नई दिल्ली: वकालत के शुरुआती सालों में आर्थिक तंगी और मुश्किलों के कारण वकालत छोड़ रहे युवा वकीलों को लेकर सुप्रीम कोर्ट ने चिंता जताते हुए एक अहम सुझाव दिया है।
कोर्ट ने कहा है कि यदि समय रहते इन्हें कोई मदद नहीं मिली, तो आने वाले समय में कानूनी पेशे में प्रतिभाशाली वकीलों की कमी हो सकती है।
सुप्रीम कोर्ट ने माना कि वकालत के पेशे में आने वाले कई युवा शुरुआती वर्षों में आर्थिक मुश्किलों के कारण पेशा छोड़ने को मजबूर हो रहे हैं। इन हालातों पर चिंता जताते हुए सुप्रीम कोर्ट ने कहा है कि-
यदि समय रहते जरूरी कदम नहीं उठाए गए तो कानूनी पेशे में “ब्रेन ड्रेन” की समस्या पैदा हो सकती है। सुप्रीम कोर्ट ने सुझाव दिया कि युवा वकीलों की मदद के लिए एक विशेष “यंग लॉयर्स प्रोफेशनल असिस्टेंस फंड” बनाया जाना चाहिए, जिससे उन्हें करियर के शुरुआती वर्षों में आर्थिक सहारा मिल सके।
सुप्रीम कोर्ट ने यह भी माना कि वकालत की शुरुआत करने वाले ज्यादातर युवा वकीलों के पास न तो अपना ऑफिस होता है, न लाइब्रेरी, न ही तय इनकम का कोई जरिया। ऐसे में उन्हें कई साल तक आर्थिक परेशानियों से जूझना पड़ता है, जो उन्हें इस पेशे से बाहर जाने के लिए मजबूर कर देता है।
सुप्रीम कोर्ट ने महिला वकीलों की सुविधाओं का मुद्दा भी उठाया। कोर्ट ने कहा कि जब महिला वकीलों को दिन का बड़ा हिस्सा कोर्ट परिसर में बिताना पड़ता है, तो उनके लिए सुरक्षा, गोपनीयता, आराम और कामकाज से जुड़ी बुनियादी सुविधाएं उपलब्ध होना बेहद जरूरी है।
चीफ जस्टिस सूर्यकांत और जस्टिस वी. मोहन की बेंच ने इस मुद्दे पर केंद्र सरकार, सभी राज्यों, केंद्र शासित प्रदेशों और अन्य संबंधित पक्षों को नोटिस जारी कर जवाब मांगा है। मामला अब 17 जुलाई को फिर सुना जाएगा।
सुप्रीम कोर्ट ने क्यों दिया सुझाव?
यह मामला महिला वकीलों के एक समूह की ओर से दायर याचिका से जुड़ा है।
याचिका में कहा गया कि वकालत के शुरुआती वर्षों में युवा वकीलों को कई आर्थिक चुनौतियों का सामना करना पड़ता है। खासकर उन युवाओं के लिए, जिनके परिवार में पहले कभी कोई वकील नहीं रहा और जिन्हें अपना पूरा करियर शून्य से शुरू करना पड़ता है, क्योंकि उन्हें परिवार से पेशेवर आधार या तैयार व्यवस्था नहीं मिलती।
याचिका में महिला वकीलों के सामने आने वाली चुनौतियों का भी जिक्र किया गया। इसमें कहा गया कि कोर्ट परिसरों में ऐसी सुविधाएं और व्यवस्था होनी चाहिए, जिससे महिलाओं के लिए इस पेशे में लंबे समय तक काम करना आसान हो सके।
सुनवाई के दौरान सुप्रीम कोर्ट ने माना कि महिला वकीलों से जुड़े मुद्दे महत्वपूर्ण हैं, लेकिन युवा वकीलों की आर्थिक चुनौतियों का सवाल केवल महिलाओं तक सीमित नहीं है। यह पूरे कानूनी पेशे से जुड़ा मुद्दा है और इस पर गंभीरता से विचार करने की जरूरत है।
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युवा वकीलों के सामने क्या मुश्किलें हैं?
सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि किसी युवा वकील के लिए वकालत का शुरुआती दौर सबसे चुनौतीपूर्ण होता है।
कोर्ट ने कहा कि पहली बार वकालत शुरू करने वाला युवा अपने साथ न तो तैयार ऑफिस लेकर आता है, न लाइब्रेरी, न स्थायी क्लाइंट और न ही आय का कोई निश्चित स्रोत। ऐसे में उसे कई सालों तक अपने सीनियर वकील से मिलने वाली सीमित स्टाइपेंड या बार एसोसिएशन की ओर से मिलने वाली मामूली आर्थिक सहायता पर निर्भर रहना पड़ता है।
कोर्ट ने कहा कि कई जगहों पर मिलने वाली यह राशि इतनी कम होती है कि उससे बुनियादी खर्च पूरे करना भी मुश्किल हो जाता है।
इसके अलावा शुरुआती वर्षों में नए वकीलों को नियमित काम नहीं मिल पाता और कमाई भी बहुत सीमित रहती है। इसी कारण उन्हें आर्थिक परेशानियों का सामना करना पड़ता है।
सुप्रीम कोर्ट ने ‘ब्रेन ड्रेन’ की चिंता जताई
सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि यही वह दौर है जब कई प्रतिभाशाली और मेहनती युवा वकील वकालत छोड़कर दूसरे पेशों की ओर चले जाते हैं।
सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि युवा वकीलों का पेशा छोड़ना केवल व्यक्तिगत समस्या नहीं है। यदि बड़ी संख्या में प्रतिभाशाली युवा आर्थिक कारणों से वकालत छोड़ते हैं, तो इसका असर पूरे कानूनी पेशे पर पड़ता है।
कोर्ट ने कहा कि ऐसी स्थिति कानूनी क्षेत्र में “ब्रेन ड्रेन” जैसी समस्या पैदा कर सकती है। यानी योग्य और प्रतिभाशाली लोग इस पेशे में टिक नहीं पाएंगे और बार की गुणवत्ता प्रभावित हो सकती है। कोर्ट ने कहा कि अगर यह स्थिति जारी रही, तो कई प्रतिभाशाली युवा वकील वकालत छोड़ सकते हैं। इसका असर भविष्य में पूरे कानूनी पेशे की गुणवत्ता पर पड़ सकता है।
सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि पहली पीढ़ी के वकीलों और सीमित संसाधनों वाले परिवारों से आने वाले युवाओं के लिए यह चुनौती और भी बड़ी होती है। ऐसे युवा अक्सर प्रतिभाशाली होते हैं, लेकिन सीमित संसाधनों के कारण शुरुआती संघर्ष झेलते हैं। यदि उन्हें सही सहयोग नहीं मिलता, तो उनके लिए इस पेशे में बने रहना मुश्किल हो जाता है।
फंड बनाने का सुझाव, हाईकोर्ट या केंद्र के तहत हो व्यवस्था
इसी चिंता को देखते हुए सुप्रीम कोर्ट ने एक अहम सुझाव दिया।
कोर्ट ने कहा कि युवा वकीलों के लिए “यंग लॉयर्स प्रोफेशनल असिस्टेंस फंड” बनाया जाना चाहिए। यह फंड संबंधित हाईकोर्ट के नियंत्रण में हो सकता है या फिर केंद्र सरकार एक स्वतंत्र संस्था बनाकर इसे चला सकती है।
कोर्ट ने कहा कि ऐसी व्यवस्था बनने से दानदाताओं और सहयोग देने वाले लोगों का भरोसा भी बढ़ेगा और अगर फंड की व्यवस्था पारदर्शी और भरोसेमंद होगी, तो लोग इसमें योगदान देने के लिए आगे आएंगे।
पैसा कहां से आएगा? कोर्ट ने दिए विकल्प
सुप्रीम कोर्ट ने फंड के लिए पैसों की व्यवस्था को लेकर भी सुझाव दिए।
कोर्ट ने सुझाव दिया कि-
- अनुभवी और सफल वकीलों को इस फंड में योगदान देने के लिए प्रोत्साहित किया जा सकता है।
- केंद्र और राज्य सरकारें भी कोर्टों में जमा होने वाली कोर्ट फीस का एक हिस्सा इस फंड में दे सकती हैं।
- विभिन्न मामलों में कोर्टों द्वारा लगाए जाने वाले खर्च या कॉस्ट का एक हिस्सा भी इस फंड में डाला जा सकता है।
कोर्ट ने यह भी कहा कि योगदान को बढ़ावा देने के लिए टैक्स छूट, राष्ट्रीय सम्मान जैसे प्रोत्साहन दिए जा सकते हैं।
युवा वकीलों को कैसे मिलेगा फायदा?
