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1000 से ज्यादा खरीदारों से 300 करोड़ वसूले, 22 में से सिर्फ 5 टावर पूरे: एवलॉन रॉयल पार्क की फोरेंसिक जांच कराएगा रेरा

Rajasthan RERA Orders Forensic Audit of Avalon Royal Park Project Over Alleged Financial Irregularities

खर्च और निर्माण में मिला बड़ा अंतर,दिवाला प्रक्रिया के बीच रेरा का बड़ा फैसला, रेरा ने दो माह में रिपोर्ट मांगी

जयपुर/भिवाड़ी। राजस्थान रियल एस्टेट रेगुलेटरी अथॉरिटी (RERA) ने अलवर जिले के भिवाड़ी स्थित बहुचर्चित आवासीय परियोजना “एवलॉन रॉयल पार्क” में कथित वित्तीय अनियमितताओं और परियोजना निधियों के उपयोग को लेकर बड़ा फैसला सुनाया है।

रेरा ने परियोजना के खातों और वित्तीय रिकॉर्ड की सीमित फोरेंसिक ऑडिट (Forensic Audit) कराने के आदेश दिए हैं।

अथॉरिटी ने माना कि परियोजना की लागत, प्राप्तियों, खर्चों और वास्तविक निर्माण प्रगति से जुड़े रिकॉर्ड में गंभीर विरोधाभास और विसंगतियां मौजूद हैं, जिनकी स्वतंत्र जांच आवश्यक है।

रेरा अध्यक्ष वीनू गुप्ता ने अपने आदेश में कहा है कि यद्यपि परियोजना से संबंधित कंपनी के विरुद्ध दिवाला एवं शोधन अक्षमता संहिता (IBC) के तहत कार्यवाही राष्ट्रीय कंपनी विधि अधिकरण (NCLT) में लंबित है, फिर भी रेरा को परियोजना से संबंधित वित्तीय अनियमितताओं की जांच करने का अधिकार प्राप्त है।

खरीदारों की शिकायत पर हुई सुनवाई

मामले में एवलॉन रॉयल पार्क होमबायर्स एसोसिएशन की ओर से अधिवक्ता मोहित खंडेलवाल ने फोरेंसिक ऑडिट की मांग की थी।

एसोसिएशन का आरोप था कि परियोजना के लिए खरीदारों से बड़ी मात्रा में धनराशि एकत्र की गई, लेकिन परियोजना आज तक पूरी नहीं हुई।

खरीदारों ने यह भी आरोप लगाया कि परियोजना निधियों का उपयोग निर्धारित उद्देश्य के लिए नहीं किया गया तथा धन के दुरुपयोग और डायवर्जन की आशंका है।

2012 में शुरू हुई थी परियोजना

दस्तावेजों के अनुसार, GRJ Distributors and Developers Pvt. Ltd. ने वर्ष 2012 में भिवाड़ी के सेक्टर-14 क्षेत्र में एवलॉन रॉयल पार्क परियोजना शुरू की थी।

परियोजना में 1000 से अधिक फ्लैट विकसित किए जाने थे।

बाद में परियोजना का रेरा पंजीकरण भी कराया गया और वर्ष 2020 तक इसे पूरा करने का आश्वासन दिया गया था, लेकिन समयसीमा समाप्त होने के बाद भी परियोजना अधूरी रह गई।

खरीदारों से वसूले 300 करोड़ रुपये

होमबायर्स एसोसिएशन के अनुसार बिल्डर ने वर्ष 2012 से 2016 के बीच खरीदारों से लगभग 300 करोड़ रुपये प्राप्त किए।

इसके अतिरिक्त बैंक ऋण के रूप में करीब 30 करोड़ रुपये और प्राप्त हुए।

खरीदारों का दावा है कि अधिकांश फ्लैटों के बदले 90 प्रतिशत से अधिक राशि वसूल ली गई, लेकिन निर्माण कार्य अपेक्षित स्तर तक नहीं पहुंचा।

22 टावरों में से केवल 5 ही पूरे

रेरा के समक्ष रखे गए रिकॉर्ड के अनुसार परियोजना में कुल 22 टावर प्रस्तावित थे।

हालांकि अब तक केवल 5 टावरों का निर्माण पूर्ण हुआ है, जबकि शेष टावर विभिन्न चरणों में अधूरे हैं।

रेरा ने यह भी नोट किया कि परियोजना की वास्तविक भौतिक प्रगति और खर्च के आंकड़ों में मेल नहीं है।

खर्च और निर्माण प्रगति में बड़ा अंतर

अथॉरिटी ने विभिन्न दस्तावेजों, शपथपत्रों, त्रैमासिक प्रगति रिपोर्टों (QPR) तथा कंपनी के पूर्व निदेशक द्वारा प्रस्तुत आंकड़ों की तुलना की।

जांच में पाया गया कि परियोजना की कुल लागत सभी दस्तावेजों में लगभग 400 करोड़ रुपये बताई गई।

खरीदारों और ऋण से प्राप्त राशि के आंकड़े अलग-अलग दस्तावेजों में अलग-अलग दर्शाए गए।

