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सरकारी डॉक्टरों की प्राइवेट प्रैक्टिस पर सुप्रीम कोर्ट सख्त: डॉक्टरों की निजी प्रैक्टिस को माना गंभीर मुद्दा, जनहित का मामला बताते हुए जांच में दखल से किया इनकार

Supreme Court Backs Inquiry Into Private Practice Allegations Against Government Doctors, Calls Issue One Of Public Interest

नई दिल्ली: सरकारी अस्पतालों में तैनात डॉक्टरों द्वारा निजी प्रैक्टिस करने के आरोपों को लेकर सुप्रीम कोर्ट ने एक अहम रुख अपनाया है।

कोर्ट ने साफ संकेत दिया कि यह सिर्फ किसी एक डॉक्टर का मामला नहीं, बल्कि पूरे सार्वजनिक स्वास्थ्य सिस्टम से जुड़ा गंभीर मुद्दा है।

सुप्रीम कोर्ट ने सरकारी अस्पतालों में इलाज कराने वाले करोड़ों मरीजों और सरकारी स्वास्थ्य सेवाओं की व्यवस्था को लेकर अहम टिप्पणी की है।

कोर्ट ने सरकारी डॉक्टरों द्वारा निजी प्रैक्टिस किए जाने के आरोपों को गंभीर मुद्दा बताते हुए ऐसे मामलों की जांच में हस्तक्षेप करने से इनकार कर दिया।

सुप्रीम कोर्ट ने इलाहाबाद हाईकोर्ट के उस आदेश में दखल देने से मना कर दिया, जिसमें प्रयागराज के मोतीलाल नेहरू मेडिकल कॉलेज और उससे जुड़े स्वरूप रानी नेहरू अस्पताल के डॉक्टरों पर निजी प्रैक्टिस करने तथा सरकारी अस्पताल के समानांतर स्वास्थ्य व्यवस्था चलाने के आरोपों की उच्च स्तरीय जांच कराने का निर्देश दिया गया था।

कोर्ट ने संकेत दिया कि मामला किसी एक डॉक्टर के खिलाफ कार्रवाई का नहीं, बल्कि सरकारी स्वास्थ्य सेवाओं की जवाबदेही और आम मरीजों के हितों से जुड़ा है।

सुनवाई के दौरान सुप्रीम कोर्ट ने यह भी माना कि हाईकोर्ट जिस मुद्दे पर विचार कर रहा है, वह व्यापक जनहित से जुड़ा विषय है।

जस्टिस बी.वी. नागरत्ना और जस्टिस जॉयमल्या बागची की बेंच के सामने सुनवाई के दौरान याचिकाकर्ता ने अपनी विशेष अनुमति याचिका वापस लेने की अनुमति मांगी, जिसके बाद सुप्रीम कोर्ट ने याचिका को वापस ली गई मानकर निस्तारित कर दिया।

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पूरा मामला क्या है?

यह मामला प्रयागराज स्थित मोतीलाल नेहरू मेडिकल कॉलेज और उससे जुड़े स्वरूप रानी नेहरू अस्पताल की कार्यप्रणाली से जुड़ा है।

इलाहाबाद हाईकोर्ट में एक जनहित याचिका पर सुनवाई के दौरान मेडिकल कॉलेज और अस्पताल से संबंधित कई गंभीर मुद्दे सामने आए थे।

शुरुआत में आरोप था कि मेडिकल कॉलेज से जुड़े एक सरकारी डॉक्टर ने निजी अस्पताल में मरीजों का इलाज किया, जबकि सरकारी डॉक्टरों के लिए निजी प्रैक्टिस पर रोक है।

सुनवाई आगे बढ़ने पर हाईकोर्ट के सामने और भी कई शिकायतें आईं। इनमें अस्पताल की व्यवस्थाओं, अधूरी निर्माण परियोजनाओं, छात्रावासों की स्थिति और डॉक्टरों की कार्यशैली से जुड़े मुद्दे शामिल थे।

