नई दिल्ली: संपत्ति विवादों और सिविल मामलों की सुनवाई को लेकर सुप्रीम कोर्ट ने एक अहम फैसला सुनाया है। कोर्ट ने साफ कहा है कि कोई भी कोर्ट किसी व्यक्ति को उसकी इच्छा के खिलाफ मुआवजा लेने के लिए मजबूर नहीं कर सकती।
सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि यदि किसी व्यक्ति ने अपने मुकदमे में अतिक्रमण हटाने या निर्माण हटाने की मांग की है, तो कोर्ट अपने स्तर पर यह नहीं कह सकती कि अब मुआवजा ले लीजिए और मामला खत्म मानिए।
कोर्ट ने स्पष्ट किया कि मुकदमे में जो राहत मांगी गई है, फैसला भी उसी दायरे में होना चाहिए। यदि किसी व्यक्ति ने कभी मुआवजे की मांग ही नहीं की, तो उसे जबरन मुआवजा देकर विवाद खत्म नहीं किया जा सकता।
जस्टिस एस.वी.एन. भट्टी और जस्टिस अतुल एस. चंदुरकर की बेंच ने यह टिप्पणी एक संपत्ति विवाद से जुड़े मामले में की। इसी के साथ सुप्रीम कोर्ट ने पंजाब एवं हरियाणा हाईकोर्ट का आदेश रद्द कर दिया और मामले को दोबारा सुनवाई के लिए वापस भेज दिया।
किस विवाद से शुरू हुआ मामला?
यह विवाद एक मकान और उसके आसपास हुए कथित अतिक्रमण से जुड़ा था।
इस मामले की शुरुआत ओम प्रकाश ने की थी। शिकायतकर्ता ओम प्रकाश का कहना था कि उनके घर के पास की साझा जगह पर दीवार बनाकर अतिक्रमण किया गया है। इसी को लेकर उन्होंने दो अलग-अलग मामले दायर किए थे।
उनका आरोप था कि इस निर्माण की वजह से उनके घर में आने वाली हवा और रोशनी प्रभावित हो रही है। साथ ही पानी की निकासी में भी परेशानी पैदा हो रही है।
वहीं दूसरे मामले में उन्होंने आरोप लगाया कि स्कूल भवन का एक हिस्सा उनके मकान की दीवार पर बना दिया गया है।
दोनों मामलों में उनकी मांग एक ही थी-अतिक्रमण हटाया जाए और आगे किसी तरह का निर्माण न किया जाए। अहम बात यह थी कि उन्होंने कहीं भी मुआवजे या हर्जाने की मांग नहीं की थी।
ट्रायल कोर्ट और अपील कोर्ट का फैसला
मामले की सुनवाई के बाद ट्रायल कोर्ट ने शिकायतकर्ता ओम प्रकाश के पक्ष में फैसला सुनाया।
ट्रायल कोर्ट ने सुनवाई के बाद माना कि विवादित जगह पर दूसरे पक्ष का कोई कानूनी अधिकार साबित नहीं हुआ है। इसके बाद कोर्ट की ओर से वहां किया गया अतिक्रमण हटाने और आगे निर्माण पर रोक लगाने का आदेश दिया गया।
बाद में मामला अपील में गया, लेकिन वहां भी ट्रायल कोर्ट का फैसला बरकरार रखा गया। यानी लगातार दो स्तर पर शिकायतकर्ता के पक्ष में फैसला आया और अतिक्रमण हटाने का आदेश कायम रहा।
हाईकोर्ट ने कैसे बदला पूरा मामला?