भूमि लागत, निर्माण लागत और अन्य खर्चों के आंकड़ों में भी भारी अंतर पाया गया।

लगभग 75 से 77 प्रतिशत लागत खर्च होने का दावा किया गया, जबकि इंजीनियर और आर्किटेक्ट के प्रमाणपत्रों के अनुसार वास्तविक भौतिक प्रगति लगभग 48 से 78 प्रतिशत के बीच दिखाई गई।

रेरा ने कहा कि वित्तीय खर्च और वास्तविक निर्माण प्रगति के बीच यह अंतर गंभीर संदेह उत्पन्न करता है और इसकी स्वतंत्र जांच आवश्यक है।

भूमि लागत पर सवाल

खरीदारों ने परियोजना की भूमि लागत को बढ़ा-चढ़ाकर दिखाने का आरोप लगाया।

रिकॉर्ड में भूमि की लागत लगभग 130 करोड़ रुपये दर्शाई गई, जबकि उस समय की प्रचलित बीडा (BIDA) और डीएलसी दरों के आधार पर यह राशि कम होने का दावा किया गया। रेरा ने इस पहलू को भी जांच योग्य माना है।

बिल्डर ने आरोपों से किया इनकार

प्रमोटर कंपनी ने फोरेंसिक ऑडिट की मांग का विरोध करते हुए कहा कि परियोजना में किसी प्रकार की धनराशि का डायवर्जन नहीं हुआ।

कंपनी ने जवाब पेश करते हुए कहा कि परियोजना में लगभग 302 करोड़ रुपये का खर्च पहले ही किया जा चुका है। निर्माण में देरी के लिए कंपनी ने नोटबंदी, जीएसटी संक्रमण, एनबीएफसी संकट, कोविड-19 महामारी और अन्य आर्थिक परिस्थितियों को जिम्मेदार बताया।

दिवाला प्रक्रिया के बावजूद जांच का अधिकार

मामले में यह महत्वपूर्ण प्रश्न भी उठा कि जब कंपनी के खिलाफ एनसीएलटी में कॉरपोरेट दिवाला समाधान प्रक्रिया (CIRP) चल रही है, तब क्या रेरा फोरेंसिक ऑडिट का आदेश दे सकता है।

रेरा ने अपने आदेश में स्पष्ट किया कि प्रस्तावित ऑडिट का उद्देश्य कंपनी की संपत्तियों की वसूली या जब्ती नहीं, बल्कि परियोजना निधियों के उपयोग, एस्क्रो खाते के अनुपालन, वैधानिक खुलासों की सत्यता और परियोजना से जुड़े वित्तीय रिकॉर्ड की जांच करना है।

इसलिए यह कार्रवाई आईबीसी की धारा 14 के तहत लागू मोरेटोरियम का उल्लंघन नहीं मानी जाएगी।

रेरा ने क्यों माना ऑडिट जरूरी?

अथॉरिटी ने अपने निष्कर्ष में कहा कि परियोजना के वित्तीय रिकॉर्ड में गंभीर विसंगतियां हैं। कंपनी और उसके अधिकारियों द्वारा अलग-अलग समय पर अलग-अलग आंकड़े प्रस्तुत किए गए।

खर्च और वास्तविक निर्माण प्रगति में मेल नहीं है। खरीदारों द्वारा निधियों के दुरुपयोग और अन्य वित्तीय अनियमितताओं के आरोप लगाए गए हैं। उपलब्ध रिकॉर्ड के आधार पर इन प्रश्नों का संतोषजनक उत्तर नहीं मिलता।

अथॉरिटी ने यह भी कहा कि परियोजना की वित्तीय स्थिति को लेकर प्रस्तुत दस्तावेजों में आपसी विरोधाभास हैं। विभिन्न अवसरों पर कंपनी द्वारा अलग-अलग वित्तीय आंकड़े प्रस्तुत किए गए, जिससे परियोजना की वास्तविक स्थिति स्पष्ट नहीं हो पाई। ऐसे में स्वतंत्र फोरेंसिक जांच ही वास्तविक तथ्यों को सामने ला सकती है।

दो माह में पूरी हो जांच

रेरा ने अपने अंतिम आदेश में रजिस्ट्रार को निर्देश दिया है कि एम्पैनल्ड एजेंसी के माध्यम से एवलॉन रॉयल पार्क परियोजना का फोरेंसिक ऑडिट कराया जाए।

ऑडिट परियोजना की शुरुआत से लेकर दिवाला प्रक्रिया शुरू होने तक की अवधि को कवर करेगा।

साथ ही रेजोल्यूशन प्रोफेशनल (RP) को सभी आवश्यक रिकॉर्ड उपलब्ध कराने का निर्देश दिया गया है। जांच रिपोर्ट दो माह के भीतर प्रस्तुत करनी होगी।

यह फैसला उन सैकड़ों परिवारों के लिए महत्वपूर्ण माना जा रहा है, जिनकी जीवनभर की कमाई वर्षों से अधूरी पड़ी इस परियोजना में फंसी हुई है और जो लंबे समय से अपने घर का इंतजार कर रहे हैं।

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