआ कि शिकायतकर्ता वीरेन्द्र सिंह ने विवादित रसीद पर मौजूद न केवल हस्ताक्षरों बल्कि पूरी लिखावट से भी इंकार कर दिया था।

यानी शिकायतकर्ता का रुख यह था कि दस्तावेज पर उसका कोई संबंध नहीं है और उसमें मौजूद हस्ताक्षर या लिखावट उसकी नहीं है।

इसके बाद आरोपी ने आवेदन देकर मांग की कि दस्तावेज को एफएसएल भेजा जाए और उसकी तुलना शिकायतकर्ता के रिकॉर्ड पर उपलब्ध स्वीकारित हस्ताक्षरों और लिखावट से कराई जाए।

लेकिन ट्रायल कोर्ट ने यह कहते हुए आवेदन खारिज कर दिया कि दस्तावेज की जांच का मुकदमे के अंतिम परिणाम पर कोई विशेष प्रभाव नहीं पड़ेगा। इसी आदेश को चुनौती देते हुए आरोपी हाईकोर्ट पहुंचा था।

हाईकोर्ट ने ट्रायल कोर्ट के फैसले पर उठाए सवाल

राजस्थान हाईकोर्ट ने पाया कि ट्रायल कोर्ट ने आवेदन को ठोस कानूनी आधारों पर नहीं बल्कि अनुमान के आधार पर खारिज किया था।

अदालत ने कहा कि यह पहले से मान लेना कि दस्तावेज की जांच का मुकदमे पर कोई असर नहीं पड़ेगा, उचित नहीं है।

जस्टिस फरजंद अली ने कहा कि जब आरोपी का बचाव एक ऐसे दस्तावेज पर आधारित है जिसकी सत्यता विवादित है, तब उसकी वैज्ञानिक जांच मुकदमे के निष्पक्ष निपटारे के लिए आवश्यक हो सकती है।

हाईकोर्ट ने कहा कि ट्रायल कोर्ट इस महत्वपूर्ण तथ्य को समझने में विफल रहा कि विशेषज्ञ जांच रिपोर्ट मामले के अंतिम निर्णय पर सीधा प्रभाव डाल सकती है। इसलिए निचली अदालत का आदेश कानून की दृष्टि में टिकाऊ नहीं माना जा सकता।

शिकायतकर्ता की दलील पर हाईकोर्ट की टिप्पणी

फैसले का सबसे महत्वपूर्ण हिस्सा शिकायतकर्ता के रुख को लेकर कोर्ट की टिप्पणी रही।

हाईकोर्ट ने कहा कि यदि शिकायतकर्ता यह स्वीकार करता कि रसीद पर हस्ताक्षर और लिखावट उसकी है, लेकिन साथ ही यह स्पष्टीकरण देता कि उसका विवादित लेनदेन से कोई संबंध नहीं है, तो मामला अलग हो सकता था।

लेकिन यहां शिकायतकर्ता ने पूरी तरह यह कहा कि दस्तावेज पर न तो उसके हस्ताक्षर हैं और न ही उसकी लिखावट।

अदालत ने कहा कि ऐसी स्थिति में शिकायतकर्ता बाद में यह दलील नहीं दे सकता कि दस्तावेज का विवादित लेनदेन से कोई संबंध नहीं है। यदि उसे ऐसा कहना था तो उसे अपनी गवाही के दौरान ही स्पष्ट करना चाहिए था कि कथित रसीद किसी अन्य लेनदेन से जुड़ी है।

कोर्ट ने माना कि दस्तावेज की प्रामाणिकता और उसके लेनदेन से संबंध का प्रश्न अब विशेषज्ञ जांच के जरिए ही स्पष्ट हो सकता है।

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FSL जांच के आदेश, ट्रायल पर भी लगाई रोक

सभी तथ्यों पर विचार करने के बाद हाईकोर्ट ने ट्रायल कोर्ट का आदेश रद्द कर दिया और आरोपी का आवेदन स्वीकार कर लिया।

हाईकोर्ट ने निर्देश दिया कि Exhibit D01A को एफएसएल भेजा जाए और उसकी तुलना शिकायतकर्ता के रिकॉर्ड पर उपलब्ध निर्विवाद हस्ताक्षरों और लिखावट से कराई जाए।

कोर्ट ने यह भी कहा कि ट्रायल कोर्ट वकालतनामा, आवेदन पत्रों और अन्य निर्विवाद दस्तावेजों की पहचान कर उन्हें भी तुलना के लिए एफएसएल भेज सकता है। विशेषज्ञ यह राय देंगे कि विवादित दस्तावेज पर मौजूद हस्ताक्षर और लिखावट शिकायतकर्ता की है या नहीं।

सबसे महत्वपूर्ण बात यह रही कि हाईकोर्ट ने एफएसएल रिपोर्ट आने तक ट्रायल कोर्ट की आगे की कार्यवाही पर रोक लगा दी।

क्यों महत्वपूर्ण है यह फैसला?

यह फैसला केवल एक चेक बाउंस मामले तक सीमित नहीं है। राजस्थान हाईकोर्ट ने स्पष्ट किया है कि जब किसी दस्तावेज की सत्यता और प्रासंगिकता विवाद का केंद्र हो, तब अदालतें केवल अनुमान के आधार पर वैज्ञानिक जांच से इनकार नहीं कर सकतीं।

फैसला यह भी बताता है कि मुकदमे में कोई पक्ष एक तरफ किसी दस्तावेज से पूरी तरह इनकार करे और दूसरी तरफ उसकी प्रासंगिकता पर अलग दलील दे, तो ऐसी विरोधाभासी स्थिति को अदालत गंभीरता से देखेगी।

यह निर्णय भविष्य में चेक बाउंस और दस्तावेजी साक्ष्यों से जुड़े मामलों में महत्वपूर्ण मिसाल बनेगा और एफएसएल जांच के महत्व को और मजबूत करेगा।

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