सुप्रीम कोर्ट ने साफ किया कि इस फंड का इस्तेमाल सीधे युवा वकीलों की मदद के लिए होना चाहिए।
कोर्ट ने कहा कि इस फंड का उपयोग खासतौर पर पहली पीढ़ी के वकीलों और आर्थिक रूप से कमजोर पृष्ठभूमि से आने वाले युवा वकीलों की मदद के लिए किया जाना चाहिए।
कोर्ट के मुताबिक शुरुआती सालों में युवा वकीलों को मासिक स्टाइपेंड दिया जाए। खास ध्यान पहली पीढ़ी के वकीलों और आर्थिक रूप से कमजोर वर्ग के लोगों पर हो और उन्हें अनुभवी वकीलों के साथ जोड़कर काम का मौका दिया जाए।
कोर्ट ने कहा कि यह स्टाइपेंड इतना होना चाहिए कि कम से कम उनका बुनियादी खर्च चल सके।
7 साल तक मदद, फिर धीरे-धीरे खत्म हो सहायता
फंड का पैसा कैसे इस्तेमाल होगा?, इस पर सुप्रीम कोर्ट ने एक संतुलित मॉडल का सुझाव भी दिया।
कोर्ट ने कहा कि ऐसे वकीलों को करियर के शुरुआती वर्षों में हर महीने एक उचित स्टाइपेंड या मानदेय दिया जा सकता है ताकि वे अपनी बुनियादी जरूरतें पूरी कर सकें।
कोर्ट ने सुझाव दिया कि यह सहायता कम से कम पहले तीन वर्षों तक मिलनी चाहिए ताकि युवा वकील बिना आर्थिक दबाव के अपने पेशे पर ध्यान दे सकें। इसके बाद यह सहायता धीरे-धीरे कम की जा सकती है और 7 साल के बाद यह पूरी तरह बंद की जा सकती है।
सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि शुरुआती कुछ वर्षों में मिलने वाली मदद के बाद युवा वकील अपने पैरों पर खड़े हो सकेंगे और अपने पेशे में एक मजबूत आधार बना चुके होंगे।
सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि इस मदद का मकसद किसी को लंबे समय तक आर्थिक सहायता देना नहीं है, बल्कि करियर के शुरुआती मुश्किल दौर में उसका साथ देना है।
फंड को खुद चलने वाला बनाने की भी योजना
कोर्ट ने एक और अहम सुझाव दिया। कोर्ट ने कहा कि जिन वकीलों को इस फंड से फायदा मिले, वे आगे चलकर इसमें योगदान वापस करें।
कोर्ट ने सुझाव दिया कि जिन वकीलों को इस फंड से मदद मिले, वे बाद में अपने पेशे में सफल होने पर धीरे-धीरे इस फंड में योगदान दें। कोर्ट ने कहा कि करियर सेट होने के बाद ऐसे वकील किस्तों में पैसा वापस दें सकते हैं।
इससे फंड लगातार चलता रहेगा और इससे भविष्य में भी नई पीढ़ी और जरूरतमंद युवा वकीलों को सहायता मिलती रहेगी। कोर्ट ने इसे “सेल्फ सस्टेनिंग मॉडल” बताया।
महिला वकीलों की समस्याओं पर भी फोकस
