लेखक : प्रतीक कासलीवाल एवं वर्णाली पुरोहित
आमतौर पर माना जाता है कि न्याय व्यवस्था के औपचारिक गलियारों में भावनाओं के लिए बहुत कम स्थान होता है। लेकिन कभी-कभी ऐसी घटनाएं सामने आती हैं जो हमें यह समझाती हैं कि कानून केवल धाराओं और न्यायिक मिसालों का संग्रह नहीं है, बल्कि यह मानवीय संवेदनाओं और सामाजिक सच्चाइयों का भी प्रतिबिंब है।
कला के विभिन्न रूप—चाहे वह गीत हो, कविता हो या साहित्य—सिर्फ संस्कृति की पहचान नहीं होते, बल्कि कई बार वे न्याय और सामाजिक परिवर्तन के माध्यम भी बन जाते हैं।
इसका एक महत्वपूर्ण उदाहरण 3 जुलाई 2025 को केन्या के थिका उच्च न्यायालय के ऐतिहासिक फैसले Mbure v. Republic [2025] KEHC 9535 (KLR) में देखने को मिला।
इस मामले में बच्चों को सिखाया जाने वाला एक साधारण शैक्षणिक गीत एक गंभीर अपराध का खुलासा करने का माध्यम बन गया। यह गीत बच्चों को अपने शरीर की सुरक्षा और व्यक्तिगत सीमाओं के प्रति जागरूक करने के लिए बनाया गया था।
यही गीत एक मासूम बच्ची की आवाज़ से निकलकर अदालत तक पहुंचा और न्यायालय ने इसे साक्ष्य के रूप में स्वीकार करते हुए अपराधी को दोषी ठहराया तथा उसे आजीवन कारावास की सजा सुनाई।
यह फैसला केवल एक अपराधी को दंडित करने का मामला नहीं था।
यह इस बात का प्रमाण भी था कि जब कला न्याय की प्रक्रिया का हिस्सा बनती है, तब न्याय केवल कानूनी प्रक्रिया नहीं रह जाता, बल्कि समाज की नैतिक चेतना का दर्पण बन जाता है।
केन्या का वह गीत जिसने न्याय को आवाज़ दी
3 जुलाई 2025 को केन्या के थिका उच्च न्यायालय ने एक ऐसा फैसला सुनाया जिसने यह दिखाया कि शिक्षा और कला की मदद से भी न्याय तक पहुंचा जा सकता है।
इस मामले में एक चार वर्षीय बच्ची के साथ उसके पिता ने यौन शोषण किया था। लेकिन इस जघन्य अपराध का खुलासा किसी गवाह या वैज्ञानिक साक्ष्य से नहीं, बल्कि एक गीत के माध्यम से हुआ।
केन्या की शिक्षा व्यवस्था में बच्चों को शरीर की सुरक्षा के बारे में जागरूक करने के लिए एक विशेष गीत सिखाया जाता है।
इस गीत के माध्यम से बच्चों को बताया जाता है कि उनके शरीर के कौन से अंग निजी हैं और यदि कोई व्यक्ति उन्हें अनुचित तरीके से छुए तो उन्हें क्या करना चाहिए।
गीत के शब्द इस प्रकार थे—
“ये मेरे निजी अंग हैं। कोई इन्हें नहीं देख सकता। कोई इन्हें नहीं छू सकता। यदि कोई मेरे निजी अंगों को छूता है, तो मैं अपनी शिक्षिका को बताऊंगी। मैं अपने पिता को बताऊंगी। मैं अपनी माता को बताऊंगी।”
जब इस बच्ची ने अपनी शिक्षिका के सामने यह गीत गाया और बताया कि उसके पिता ने उसके साथ अनुचित व्यवहार किया है, तब मामले की जांच शुरू हुई।
अंततः पूरी न्यायिक प्रक्रिया के बाद आरोपी को दोषी ठहराकर कठोर सजा दी गई।
केन्या उच्च न्यायालय का यह फैसला हमें याद दिलाता है कि कानून, शिक्षा और कला का मेल केवल जागरूकता फैलाने तक सीमित नहीं है।
यह अपराधों के खुलासे, दोषसिद्धि और न्याय दिलाने में भी महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकता है। यह बात केवल केन्या ही नहीं, बल्कि पूरी दुनिया पर लागू होती है।
भारतीय न्यायपालिका में साहित्य की गरिमामय उपस्थिति
भारतीय न्यायालयों में साहित्य और कला के संदर्भों का उपयोग कोई नई बात नहीं है।
हमारे न्यायालयों ने समय-समय पर फ़ैज़ अहमद फ़ैज़ की ग़ज़लों, शेक्सपियर के नाटकों, बॉब डिलन के गीतों और संस्कृत श्लोकों का उल्लेख अपने फैसलों में किया है।
इससे न केवल न्यायाधीशों की विद्वता दिखाई देती है, बल्कि न्याय को अधिक मानवीय और प्रभावशाली स्वरूप भी मिलता है।
