नई दिल्ली: दिवाला एवं शोधन अक्षमता संहिता (IBC) के तहत अपीलों में देरी को लेकर सुप्रीम कोर्ट ने एक अहम फैसला सुनाया है।
सुप्रीम कोर्ट ने स्पष्ट किया है कि आईबीसी की धारा 62 के तहत दायर अपील में यदि कोई तकनीकी या प्रक्रियागत खामी रह जाती है, तो उसे रजिस्ट्री द्वारा सूचना दिए जाने के 28 दिनों के भीतर ही दूर किया जा सकता है।
इसके बाद खामियां दूर करने या पुनः दाखिल में हुई देरी को माफ कराने का कोई अधिकार उपलब्ध नहीं है।
जस्टिस दीपांकर दत्ता और जस्टिस सतीश चंद्र शर्मा की पीठ ने कहा कि आईबीसी एक सख्त और समयबद्ध कानून है, जिसका उद्देश्य दिवाला समाधान प्रक्रिया को तेजी से पूरा करना है।
इसलिए इसमें समयसीमा का पालन अनिवार्य है और अदालतें अनिश्चितकाल तक देरी माफ नहीं कर सकतीं।
फैसला उस अपील पर सुनाया गया, जिसे लिक्विडेशन (परिसमापन) में जा चुकी एक कॉरपोरेट देनदार कंपनी के लिक्विडेटर (परिसमापक) ने राष्ट्रीय कंपनी कानून अपीलीय न्यायाधिकरण (NCLAT) के आदेश के खिलाफ सुप्रीम कोर्ट में दायर किया था।
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लिक्विडेटर की अपील और देरी का विवाद
मामला सीए रामचंद्र दल्लाराम चौधरी बनाम अदाणी इंफ्रास्ट्रक्चर एंड डेवलपर्स प्राइवेट लिमिटेड से जुड़ा है।
अपीलकर्ता एक ऐसी कंपनी के परिसमापक थे जो पहले से लिक्विडेशन प्रक्रिया में थी।
उन्होंने राष्ट्रीय कंपनी कानून अपीलीय न्यायाधिकरण के फैसले को चुनौती देते हुए आईबीसी की धारा 62 के तहत सुप्रीम कोर्ट में अपील दायर की।
हालांकि अपील समयसीमा के भीतर पूरी तरह व्यवस्थित रूप से दाखिल नहीं की गई थी।
रिकॉर्ड के अनुसार अपील 29 जनवरी 2026 को दायर की गई। रजिस्ट्री ने पाया कि अपील में कई तकनीकी खामियां थीं और उसे दोषपूर्ण (डिफेक्टिव अपील) के रूप में दर्ज किया गया।
इसके अलावा अपील दाखिल करने में भी सात दिन की देरी थी, जिसके लिए अलग से देरी माफी का आवेदन दायर किया गया।
स्थिति और जटिल तब हुई जब अपील में बताई गई खामियां दूर करने के बाद उसे दोबारा दाखिल करने में 82 दिन की अतिरिक्त देरी हो गई। इसके लिए भी अपीलकर्ता ने देरी माफी की मांग की।
IBC में समय सीमा का सख्त नियम
सुप्रीम कोर्ट ने इस मामले में IBC के तहत अपील की समय सीमा को विस्तार से समझाया। कोर्ट ने कहा:
- सेक्शन 62(1) के तहत अपील दाखिल करने के लिए 45 दिन का समय मिलता है।
- सेक्शन 62(2) के तहत अधिकतम 15 दिन की अतिरिक्त छूट दी जा सकती है।
- यानी कुल मिलाकर 60 दिन के भीतर ही अपील दाखिल करनी होती है।
कोर्ट ने साफ किया कि 60 दिनों के बाद अपील पूरी तरह समय-सीमा से बाहर हो जाती है और उसके बाद अदालत के पास देरी माफ करने का अधिकार भी नहीं रहता।
यह व्यवस्था IBC के उद्देश्य-तेजी से विवाद निपटान को ध्यान में रखते हुए बनाई गई है।
पीठ ने कहा कि यह सीमा स्वयं संसद ने तय की है और अदालत इसके बाहर जाकर देरी माफ नहीं कर सकती।
कोर्ट ने स्पष्ट शब्दों में कहा कि 60 दिन के बाद अपील पर विचार करने का अधिकार ही समाप्त हो जाता है।
रजिस्ट्री की आपत्तियां और 28 दिन का नियम
सुप्रीम कोर्ट ने अपने नियमों का भी विस्तार से उल्लेख किया।
कोर्ट ने कहा कि यदि किसी अपील में तकनीकी खामियां पाई जाती हैं, तो रजिस्ट्री उसकी सूचना देती है।
इसके बाद याचिकाकर्ता को 28 दिन का समय मिलता है, जिसके भीतर उसे सभी खामियां दूर कर पुनः दाखिल करना होता है।
सामान्य मामलों में यदि 28 दिन के बाद भी खामियां दूर की जाती हैं, तो पुनः दाखिल करने में हुई देरी को माफ करने के लिए आवेदन दिया जा सकता है। लेकिन आईबीसी मामलों की स्थिति अलग है।
कोर्ट ने कहा कि आईबीसी की समयबद्ध प्रकृति को देखते हुए 28 दिन की अवधि समाप्त होने के बाद खामियां दूर करने की अनुमति नहीं दी जा सकती।
“देरी माफी” की अवधारणा आईबीसी में सीमित
सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि आईबीसी के ढांचे में देरी माफी की अवधारणा बेहद सीमित है।
अदालत के अनुसार:
“कानून ने जितनी राहत देने की अनुमति दी है, अदालत उससे अधिक राहत नहीं दे सकती।”
कोर्ट ने कहा कि एक बार वैधानिक अवधि समाप्त हो जाए तो उसके बाद देरी माफ करना कानून के उद्देश्य के विपरीत होगा।
पीठ ने कहा कि आईबीसी का मूल उद्देश्य समयबद्ध समाधान है। यदि अपीलों में लगातार देरी को माफ किया जाने लगे तो पूरा दिवाला तंत्र प्रभावित हो जाएगा।
अदाणी समूह से जुड़े मामले में क्या कहा गया?
