1961 में हुए जमीन सौदे को लेकर दशकों बाद दोबारा उठाए गए विवाद पर हाईकोर्ट सख्त, कहा— “जो मामला अंतिम हो चुका, उसे आयोग की रिपोर्ट के सहारे फिर से नहीं खोला जा सकता”
जयपुर। राजस्थान हाईकोर्ट की जयपुर पीठ ने करीब 65 साल पुराने आदिवासी भूमि हस्तांतरण विवाद में महत्वपूर्ण फैसला सुनाते हुए राज्य सरकार की ओर से दोबारा उठाए गए दावों को खारिज कर दिया है।
कार्यवाहक मुख्य न्यायाधीश जस्टिस संजीव प्रकाश शर्मा और जस्टिस बिपिन गुप्ता की खंडपीठ ने M/s Sanskar Land Developers Pvt. Ltd. बनाम राज्य सरकार मामले में सुनवाई करते हुए कहा कि जो विवाद पहले ही अंतिम रूप से तय हो चुका हो, उसे दशकों बाद दोबारा नहीं खोला जा सकता।
कोर्ट ने अपने फैसले में यह भी स्पष्ट किया कि किसी आयोग की रिपोर्ट के आधार पर पहले से समाप्त विवाद को पुनर्जीवित नहीं किया जा सकता।
खंडपीठ ने राज्य सरकार की कार्रवाई को “अनुचित और अवैध” बताते हुए एकलपीठ के आदेश को रद्द कर दिया तथा राजस्व मंडल, अजमेर के वर्ष 2019 के आदेश को बहाल कर दिया।
क्या है पूरा मामला
मामला जयपुर के मीनावाला क्षेत्र स्थित करीब 32 बीघा 10 बिस्वा भूमि से जुड़ा है। यह जमीन मूल रूप से अनुसूचित जनजाति (मीणा समुदाय) के खातेदारों के नाम दर्ज थी।
वर्ष 1961 में इस भूमि को प्रभाराम बागड़ा नामक सामान्य वर्ग के व्यक्ति के पक्ष में विक्रय कर दिया गया था। बाद में यह भूमि कृष्ण गोपाल रूंगटा सहित अन्य लोगों को हस्तांतरित होती रही।
राज्य सरकार का दावा था कि यह हस्तांतरण राजस्थान काश्तकारी अधिनियम, 1955 की धारा 42 का उल्लंघन था।
उक्त धारा के तहत अनुसूचित जाति एवं अनुसूचित जनजाति की भूमि सामान्य वर्ग के व्यक्ति को बेचना प्रतिबंधित है। सरकार का कहना था कि इसलिए यह विक्रय प्रारंभ से ही शून्य और अवैध था।
1977 में शुरू हुई थी पहली कार्रवाई
राज्य सरकार ने वर्ष 1977 में धारा 175 के तहत कार्रवाई शुरू कर भूमि हस्तांतरण को अवैध बताते हुए बेदखली की मांग की थी।
लेकिन वर्ष 1978 में सक्षम राजस्व न्यायालय ने यह मामला समय-सीमा यानी लिमिटेशन के आधार पर खारिज कर दिया।
महत्वपूर्ण बात यह रही कि उस आदेश को राज्य सरकार ने आगे किसी उच्च न्यायालय में चुनौती नहीं दी। इस कारण वह आदेश अंतिम माना गया।
इसके करीब 17 वर्ष बाद, वर्ष 1995 में राज्य सरकार ने राजस्थान भू-राजस्व अधिनियम की धारा 82 के तहत पुनः संदर्भ (Reference) दायर कर मामला फिर से उठाने का प्रयास किया।
इसी विवाद के दौरान कई निजी पक्षकार और कंपनियां भी मामले में जुड़ती चली गईं।
बेरी आयोग की रिपोर्ट बनी विवाद का केंद्र
राज्य सरकार ने अपने दावे को मजबूत करने के लिए बेरी आयोग की रिपोर्ट का सहारा लिया।
आयोग ने अपनी जांच में कहा था कि 1961 में किया गया भूमि विक्रय अवैध था और इससे किसी प्रकार का वैध अधिकार उत्पन्न नहीं हुआ।
हालांकि हाईकोर्ट की खंडपीठ ने साफ कहा कि आयोग केवल एक तथ्य खोजने वाली संस्था (Fact Finding Body) होता है, उसे न्यायिक अधिकार प्राप्त नहीं होते।