गोपाल दास बनाम भारत संघ
गोपाल दास बनाम भारत संघ एवं अन्य (2011) 4 SCC 300 इस संदर्भ में एक महत्वपूर्ण मामला है।
गोपाल दास एक भारतीय नागरिक थे, जो 1986 से पाकिस्तान की लाहौर सेंट्रल जेल में बंद थे और लगभग 27 वर्ष की सजा काट चुके थे।
उनके भाई ने संविधान के अनुच्छेद 32 के तहत सुप्रीम कोर्ट में याचिका दायर कर भारत सरकार को उनकी रिहाई और भारत वापसी सुनिश्चित करने के निर्देश देने की मांग की।
भारत सरकार ने अदालत को बताया कि वह लगातार राजनयिक माध्यमों से पाकिस्तान में बंद भारतीय नागरिकों के हितों की रक्षा के प्रयास कर रही है।
इस फैसले की शुरुआत फ़ैज़ अहमद फ़ैज़ की प्रसिद्ध पंक्तियों से हुई—
“क़फ़स उदास है यारों, सबा से कुछ तो कहो,
कहीं तो बहर-ए-ख़ुदा आज ज़िक्र-ए-यार चले।”
ये पंक्तियां लंबे और कष्टदायक कारावास की पीड़ा को व्यक्त करती हैं। यह केवल गोपाल दास की स्थिति ही नहीं, बल्कि उन सभी कैदियों की वेदना को सामने लाती हैं जो वर्षों से न्याय की प्रतीक्षा कर रहे हैं।
सुप्रीम कोर्ट ने माना कि गोपाल दास की सजा पाकिस्तान की अदालत ने दी थी और इसलिए उस पर कानूनी अधिकार पाकिस्तान का था। फिर भी भारत की नैतिक और राजनयिक जिम्मेदारी बनी हुई थी।
अदालत ने शेक्सपियर के The Merchant of Venice की प्रसिद्ध पंक्तियों का भी उल्लेख किया—
“The quality of mercy is not strain’d;
It droppeth as the gentle rain from heaven upon the place beneath.
It is twice blest: It blesseth him that gives and him that takes.”
इन पंक्तियों के माध्यम से अदालत ने बताया कि न्याय का एक महत्वपूर्ण तत्व दया भी है। अदालत ने यह संदेश दिया कि न्याय केवल किया ही नहीं जाना चाहिए, बल्कि लोगों को उसका अनुभव भी होना चाहिए।
अनूप एम.एस. बनाम केरल राज्य
अनूप एम.एस. बनाम केरल राज्य एवं अन्य (2017) के मामले में न्यायालय ने अपने फैसले की शुरुआत शेक्सपियर के प्रसिद्ध नाटक Hamlet से प्रेरित इस पंक्ति से की—
“To drink or not to drink. That is the Hamletian dilemma of Anoop, the Appellant.”
यह पंक्ति बताती है कि मामला केवल कानून का नहीं था, बल्कि व्यक्तिगत स्वतंत्रता, अ-हस्तक्षेपकारी राज्य और कल्याणकारी राज्य जैसी अवधारणाओं से भी जुड़ा हुआ था।
याचिकाकर्ता ने केरल सरकार की 2014-15 की आबकारी नीति को चुनौती दी थी।
इस नीति के कारण कई बार और होटल बंद कर दिए गए थे, जिससे लोगों को केवल सरकारी दुकानों से शराब खरीदनी पड़ती थी।
याचिकाकर्ता का कहना था कि यह नीति वैज्ञानिक अध्ययन पर आधारित नहीं है और इससे उनके निजी चयन के अधिकार का उल्लंघन होता है, जो संविधान के अनुच्छेद 21 के तहत संरक्षित है।
हालांकि अदालत ने याचिका खारिज कर दी और कहा कि नीति निर्माण सरकार का विषय है।
अदालत ने यह भी स्पष्ट किया कि गोपनीयता का अधिकार पूर्ण अधिकार नहीं है और उस पर उचित प्रतिबंध लगाए जा सकते हैं।
फैसले के अंत में अदालत ने बॉब डिलन के प्रसिद्ध गीत The Times They Are A-Changin’ की पंक्तियों का उल्लेख किया—
“And don’t speak too soon,
For the wheel’s still in spin…
Cause the times they are a-changing…”
अदालत ने इन पंक्तियों के माध्यम से यह स्वीकार किया कि समाज और उसके मूल्य समय के साथ बदलते रहते हैं।
इसलिए वर्तमान कानून हमेशा भविष्य के सामाजिक या नैतिक मानकों को पूरी तरह प्रतिबिंबित नहीं कर सकता।
अरुणा रामचंद्र शानबाग मामला