मामले में प्रतिवादी अदाणी इंफ्रास्ट्रक्चर एंड डेवलपर्स प्राइवेट लिमिटेड थी।
अपीलकर्ता ने तर्क दिया कि उसे पहले NCLAT के सामने भी देरी माफी का लाभ मिला था, इसलिए सुप्रीम कोर्ट को भी उदार दृष्टिकोण अपनाना चाहिए।
लेकिन अदालत ने इस दलील को स्वीकार नहीं किया। पीठ ने कहा कि किसी पूर्व मामले में मिली राहत भविष्य में समान राहत का स्वतः आधार नहीं बन सकती।
कोर्ट ने कहा कि हर अपीलीय चरण स्वतंत्र होता है और हर स्तर पर समयसीमा का अलग महत्व है।
कोर्ट ने टिप्पणी की कि आईबीसी मामलों में बार-बार देरी माफ करने की प्रवृत्ति कानून की मूल भावना के खिलाफ होगी।
पर्याप्त कारण साबित नहीं कर सका अपीलकर्ता
सुप्रीम कोर्ट ने रिकॉर्ड का अध्ययन करने के बाद पाया कि अपीलकर्ता देरी का कोई ठोस और विश्वसनीय कारण प्रस्तुत नहीं कर पाया।
अदालत ने कहा कि अपील दाखिल करने में हुई देरी का संतोषजनक स्पष्टीकरण नहीं दिया गया। खामियां दूर करने में 82 दिन की अतिरिक्त देरी का भी कोई उचित कारण नहीं बताया गया। प्रस्तुत कारण इतने मजबूत नहीं थे कि अदालत अपने विवेकाधिकार का प्रयोग कर राहत प्रदान करे।
कोर्ट ने कहा कि केवल औपचारिक स्पष्टीकरण या सामान्य कारणों के आधार पर आईबीसी जैसी समयबद्ध प्रक्रिया में देरी स्वीकार नहीं की जा सकती।
सुप्रीम कोर्ट का फैसला
सभी पक्षों को सुनने और रिकॉर्ड का परीक्षण करने के बाद सुप्रीम कोर्ट ने अपील को समय-सीमा से बाहर मानते हुए खारिज कर दिया।
कोर्ट ने स्पष्ट किया कि:
- आईबीसी की धारा 62 के तहत अपील 45 दिन में दाखिल होनी चाहिए।
- अधिकतम 15 दिन की अतिरिक्त राहत मिल सकती है।
- दोषपूर्ण अपील में खामियां 28 दिन के भीतर दूर करनी होंगी।
- 28 दिन के बाद खामियां दूर करने या पुनः दाखिल करने में हुई देरी माफ नहीं की जा सकती।
इस प्रकार सुप्रीम कोर्ट ने अपील को सुनवाई योग्य मानने से ही इनकार कर दिया।
फैसले का असर
यह फैसला आईबीसी मामलों में समयसीमा के महत्व को और मजबूत करता है।
हाल के वर्षों में सुप्रीम कोर्ट कई बार कह चुका है कि दिवाला कानून का उद्देश्य त्वरित समाधान सुनिश्चित करना है। यदि मामलों में लगातार देरी होती रही तो निवेशकों, कर्जदाताओं और कंपनियों के हित प्रभावित होंगे।
इस फैसले से स्पष्ट हो गया है कि आईबीसी मामलों में तकनीकी लापरवाही महंगी पड़ सकती है। समयसीमा का पालन अनिवार्य है। दोषपूर्ण अपील दाखिल करने के बाद भी अनिश्चितकाल तक सुधार का अवसर नहीं मिलेगा।
दिवाला कानून के तहत अदालतें सीमित परिस्थितियों में ही देरी माफ करेंगी।
यह निर्णय भविष्य में आईबीसी से जुड़े सभी पक्षों- कंपनियों, परिसमापकों, बैंकों और वकीलों के लिए महत्वपूर्ण साबित होगा।