अदालत ने सुप्रीम कोर्ट के कई फैसलों का हवाला देते हुए कहा कि आयोग की रिपोर्ट को किसी न्यायिक निर्णय का आधार नहीं बनाया जा सकता।
कोर्ट ने कहा कि यदि किसी मामले में न्यायालय पहले ही अंतिम निर्णय दे चुका है, तो बाद में किसी आयोग की रिपोर्ट के माध्यम से उसी विवाद को दोबारा खोलना न्यायिक प्रक्रिया के सिद्धांतों के खिलाफ है।
“जो सीधे नहीं हो सकता, वह परोक्ष रूप से भी नहीं हो सकता”
खंडपीठ ने अपने फैसले में एक महत्वपूर्ण कानूनी सिद्धांत का उल्लेख करते हुए कहा कि
“जो कार्य कानून सीधे करने की अनुमति नहीं देता, उसे परोक्ष तरीके से भी नहीं किया जा सकता।” अदालत ने माना कि राज्य सरकार ने पहले जिस मामले में हार स्वीकार कर ली थी, उसी मुद्दे को आयोग की रिपोर्ट के सहारे फिर से उठाने की कोशिश की।
कोर्ट ने कहा कि यदि इस प्रकार पुराने मामलों को बार-बार खोला जाएगा तो न्यायिक व्यवस्था में स्थिरता समाप्त हो जाएगी और लोगों के अधिकारों पर अनिश्चितता बनी रहेगी।
लंबे समय से बदल चुकी थी जमीन की स्थिति
सुनवाई के दौरान यह तथ्य भी सामने आया कि विवादित भूमि का स्वरूप अब पूरी तरह बदल चुका है।
भूमि को गैर-कृषि उपयोग के लिए परिवर्तित किया जा चुका है और जयपुर विकास प्राधिकरण (JDA) के विकास कार्यों से भी यह जुड़ चुकी है।
कोर्ट ने माना कि दशकों से कई लोगों के बीच हस्तांतरण होने, औद्योगिक उपयोग और सरकारी विकास योजनाओं में शामिल हो जाने के बाद अब पुराने राजस्व विवाद को जारी रखना व्यावहारिक नहीं है।
खंडपीठ ने यह भी कहा कि अब भूमि कृषि भूमि नहीं रही, इसलिए राजस्थान काश्तकारी अधिनियम के प्रावधान भी पूर्ववत लागू नहीं होते।
एकलपीठ के आदेश को किया रद्द
इस मामले में एकलपीठ ने वर्ष 2025 में राजस्व मंडल के आदेश को निरस्त करते हुए मामले को दोबारा सुनवाई के लिए वापस भेज दिया था।
लेकिन खंडपीठ ने उस आदेश को गलत ठहराते हुए कहा कि अनावश्यक रिमांड से केवल मुकदमेबाजी बढ़ती है और न्यायिक प्रक्रिया लंबी होती जाती है।
कोर्ट ने सुप्रीम कोर्ट के हालिया फैसलों का हवाला देते हुए कहा कि न्यायालयों को ऐसे मामलों में अनावश्यक रूप से पुनः सुनवाई के आदेश देने से बचना चाहिए।
JDA के नाम दर्ज होंगे राजस्व रिकॉर्ड
फैसले के अंत में हाईकोर्ट ने संबंधित राजस्व अधिकारियों को निर्देश दिया कि विवादित भूमि के रिकॉर्ड जयपुर विकास प्राधिकरण के नाम दर्ज किए जाएं और आवश्यक राजस्व प्रविष्टियां दो सप्ताह के भीतर पूरी की जाएं।
इसके साथ ही अदालत ने स्पष्ट किया कि राजस्व मंडल, अजमेर का वर्ष 2019 का आदेश पुनः प्रभावी रहेगा और राज्य सरकार की कार्रवाई निरस्त मानी जाएगी।
हाईकोर्ट ने अपने फैसले में जहां एक ओर अनुसूचित जनजाति की भूमि सुरक्षा के सिद्धांत को स्वीकार किया, वहीं दूसरी ओर यह भी स्पष्ट किया कि कानून की प्रक्रिया और समय-सीमा का पालन अनिवार्य है।