नई दिल्ली: हाईकोर्ट में जजों की नियुक्ति को लेकर सुप्रीम कोर्ट ने एक अहम टिप्पणी की है। कोर्ट ने कहा है कि केवल वरिष्ठता के आधार पर किसी न्यायिक अधिकारी को हाईकोर्ट का जज बनाए जाने का अधिकार नहीं मिल जाता।
साथ ही सुप्रीम कोर्ट ने स्पष्ट किया कि जजों की नियुक्ति और सिफारिश से जुड़े फैसले कोलेजियम सिस्टम के दायरे में आते हैं और न्यायिक आदेश के जरिए कोलेजियम को किसी विशेष व्यक्ति के नाम पर विचार करने के लिए बाध्य नहीं किया जा सकता।
सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि कोई भी न्यायिक अधिकारी केवल कोर्ट में याचिका दाखिल करके हाईकोर्ट या सुप्रीम कोर्ट में जज बनने का दावा नहीं कर सकता। जजों की नियुक्ति का फैसला कोलेजियम की प्रक्रिया के तहत होता है।
जस्टिस बी.वी. नागरत्ना और जस्टिस जॉयमल्या बागची की बेंच ने यह टिप्पणी हिमाचल प्रदेश के एक न्यायिक अधिकारी की याचिका पर सुनवाई के दौरान की।
हिमाचल प्रदेश के न्यायिक अधिकारी ने लगाई थी याचिका
यह मामला हिमाचल प्रदेश के न्यायिक अधिकारी अरविंद मल्होत्रा से जुड़ा था, जो वर्तमान में धर्मशाला में फैमिली कोर्ट के प्रिंसिपल जज के पद पर कार्यरत हैं।
उन्होंने सुप्रीम कोर्ट में याचिका दाखिल कर शिकायत की थी कि उनसे जूनियर न्यायिक अधिकारियों के नाम हाईकोर्ट में जज नियुक्ति के लिए भेज दिए गए, जबकि उनके नाम पर विचार नहीं किया गया।
याचिकाकर्ता का कहना था कि 2024 में सुप्रीम कोर्ट ने उनके नाम पर दोबारा विचार करने को कहा था। इसके बाद उन्हें बातचीत के लिए बुलाया गया और जरूरी दस्तावेज भी जमा कराए गए। लेकिन बाद में जब हाईकोर्ट में नियुक्ति के लिए नाम भेजे गए, तो उनका नाम शामिल नहीं किया गया।
इसी के बाद उन्होंने सुप्रीम कोर्ट में याचिका दाखिल कर अपने नाम पर हाईकोर्ट जज की नियुक्ति के लिए विचार करने की मांग की।
‘केवल वरिष्ठता से नहीं बनता नियुक्ति का अधिकार’
सुप्रीम कोर्ट ने याचिकाकर्ता की दलीलों से सहमति नहीं जताई।
सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि रिकॉर्ड में ऐसा कोई दस्तावेज नहीं है, जिससे यह पता चले कि याचिकाकर्ता के नाम को औपचारिक रूप से खारिज कर दिया गया था।
कोर्ट ने यह भी स्पष्ट किया कि केवल इस आधार पर कि कोई अधिकारी वरिष्ठ है, उसे हाईकोर्ट में नियुक्ति का कानूनी अधिकार नहीं मिल जाता।
जस्टिस नागरत्ना ने कहा कि वरिष्ठता नियुक्ति प्रक्रिया का एक पहलू हो सकती है, लेकिन यह अपने आप में नियुक्ति की गारंटी नहीं है।
सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि हाईकोर्ट के जजों का चयन केवल वरिष्ठता के आधार पर नहीं होता। इसके लिए कई अन्य पहलुओं को भी देखा जाता है।
‘कोलेजियम को निर्देश नहीं दे सकती कोर्ट’
सुनवाई के दौरान सुप्रीम कोर्ट ने नियुक्ति प्रक्रिया से जुड़े एक महत्वपूर्ण सिद्धांत को भी दोहराया।
सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि कोई भी बेंच यह आदेश नहीं दे सकती कि कोलेजियम किसी खास व्यक्ति के नाम पर विचार करे या उसे जज नियुक्त करने की सिफारिश करे।
कोर्ट ने कहा कि जजों की नियुक्ति से जुड़े फैसले तय प्रक्रिया के तहत कोलेजियम ही करता है। जजों की नियुक्ति के लिए एक संस्थागत व्यवस्था बनाई गई है और फैसले उसी प्रक्रिया के तहत लिए जाते हैं।
कोर्ट के अनुसार यदि न्यायिक आदेशों के जरिए कोलेजियम के निर्णयों को प्रभावित करने की कोशिश की जाएगी, तो पूरी प्रक्रिया की स्वतंत्रता प्रभावित हो सकती है। इसी वजह से ऐसे मामलों में न्यायिक हस्तक्षेप की सीमाएं तय हैं।
सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि किसी अधिकारी की उम्मीदवारी पर विचार करने या न करने का फैसला अंततः कोलेजियम के अधिकार क्षेत्र का विषय है।
कोलेजियम की गोपनीय प्रक्रिया पर भी टिप्पणी
सुप्रीम कोर्ट ने कोलेजियम की कार्यप्रणाली और उसकी गोपनीयता पर भी अपनी राय रखी।
सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि कोलेजियम की बैठकों में होने वाला विचार-विमर्श गोपनीय प्रक्रिया का हिस्सा होता है। कोलेजियम की बैठकों में क्या चर्चा हुई और किन बातों पर विचार किया गया, यह सार्वजनिक नहीं किया जाता।
जस्टिस नागरत्ना ने चेतावनी देते हुए कहा कि अगर कोलेजियम की आंतरिक प्रक्रियाओं की जांच शुरू की गई तो यह “पेंडोरा बॉक्स” खोलने जैसा होगा, जिससे पूरी नियुक्ति प्रणाली पर असर पड़ सकता है।
ऐसी प्रक्रिया की न्यायिक जांच शुरू करना उचित नहीं होगा।
जस्टिस नागरत्ना ने कहा कि कोर्ट को ऐसे मामले में बहुत सावधानी बरतनी होगी, क्योंकि यदि कोलेजियम की आंतरिक चर्चाओं को न्यायिक जांच के दायरे में लाया गया तो इसके दूरगामी प्रभाव हो सकते हैं और इससे पूरी व्यवस्था पर असर पड़ सकता है।
कोर्ट ने साफ किया कि वह कोलेजियम के अंदर होने वाली प्रक्रिया और चर्चाओं को सार्वजनिक बहस का विषय नहीं बनाना चाहती।
सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि रिकॉर्ड से यह स्पष्ट नहीं होता कि याचिकाकर्ता के नाम को रोका गया था, बाद के लिए रखा गया था या केवल इस चरण में उसका चयन नहीं हुआ। ऐसी स्थिति में किसी निष्कर्ष पर पहुंचना भी उचित नहीं होगा।
सुप्रीम कोर्ट का फैसला
सुनवाई के दौरान सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि मामले में ऐसा कोई आधार नहीं दिखता, जिसके लिए कोर्ट को दखल देना पड़े।
सुप्रीम कोर्ट ने यह भी कहा कि यदि इस प्रकार की याचिकाओं पर विस्तार से सुनवाई की जाती है, तो इसके लिए कोलेजियम के मूल्यांकन और निर्णय प्रक्रिया की जांच करनी पड़ेगी, जो उचित नहीं होगी।
सुनवाई के दौरान कोर्ट के रुख को देखते हुए याचिकाकर्ता ने याचिका पर आगे बहस नहीं करने का फैसला किया।
इसके बाद सुप्रीम कोर्ट ने याचिका का निपटारा कर दिया।
हालांकि सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि याचिकाकर्ता के लिए उपलब्ध अन्य कानूनी रास्ते बंद नहीं होंगे। यदि वह चाहे, तो नियमों के तहत संबंधित प्राधिकरण के सामने अपनी बात रख सकता है।
फैसले का महत्व
सुप्रीम कोर्ट का यह फैसला न्यायिक नियुक्तियों से जुड़े मामलों में अहम है। कोर्ट ने साफ कर दिया है कि हाईकोर्ट में जज के रूप में नियुक्ति कोई ऐसा अधिकार नहीं है, जिसे केवल वरिष्ठता के आधार पर दावा किया जा सके।
फैसला यह भी स्पष्ट करता है कि कोलेजियम की सिफारिशों और मूल्यांकन प्रक्रिया में न्यायिक आदेशों के जरिए हस्तक्षेप नहीं किया जा सकता।
इस निर्णय का व्यापक महत्व इसलिए भी है क्योंकि समय-समय पर न्यायिक अधिकारियों और वकीलों द्वारा नियुक्ति प्रक्रिया को लेकर सवाल उठाए जाते रहे हैं।
सुप्रीम कोर्ट ने अपने फैसले के जरिए यह संदेश दिया है कि जजों की नियुक्ति से जुड़े निर्णय संस्थागत प्रक्रिया के तहत लिए जाते हैं और उन्हें सामान्य प्रशासनिक या सेवा विवादों की तरह चुनौती नहीं दी जा सकती।
कोर्ट ने यह भी स्पष्ट कर दिया कि वरिष्ठता अहम हो सकती है, लेकिन हाईकोर्ट में नियुक्ति का अंतिम आधार केवल वरिष्ठता नहीं बल्कि कोलेजियम का समग्र मूल्यांकन और संतोष होता है।