इसी दौरान यह आरोप भी सामने आया कि मेडिकल कॉलेज के कुछ प्रोफेसर, एसोसिएट प्रोफेसर और अन्य शिक्षक निजी नर्सिंग होम और अस्पतालों में प्रैक्टिस कर रहे हैं।

मामले की गंभीरता को देखते हुए हाईकोर्ट ने इसे केवल व्यक्तिगत शिकायत न मानकर व्यापक जनहित का विषय माना।

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मरीजों को निजी अस्पताल भेजने के आरोप

सुनवाई के दौरान हाईकोर्ट के सामने यह आरोप भी रखा गया कि सरकारी अस्पताल में आने वाले कुछ मरीजों को निजी अस्पतालों और नर्सिंग होम की ओर भेजा जा रहा है।

हाईकोर्ट ने कहा था कि ऐसा लगता है कि प्रयागराज में सरकारी स्वास्थ्य व्यवस्था के समानांतर एक निजी चिकित्सा तंत्र विकसित हो गया है।

कोर्ट के मुताबिक यदि सरकारी अस्पतालों में कार्यरत डॉक्टर निजी अस्पतालों में सर्जरी कर रहे हैं और वहां मरीजों का इलाज कर रहे हैं, तो यह गंभीर चिंता का विषय है।

हाईकोर्ट ने यह भी कहा था कि मेडिकल कॉलेज और उससे जुड़े अस्पतालों की स्थिति केवल धन या संसाधनों की कमी के कारण खराब नहीं हुई है। कोर्ट ने माना था कि यदि डॉक्टरों का ध्यान सरकारी अस्पतालों की बजाय निजी संस्थानों पर अधिक रहेगा, तो इसका असर सरकारी स्वास्थ्य सेवाओं पर पड़ना स्वाभाविक है।

इन्हीं आरोपों और परिस्थितियों को देखते हुए हाईकोर्ट ने उत्तर प्रदेश के मुख्य सचिव को उच्च स्तरीय जांच कराने का निर्देश दिया था।

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जांच के आदेश को सुप्रीम कोर्ट में चुनौती

इस मामले में हाईकोर्ट के आदेश को चुनौती देते हुए डॉ. संतोष कुमार सिंह, जो मेडिकल कॉलेज में सर्जरी विभाग में एसोसिएट प्रोफेसर हैं, उन्होंने सुप्रीम कोर्ट में विशेष अनुमति याचिका (SLP) दाखिल की थी।

उनकी ओर से दलील दी गई कि वे हाईकोर्ट में चल रही मूल कार्यवाही के पक्षकार नहीं थे। साथ ही यह भी कहा गया कि हाईकोर्ट ने एक ऐसे एफआईआर का उल्लेख किया, जो उनके निजी विवाद से जुड़ा था।

याचिकाकर्ता का कहना था कि हाईकोर्ट की टिप्पणियों से उनके अधिकार प्रभावित हो सकते हैं और इसलिए आदेश में हस्तक्षेप किया जाना चाहिए।

हालांकि सुनवाई के दौरान सुप्रीम कोर्ट ने इस दलील को स्वीकार करने के संकेत नहीं दिए। कोर्ट ने कहा कि हाईकोर्ट जिस मुद्दे पर विचार कर रहा है, वह किसी एक व्यक्ति तक सीमित नहीं है।

सुनवाई के दौरान जस्टिस नागरत्ना ने यह भी कहा कि मामला सरकारी डॉक्टरों द्वारा निजी प्रैक्टिस किए जाने के आरोपों से जुड़ा है और इसे केवल व्यक्तिगत विवाद के रूप में नहीं देखा जा सकता।

सुप्रीम कोर्ट ने दखल से क्यों किया इनकार ?