इसके बाद मामला पंजाब एवं हरियाणा हाईकोर्ट पहुंचा।
हाईकोर्ट ने अतिक्रमण हटाने के आदेश को बरकरार रखने के बजाय दूसरा रास्ता अपनाया।
हाईकोर्ट ने अतिक्रमण हटाने के आदेश को बरकरार नहीं रखा। इसके बजाय उसने कहा कि दूसरा पक्ष कुछ रकम दे दे और विवादित दीवार को दोनों पक्षों की साझा दीवार मान लिया जाए।
यह आदेश बाद में सुप्रीम कोर्ट पहुंचा और वर्ष 2013 में रद्द कर दिया गया। इसके बाद मामला दोबारा हाईकोर्ट भेजा गया।
लेकिन दूसरी बार भी हाईकोर्ट ने लगभग वही रास्ता अपनाया। इस बार उसने अतिक्रमण हटाने के आदेश खत्म कर दिए और कहा कि निर्माण का मूल्य तय कर वादी को मुआवजा दे दिया जाए।
यहीं से मामला एक बार फिर सुप्रीम कोर्ट पहुंच गया।
हाईकोर्ट के आदेश पर सुप्रीम कोर्ट की आपत्ति
सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि हाईकोर्ट ने ऐसा समाधान दे दिया जिसकी मांग मुकदमे में कभी की ही नहीं गई थी।
कोर्ट ने कहा कि शिकायतकर्ता ने केवल अतिक्रमण हटाने की मांग की थी। उन्होंने कहीं भी यह नहीं कहा था कि उन्हें मुआवजा दे दिया जाए। इसके बावजूद हाईकोर्ट ने अतिक्रमण हटाने के आदेश खत्म कर दिए और उनकी जगह मुआवजा देने का रास्ता चुन लिया।
सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि किसी व्यक्ति ने यदि मुआवजे की मांग ही नहीं की है, तो उसे पैसे लेकर मामला खत्म करने के लिए मजबूर नहीं किया जा सकता।
कोर्ट ने कहा कि याचिकाकर्ता के कानूनी वारिसों ने भी इस व्यवस्था पर सहमति नहीं दी थी। ऐसी स्थिति में उन्हें मुआवजा स्वीकार करने के लिए कहना सही नहीं था।
एक्जीक्यूटिंग कोर्ट को लेकर भी उठाया सवाल
सुप्रीम कोर्ट ने हाईकोर्ट के एक और निर्देश पर आपत्ति जताई।
हाईकोर्ट ने कहा था कि एक्जीक्यूटिंग कोर्ट निर्माण का मूल्य तय करे और उसके आधार पर मुआवजा निर्धारित किया जाए।
सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि जब अतिक्रमण हटाने वाले पुराने आदेश ही रद्द कर दिए गए थे, तो फिर उनके आधार पर आगे कोई कार्रवाई कैसे की जा सकती थी। ऐसी स्थिति में निर्माण की कीमत तय करने और मुआवजा तय करने का निर्देश देना सही नहीं था।
कोर्ट ने कहा कि जिस आदेश को लागू करना है, वही मौजूद नहीं है तो उसके आधार पर नई प्रक्रिया शुरू नहीं की जा सकती।
सुप्रीम कोर्ट का अंतिम फैसला
सुप्रीम कोर्ट ने पंजाब एवं हरियाणा हाईकोर्ट के आदेश को रद्द कर दिया।
कोर्ट ने कहा कि हाईकोर्ट ने अतिक्रमण हटाने के आदेशों को खत्म करते हुए ऐसा रास्ता अपनाया, जिसकी मांग मामले में कभी की ही नहीं गई थी।
सुप्रीम कोर्ट ने माना कि मामले की सुनवाई उसके वास्तविक कानूनी सवालों पर नहीं हुई। साथ ही हाईकोर्ट ने उन जरूरी कानूनी बिंदुओं पर भी विचार नहीं किया, जिनके आधार पर दूसरी अपील का फैसला किया जाना चाहिए था।
इसी वजह से सुप्रीम कोर्ट ने दोनों मामलों को फिर से पंजाब एवं हरियाणा हाईकोर्ट के पास भेज दिया।
कोर्ट ने कहा कि अब हाईकोर्ट इन मामलों की दोबारा सुनवाई करेगा और सभी पक्षों की दलीलें सुनने के बाद कानून के अनुसार नया फैसला देगा।
सुप्रीम कोर्ट ने यह भी कहा कि मामला वर्ष 2008 से लंबित है, इसलिए इसकी सुनवाई जल्द पूरी की जानी चाहिए।
सिविल मामलों के लिए अहम फैसला
सुप्रीम कोर्ट का यह फैसला देशभर में चल रहे हजारों संपत्ति विवादों और सिविल मुकदमों पर असर डाल सकता है।
कोर्ट ने साफ संदेश दिया है कि किसी मुकदमे की दिशा बदलकर पक्षकारों पर ऐसा समाधान नहीं थोपा जा सकता, जिसकी उन्होंने मांग ही न की हो।
फैसला यह भी बताता है कि किसी व्यक्ति के लिए उसकी संपत्ति, रास्ता, हवा, रोशनी या अन्य अधिकार केवल पैसों का सवाल नहीं होते। कई बार वह अतिक्रमण हटवाना चाहता है और उसका यह अधिकार है कि उसकी मांग पर सुनवाई हो।
सुप्रीम कोर्ट ने साफ कर दिया है कि कोर्ट अपने स्तर पर नया समाधान बनाकर किसी व्यक्ति को मुआवजा लेने के लिए मजबूर नहीं कर सकती।
यदि किसी ने अतिक्रमण हटाने की मांग की है, तो पहले उसी मांग पर फैसला होना चाहिए। यही कानून का मूल सिद्धांत है और इसी सिद्धांत को सुप्रीम कोर्ट ने इस फैसले में फिर दोहराया है।
