टॉप स्टोरी

चर्चित खबरें

‘जमीन खरीदने की इच्छा काफी नहीं, भुगतान की क्षमता और लगातार कोशिश करने का सबूत भी जरूरी, सुप्रीम कोर्ट ने बताया कब लागू होगा बिक्री समझौता

Supreme Court Clarifies Conditions For Enforcing Property Sale Agreements, Says Mere Willingness Is Not Enough

नई दिल्ली: जमीन और संपत्ति से जुड़े समझौतों को लेकर सुप्रीम कोर्ट ने एक अहम फैसला सुनाया है। कोर्ट ने कहा है कि यदि कोई व्यक्ति बिक्री समझौते को लागू कराने के लिए कोर्ट पहुंचता है, तो उसे यह भी साबित करना होगा कि उसके पास उस समय सौदा पूरा करने के लिए पर्याप्त पैसे मौजूद थे।

सुप्रीम कोर्ट ने साफ कर दिया है कि किसी प्रॉपर्टी डील को जबरन लागू करवाने (स्पेसिफिक परफॉर्मेंस) के लिए केवल दावा करना काफी नहीं है, बल्कि यह भी साबित करना होगा कि संबंधित पक्ष शुरुआत से लेकर केस के फैसले तक हर समय सौदा पूरा करने के लिए तैयार और इच्छुक था।

कोर्ट ने साफ कहा कि कई साल बाद बनाई गई एफडीआर (फिक्स्ड डिपॉजिट रसीदें) या बाद में तैयार किए गए वित्तीय दस्तावेजों के आधार पर यह नहीं माना जा सकता कि समझौते के समय खरीदार के पास जरूरी रकम मौजूद थी।

सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि सिर्फ यह कहना काफी नहीं है कि खरीदार सौदा करने के लिए तैयार था। उसे यह भी साबित करना होगा कि उसके पास भुगतान के लिए जरूरी रकम थी और वह लगातार सौदा पूरा करने की कोशिश कर रहा था।

जस्टिस प्रशांत कुमार मिश्रा और जस्टिस एन.वी. अंजारिया की बेंच ने यह टिप्पणी करते हुए खरीदार की अपील खारिज कर दी। सुप्रीम कोर्ट ने अपने फैसले में कर्नाटक हाईकोर्ट के आदेश को सही ठहराया। हाईकोर्ट ने पहले ट्रायल कोर्ट का फैसला पलटते हुए मुकदमा खारिज कर दिया था।

यह भी पढ़ें: आर्बिट्रेशन समझौते में जगहों को लेकर विवाद हो तो किस कोर्ट में जाएगा मामला? : सुप्रीम कोर्ट ने तय किया सिद्धांत, तेलंगाना हाईकोर्ट का आदेश बरकरार

1990 के एग्रीमेंट से शुरू हुआ विवाद

यह मामला कर्नाटक के मैसूर शहर में स्थित एक जमीन के बिक्री समझौते से जुड़ा था, जो दिसंबर 1990 में हुआ था। मोहम्मद खलील ने जयम्मा से एक जमीन खरीदने के लिए समझौता किया था। बाद में इसी सौदे को लेकर विवाद शुरू हो गया।

20 दिसंबर 1990 को खरीदार मोहम्मद खलील और विक्रेता जयम्मा के बीच 3 लाख रुपये में जमीन बेचने का एग्रीमेंट हुआ था। इसमें 25,000 रुपये एडवांस दिए गए और 4 महीने के भीतर रजिस्ट्री पूरी करनी थी।

समझौते के बाद विक्रेता ने जमीन से जुड़े कई मूल दस्तावेज भी खरीदार को सौंप दिए थे। लेकिन बाद में इस सौदे को लेकर दोनों पक्षों के बीच विवाद शुरू हो गया। खरीदार का कहना था कि कुछ जरूरी शर्तें पूरी नहीं हुई थीं, जबकि विक्रेता का आरोप था कि खरीदार अपनी जिम्मेदारियां पूरी नहीं कर रहा था। दोनों पक्षों ने एक-दूसरे को कानूनी नोटिस भेजे। आखिरकार खरीदार ने दिसंबर 1993 में कोर्ट का रुख किया और समझौते को लागू कराने की मांग की।

खरीदार का कहना था कि वह समझौते की शर्तों को पूरा करने के लिए तैयार था और विक्रेता को जमीन बेचने के लिए बाध्य किया जाना चाहिए।

यह भी पढ़ें: बिना सूचना ड्यूटी से गायब रहने वाले कर्मचारियों पर सख्ती: पता अपडेट नहीं किया तो नोटिस न मिलने का बहाना भी नहीं चलेगा: सुप्रीम कोर्ट

ट्रायल कोर्ट और हाईकोर्ट में क्या हुआ ?

मामले की सुनवाई के बाद ट्रायल कोर्ट ने खरीदार के पक्ष में फैसला सुनाया। ट्रायल कोर्ट ने माना कि खरीदार समझौते को लागू कराने का हकदार है और उसके पक्ष में डिक्री पारित कर दी।

लेकिन बाद में मामला कर्नाटक हाईकोर्ट पहुंचा और हाईकोर्ट ने ट्रायल कोर्ट का फैसला पलट दिया।

हाईकोर्ट ने कहा कि खरीदार यह साबित नहीं कर सका कि वह पूरे समय सौदा पूरा करने के लिए तैयार और इच्छुक था। कोर्ट ने कहा कि रिकॉर्ड में ऐसा कोई ठोस सबूत नहीं है, जिससे यह साबित हो कि खरीदार के पास उस समय बाकी भुगतान करने के लिए पर्याप्त पैसे थे।

इसी फैसले को चुनौती देते हुए मामला सुप्रीम कोर्ट पहुंचा।

सुप्रीम कोर्ट का तर्क: ‘रेडीनेस’ और ‘विलिंगनेस’ दोनों जरूरी

सुप्रीम कोर्ट ने मामले की सुनवाई के दौरान एक अहम सवाल पर ध्यान दिया।

क्या खरीदार यह साबित कर पाया कि उसके पास समझौते के समय और उसके बाद सौदा पूरा करने के लिए पर्याप्त रकम थी?