सुनवाई के दौरान सुप्रीम कोर्ट ने बार-बार संकेत दिया कि वह हाईकोर्ट के आदेश में हस्तक्षेप करने के पक्ष में नहीं है।

कोर्ट का मानना था कि मामला व्यापक जनहित से जुड़ा हुआ है और इसकी जांच को शुरुआती स्तर पर रोकना उचित नहीं होगा। कोर्ट ने कहा कि हाईकोर्ट का ध्यान किसी एक डॉक्टर पर नहीं बल्कि उन आरोपों पर है, जिनका संबंध सरकारी डॉक्टरों द्वारा निजी प्रैक्टिस किए जाने से है।

कोर्ट ने यह भी स्पष्ट किया कि ऐसी जांच का उद्देश्य किसी व्यक्ति को निशाना बनाना नहीं बल्कि यह पता लगाना है कि लगाए गए आरोपों में कितनी सच्चाई है।

जब सुप्रीम कोर्ट ने अपने रुख के संकेत दिए, तब याचिकाकर्ता की ओर से विशेष अनुमति याचिका वापस लेने की अनुमति मांगी गई।

इसके बाद सुप्रीम कोर्ट ने याचिका को वापस ली गई मानकर निस्तारित कर दिया।

अस्पताल की व्यवस्थाओं को लेकर भी उठे सवाल

इस मामले में निजी प्रैक्टिस के आरोपों के अलावा अस्पताल की बुनियादी व्यवस्थाएं भी जांच के दायरे में हैं।

हाईकोर्ट के सामने यह तथ्य रखा गया था कि मेडिकल कॉलेज में कई निर्माण कार्य वर्षों से अधूरे पड़े हैं। कार्डियोलॉजी विभाग की दो मंजिलों का निर्माण वर्ष 2006 में शुरू हुआ था, लेकिन लंबे समय बाद भी वह पूरा नहीं हो सका। जबकि राज्य सरकार द्वारा इसके लिए धनराशि जारी की जा चुकी थी।

हाईकोर्ट ने इस स्थिति पर भी चिंता जताई थी और कहा था कि यदि पर्याप्त संसाधन उपलब्ध होने के बावजूद परियोजनाएं पूरी नहीं हो रही हैं, तो इसकी जवाबदेही तय होनी चाहिए।

इसी वजह से हाईकोर्ट ने केवल डॉक्टरों की निजी प्रैक्टिस के आरोपों की जांच ही नहीं बल्कि अस्पताल की व्यवस्थाओं और निर्माण कार्यों की निगरानी का भी निर्देश दिया था।

फैसले का महत्व

सुप्रीम कोर्ट का यह मामला केवल एक मेडिकल कॉलेज या एक डॉक्टर तक सीमित नहीं है। यह फैसला सरकारी स्वास्थ्य व्यवस्था में जवाबदेही और पारदर्शिता से जुड़े बड़े सवालों को सामने लाता है।

कोर्ट ने साफ संकेत दिया है कि यदि सरकारी अस्पतालों में कार्यरत डॉक्टरों पर सेवा नियमों के उल्लंघन या निजी प्रैक्टिस के आरोप लगते हैं, तो ऐसी शिकायतों की निष्पक्ष जांच होना जरूरी है।

फैसला यह भी बताता है कि जब मामला व्यापक जनहित से जुड़ा हो, तब जांच को केवल इस आधार पर नहीं रोका जा सकता कि किसी व्यक्ति को उससे आपत्ति है।

इस निर्णय का असर उन सभी सरकारी स्वास्थ्य संस्थानों पर पड़ सकता है, जहां डॉक्टरों की निजी प्रैक्टिस, मरीजों के रेफरल और अस्पतालों की कार्यप्रणाली को लेकर समय-समय पर सवाल उठते रहे हैं।

सुप्रीम कोर्ट ने आरोपों की सत्यता पर कोई अंतिम राय नहीं दी है, लेकिन उसने यह जरूर स्पष्ट कर दिया है कि ऐसे आरोपों को गंभीरता से लिया जाना चाहिए और उनकी जांच को बीच में रोकना उचित नहीं होगा।

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