सुनवाई के दौरान सुप्रीम कोर्ट ने महिला वकीलों से जुड़े मुद्दों पर भी गंभीर चिंता जताई।
कोर्ट ने कहा कि जब महिला वकीलों को दिन का बड़ा हिस्सा कोर्ट परिसर में बिताना पड़ता है, तब उनके लिए बुनियादी सुविधाओं की उपलब्धता बेहद जरूरी हो जाती है। सुरक्षा, गोपनीयता, आराम और पेशेवर कामकाज के लिए जरूरी सुविधाएं हर कोर्ट परिसर में उपलब्ध होनी चाहिए।
कोर्ट ने कहा कि यह सिर्फ सुविधा का मामला नहीं, बल्कि पेशे में महिलाओं की भागीदारी और टिकाव से जुड़ा मुद्दा है।
कोर्ट ने सुझाव दिया कि महिलाओं की भागीदारी बढ़ाने और उन्हें लंबे समय तक इस पेशे में बनाए रखने के लिए ऐसे कदम जरूरी हैं। कोर्ट ने माना कि कानूनी पेशे में बेहतर सुविधाएं और अनुकूल माहौल बनाने के लिए अभी काफी काम किया जाना बाकी है।
सुप्रीम कोर्ट का आदेश
सुनवाई के बाद सुप्रीम कोर्ट ने केंद्र सरकार, सभी राज्यों, केंद्र शासित प्रदेशों और अन्य संबंधित पक्षों को नोटिस जारी कर इस पर जवाब मांगा है और सभी से इस विषय पर अपने सुझाव और जवाब देने को कहा है।
सुप्रीम कोर्ट ने स्पष्ट किया कि ये अंतिम निष्कर्ष नहीं हैं। फिलहाल ये सुझाव इसलिए दिए गए हैं ताकि सभी पक्ष इस विषय पर अपनी राय रख सकें। कोर्ट ने अटॉर्नी जनरल, राज्यों के एडवोकेट जनरल और केंद्र शासित प्रदेशों के स्थायी वकीलों से भी इस मामले में सहयोग देने को कहा है।
मामले की अगली सुनवाई 17 जुलाई को होगी।
फैसले का असर क्या होगा?
सुप्रीम कोर्ट ने अभी कोई अंतिम दिशा-निर्देश जारी नहीं किए हैं, लेकिन इस मामले ने पहली बार राष्ट्रीय स्तर पर युवा वकीलों की आर्थिक स्थिति पर गंभीर चर्चा शुरू कर दी है।
सुप्रीम कोर्ट की इस सुझाव का सीधा असर लाखों युवा वकीलों पर पड़ सकता है। अगर कोर्ट के सुझावों के आधार पर कोई ठोस व्यवस्था बनती है, तो वकालत पेशे में नए लोगों के लिए रास्ता आसान होगा, आर्थिक दबाव कम होगा और ज्यादा काबिल लोग इस पेशे में टिक पाएंगे।
यदि कोर्ट के सुझावों के आधार पर कोई व्यवस्था बनती है, तो पहली पीढ़ी के हजारों युवा वकीलों को शुरुआती वर्षों में आर्थिक सहारा मिल सकता है। साथ ही महिला वकीलों के लिए बेहतर सुविधाओं और सुरक्षित कार्य वातावरण को लेकर भी नए कदम उठाए जा सकते हैं।
सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि इससे भविष्य में न्याय व्यवस्था को बेहतर और मजबूत बनाने में मदद मिल सकती है।
