रिहाई का आदेश 15 अप्रैल को ही हो गया था, फिर भी 8 जून तक जेल में रहा किसान; हाईकोर्ट ने कहा- व्यक्तिगत स्वतंत्रता के साथ ऐसा व्यवहार संविधान पर सीधा हमला
जोधपुर। राजस्थान हाईकोर्ट ने व्यक्तिगत स्वतंत्रता और सरकारी अधिकारियों की जवाबदेही को लेकर एक ऐतिहासिक फैसला सुनाते हुए नागौर जिले के एक HIV पीड़ित किसान को 53 दिनों तक अवैध रूप से हिरासत में रखने के मामले में संबंधित तहसीलदार पर 5 लाख रुपये का जुर्माना लगाया है।
साथ ही अदालत ने पीड़ित किसान को 2 लाख रुपये का मुआवजा देने के आदेश भी दिए हैं।
जस्टिस फरजंद अली और जस्टिस सुनील बेनीवाल की विशेष अवकाशकालीन खंडपीठ ने अपने फैसले में कोर्ट आदेश के बावजूद किसान को 53 दिन तक जेल में रखने को बेहद गंभीर लेते हुए कहा कि किसी व्यक्ति को सक्षम अपीलीय प्राधिकारी द्वारा सजा स्थगित किए जाने के बावजूद जेल में रखना संविधान के अनुच्छेद 21 के तहत प्रदत्त जीवन और व्यक्तिगत स्वतंत्रता के अधिकार का गंभीर उल्लंघन है।
हाईकोर्ट ने टिप्पणी की कि राज्य का कोई भी अधिकारी कानून से ऊपर नहीं है और यदि उसकी लापरवाही या हठधर्मिता के कारण किसी नागरिक की स्वतंत्रता का हनन होता है तो उसके लिए व्यक्तिगत जवाबदेही तय की जाएगी।
क्या है पूरा मामला
मामला नागौर जिले की डेह तहसील के नयागांव निवासी किसान से जुड़ा है।
किसान के खिलाफ राजस्थान भू-राजस्व अधिनियम, 1956 की धारा 91 के तहत सरकारी भूमि पर कथित अतिक्रमण का मामला चल रहा था।
डेह के तत्कालीन नायब तहसीलदार ने 5 मार्च 2026 को उन्हें सरकारी भूमि पर अतिक्रमण का दोषी मानते हुए तीन महीने के सिविल कारावास की सजा सुनाई थी।
इस आदेश के खिलाफ किसान ने पहले जिला कलेक्टर के समक्ष अपील की, लेकिन वहां राहत नहीं मिली।
इसके बाद किसान ने अतिरिक्त संभागीय आयुक्त, अजमेर के समक्ष द्वितीय अपील दायर की।
अपील की सुनवाई के दौरान किसान ने विवादित भूमि पर कब्जा छोड़ने और कथित अतिक्रमण हटाने की सहमति जताई।
इन परिस्थितियों को देखते हुए अतिरिक्त संभागीय आयुक्त ने 15 अप्रैल 2026 को सिविल कारावास की सजा पर रोक लगा दी और अगली सुनवाई तक सजा स्थगित कर दी।
इसके साथ ही किसान की रिहाई का रास्ता साफ हो गया था।
आदेश के बावजूद नहीं मिली रिहाई
याचिका के अनुसार, किसान की पत्नी ने कई बार संबंधित अधिकारियों से संपर्क किया और सजा स्थगन आदेश की प्रमाणित प्रति भी उपलब्ध कराई।
इसके बावजूद किसान को रिहा नहीं किया गया और वह जेल में ही बंद रहा।
आखिरकार किसान की पत्नी ने राजस्थान हाईकोर्ट में बंदी प्रत्यक्षीकरण याचिका (हैबियस कॉर्पस) दायर कर अपने पति की रिहाई की मांग की।
सुनवाई के दौरान अदालत के सामने यह तथ्य आया कि सजा स्थगन आदेश 15 अप्रैल को पारित हो चुका था, लेकिन उसके बाद भी किसान को करीब 53 दिनों तक हिरासत में रखा गया।
हाईकोर्ट के हस्तक्षेप के बाद मिली आजादी
मामले की सुनवाई करते हुए राजस्थान हाईकोर्ट ने कहा कि प्रथम दृष्टया बंदी की निरंतर हिरासत कानून के अनुरूप नहीं है।
हाईकोर्ट ने स्पष्ट शब्दों में कहा कि यदि किसी व्यक्ति की हिरासत कानून सम्मत नहीं है तो उसे एक दिन भी जेल में नहीं रखा जा सकता।
इसके बाद अदालत ने तत्काल रिहाई के आदेश दिए और उसी दिन शाम को घमंडनाथ को रिहा किया गया।