अरुणा रामचंद्र शानबाग बनाम भारत संघ एवं अन्य (AIR 2011 SC 1290) भारत में इच्छामृत्यु के विषय पर एक ऐतिहासिक फैसला है।
इस मामले में सुप्रीम कोर्ट ने स्पष्ट किया कि संविधान के अनुच्छेद 21 में प्रदत्त जीवन के अधिकार में “मरने का अधिकार” शामिल नहीं है। अदालत ने सक्रिय इच्छामृत्यु (Active Euthanasia) को अवैध माना, जबकि कुछ शर्तों के साथ निष्क्रिय इच्छामृत्यु (Passive Euthanasia) को स्वीकार किया।
मामले के तथ्य अत्यंत दुखद थे।
27 नवम्बर 1973 को मुंबई के K.E.M. अस्पताल में कार्यरत एक सफाईकर्मी ने अरुणा शानबाग पर यौन हमला किया। इस हमले के कारण उनका मस्तिष्क गंभीर रूप से क्षतिग्रस्त हो गया और वे स्थायी वनस्पति अवस्था (Permanent Vegetative State) में चली गईं।
वर्ष 2009 में लेखिका पिंकी विरानी ने सुप्रीम कोर्ट में याचिका दायर कर अरुणा को इच्छामृत्यु की अनुमति देने का अनुरोध किया। दूसरी ओर अस्पताल के डॉक्टरों और नर्सों ने इसका विरोध किया और कहा कि वे वर्षों से उनकी देखभाल कर रहे हैं तथा आगे भी करते रहेंगे।
अदालत के सामने मुख्य प्रश्न यह था कि क्या किसी व्यक्ति को इच्छामृत्यु का अधिकार दिया जा सकता है, और यदि हां, तो उसकी प्रक्रिया और सीमाएं क्या होंगी।
अरुणा रामचंद्र शानबाग की पीड़ा को व्यक्त करने के लिए फैसले में मिर्ज़ा ग़ालिब की पंक्तियां उद्धृत करते हुए कहा गया है—
“मरते हैं आरज़ू में मरने की, मौत आती है पर नहीं आती।”
ये पंक्तियां अरुणा की उस अवस्था का हृदयविदारक चित्रण करती हैं, जहां जीवन और मृत्यु के बीच उसकी स्थिति निरंतर झूलती रही, मानो मृत्यु निकट थी, परंतु आकर भी नहीं आती थी।
ऐसे साहित्यिक उद्धरणों ने अदालतों के फैसलों को मानवीय संवेदना से स्पर्श किया और यह स्पष्ट किया कि जीवन और मृत्यु जैसे प्रश्न केवल कानूनी या चिकित्सकीय परिभाषाओं से नहीं समझे जा सकते, बल्कि उन्हें मानवीय पीड़ा और भावनाओं के दर्पण से भी देखना आवश्यक है।
न्याय को मानवीय बनाने में कला की भूमिका
अदालतों में कला के प्रयोग का महत्व केवल अलंकारिक नहीं है। यह एक गहरी आवश्यकता को पूरा करता है—न्याय को मानवीय संदर्भ प्रदान करने की।
जब न्यायाधीश अपने फैसलों में कविता, साहित्य या संगीत का संदर्भ देते हैं, तो वे वस्तुतः यह कह रहे होते हैं कि न्याय केवल तकनीकी प्रक्रिया नहीं है, बल्कि मानवीय अनुभव और सामाजिक सत्य का प्रतिबिंब है।
केन्या की उस छोटी बच्ची के गीत से लेकर भारतीय अदालतों में फ़ैज़ की ग़ज़लों तक, एक ही संदेश स्पष्ट है—न्याय सिर्फ नियमों का पालन नहीं है, बल्कि मानवीय गरिमा की रक्षा का नाम है।
जब कला न्याय व्यवस्था से मिलती है, तो वह कानून की कठोरता को मानवीय संवेदना से भर देती है। यह हमें याद दिलाती है कि न्यायालय केवल निर्णय देने वाली संस्था नहीं है, बल्कि समाज की नैतिक आकांक्षाओं की संवाहक भी है।
कला हमारी सामूहिक चेतना की आवाज़ होती है। यह उन भावनाओं और सत्यों को व्यक्त करती है जिन्हें शुष्क कानूनी भाषा में व्यक्त करना कठिन होता है।
जब न्यायालय इसका प्रयोग करते हैं, तो वे न्याय को केवल न्यायसंगत ही नहीं बनाते, बल्कि उसे अनुभव किए जाने योग्य भी बनाते हैं।
आखिरकार, सच्चा न्याय वही है जो न केवल दिया जाए, बल्कि महसूस भी किया जाए। और इस महसूस करने में कला की भूमिका अपरिहार्य है।
कला न्याय में वह मानवीय स्पर्श लाती है, जो कानूनी प्रक्रिया को जीवित और प्रासंगिक बनाता है तथा हमें इस सत्य से भी अवगत कराती है कि बिना संवेदना के न्याय अधूरा है।