HIV पीड़ित किसान और कैंसर मरीज पत्नी की पीड़ा
मामले की सुनवाई के दौरान यह तथ्य भी सामने आया कि याचिकाकर्ता किसान HIV से पीड़ित हैं और उन्हें लगातार चिकित्सकीय उपचार की आवश्यकता है। वहीं उनकी पत्नी कैंसर मरीज हैं।
हाईकोर्ट ने कहा कि अवैध हिरासत का असर केवल व्यक्ति की स्वतंत्रता तक सीमित नहीं रहा, बल्कि इससे दोनों की स्वास्थ्य संबंधी परिस्थितियां भी प्रभावित हुईं। न्यायालय ने टिप्पणी की कि एक बीमार व्यक्ति को रिहाई आदेश के बावजूद जेल में रखना और उसकी कैंसर पीड़ित पत्नी को आवश्यक सहारे से वंचित करना बेहद गंभीर मामला है।
खंडपीठ ने कहा कि यह केवल प्रशासनिक लापरवाही नहीं बल्कि मानवीय संवेदनाओं के प्रति अस्वीकार्य उदासीनता का उदाहरण है।
तहसीलदार की दलील पर कोर्ट ने जताई नाराजगी
सुनवाई के दौरान संबंधित तहसीलदार ने दावा किया कि उन्हें सजा स्थगन आदेश की जानकारी नहीं थी। हालांकि बाद में उन्होंने स्वयं स्वीकार किया कि कम से कम 1 जून 2026 तक उन्हें इस आदेश की जानकारी मिल चुकी थी।
हाईकोर्ट ने कहा कि यदि अधिकारी को 1 जून को आदेश की जानकारी मिल गई थी तो उसी समय बंदी को रिहा किया जाना चाहिए था।
इसके बावजूद 8 जून तक रिहाई नहीं होना गंभीर लापरवाही और कर्तव्य की अवहेलना को दर्शाता है।
अदालत ने यह भी कहा कि सामान्य प्रशासनिक प्रक्रिया में अपीलीय आदेश संबंधित अधिकारी तक पहुंचता है और यह मानना कठिन है कि सजा स्थगन जैसा महत्वपूर्ण आदेश पूरी तरह उसकी जानकारी से बाहर रहा हो।
व्यक्तिगत स्वतंत्रता सबसे बड़ा संवैधानिक अधिकार
फैसले में हाईकोर्ट ने कहा कि व्यक्तिगत स्वतंत्रता संविधान की मूल भावना का केंद्र है। किसी व्यक्ति को कानून के अधिकार के बिना एक भी दिन हिरासत में रखना अस्वीकार्य है।
हाईकोर्ट ने सुप्रीम कोर्ट के कई महत्वपूर्ण फैसलों का हवाला देते हुए कहा कि अवैध हिरासत के मामलों में केवल रिहाई पर्याप्त नहीं होती। यदि किसी नागरिक के मौलिक अधिकारों का उल्लंघन हुआ है तो उसे उचित प्रतिकर और जिम्मेदार अधिकारियों की जवाबदेही सुनिश्चित करना भी न्यायालय का कर्तव्य है।
खंडपीठ ने कहा कि याचिकाकर्ता किसान की प्रारंभिक हिरासत भले ही वैध थी, लेकिन 15 अप्रैल 2026 को सजा स्थगित होने के बाद उनकी हिरासत का कानूनी आधार समाप्त हो गया था। इसके बाद जेल में बिताया गया प्रत्येक दिन अवैध हिरासत की श्रेणी में आता है।
कोर्ट ने लगाया जुर्माना और दिया मुआवजा
मामले की गंभीरता को देखते हुए हाईकोर्ट ने संबंधित तहसीलदार पर 5 लाख रुपये का जुर्माना लगाया। अदालत ने आदेश दिया कि इस राशि की वसूली संबंधित अधिकारी से की जाए।
इसके अलावा पीड़ित किसान को 2 लाख रुपये का मुआवजा देने के आदेश भी दिए गए।
हाईकोर्ट ने कहा कि यह राशि उनके मौलिक अधिकारों के उल्लंघन और अवैध हिरासत के कारण हुई क्षति के लिए सार्वजनिक कानून के तहत प्रदान की जा रही है।
Reportable Judgement
HIGH COURT OF JUDICATURE FOR RAJASTHAN AT JODHPUR
D.B. Habeas Corpus Petition No. 282/2026
HON’BLE MR. JUSTICE FARJAND ALI (VACATION JUDGE)
HON’BLE MR. JUSTICE SUNIL BENIWAL (VACATION JUDGE)
Date of Pronouncement : 12/06/2026