कोर्ट ने कहा कि ऐसे मामलों में दो बातें बहुत महत्वपूर्ण होती हैं।

  • पहली, खरीदार के पास भुगतान करने की आर्थिक क्षमता हो यानी ‘रेडीनेस’।
  • दूसरी, उसका व्यवहार यह दिखाए कि वह वास्तव में सौदा पूरा करना चाहता था यानी ‘विलिंगनेस’।

कोर्ट ने स्पष्ट किया कि ये दोनों शर्तें एक साथ और लगातार पूरी होनी चाहिए। सिर्फ कागजों में दावा करना या बाद में सबूत लाना काफी नहीं है।

कोर्ट ने कहा कि केवल इच्छा जताना काफी नहीं है। “रेडीनेस” और “विलिंगनेस”, दोनों को साबित करना जरूरी होता है। इन्हीं दोनों बातों के आधार पर यह तय किया जाता है कि कोई व्यक्ति वास्तव में समझौते को पूरा करना चाहता था या नहीं।

सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि कानून के तहत यह जरूरी नहीं है कि पैसा कोर्ट में जमा कराया जाए, लेकिन यह दिखाना जरूरी है कि उस समय पैसा उपलब्ध था जब एग्रीमेंट पूरा होना था।

यह भी पढ़ें: सरकारी डॉक्टरों की प्राइवेट प्रैक्टिस पर सुप्रीम कोर्ट सख्त: डॉक्टरों की निजी प्रैक्टिस को माना गंभीर मुद्दा, जनहित का मामला बताते हुए जांच में दखल से किया इनकार

एफडीआर पर कोर्ट की टिप्पणी: बाद के दस्तावेज बेकार

सुप्रीम कोर्ट के सामने खरीदार की ओर से चार एफडीआर पेश की गईं। इन एफडीआर की कुल राशि करीब 2.80 लाख रुपये थी। खरीदार का कहना था कि इन एफडीआर से यह साबित होता है कि उसके पास पर्याप्त पैसे थे और वह सौदा पूरा करने के लिए तैयार था।

लेकिन सुप्रीम कोर्ट ने रिकॉर्ड देखने के बाद पाया कि ये सभी एफडीआर मुकदमा दायर होने के कई सालों बाद बनाई गई थीं। कुछ एफडीआर साल 1999 में बनाई गई थीं, जबकि कुछ साल 2001 की थीं।

दूसरी ओर मुकदमा साल 1993 में दायर किया गया था। कोर्ट ने कहा कि साल 1999 या 2001 में बनाई गई एफडीआर यह नहीं दिखा सकती कि साल 1990, 1991 या 1993 में खरीदार के पास रकम उपलब्ध थी।

सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि यह देखा जाएगा कि समझौते के समय खरीदार के पास पैसे थे या नहीं। कई साल बाद बनाए गए दस्तावेजों के आधार पर पुरानी आर्थिक स्थिति साबित नहीं की जा सकती। कोर्ट ने कहा कि खरीदार के पास सौदा पूरा करने के लिए रकम उसी समय मौजूद होनी चाहिए थी। बाद में तैयार किए गए दस्तावेज इस बात का सबूत नहीं बन सकते।

खरीदार के व्यवहार पर भी उठे सवाल

सुप्रीम कोर्ट ने केवल आर्थिक क्षमता ही नहीं देखी, बल्कि खरीदार के व्यवहार की भी जांच की।

कोर्ट ने पाया कि समझौते को पूरा करने के लिए कुछ जरूरी औपचारिकताएं पूरी की जानी थीं। इनमें खरीदार का सहयोग भी जरूरी था। लेकिन रिकॉर्ड से यह नहीं दिखा कि खरीदार ने उन प्रक्रियाओं को आगे बढ़ाने के लिए कोई खास पहल की हो।

कोर्ट ने कहा कि खरीदार ने सौदा पूरा कराने के लिए जरूरी पहल नहीं की। वह खुद आगे बढ़ने के बजाय दूसरे पक्ष के कदम उठाने का इंतजार करता रहा। सुप्रीम कोर्ट ने माना कि खरीदार का व्यवहार यह नहीं दिखाता कि वह सौदा पूरा करने के लिए लगातार प्रयास कर रहा था।

सुप्रीम कोर्ट ने यह भी देखा कि जब विक्रेता ने समझौता पूरा करने से इनकार कर दिया था, उसके काफी समय बाद खरीदार कोर्ट पहुंचा। हालांकि मामला तय कानूनी समय के भीतर दायर किया गया था, लेकिन खरीदार की यह देरी भी उसके व्यवहार को समझने में एक महत्वपूर्ण पहलू थी।

मुकदमा दायर करने में देरी भी बनी कारण

हालांकि केस लिमिटेशन पीरियड के भीतर दाखिल किया गया था, लेकिन सुप्रीम कोर्ट ने यह भी नोट किया कि खरीदार ने केस दाखिल करने में लगभग 2 साल 9 महीने का समय लिया।

सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि स्पेसिफिक परफॉर्मेंस एक “इक्विटेबल रिलीफ” है, यानी इसमें न्याय और निष्पक्षता का ध्यान रखा जाता है। ऐसे मामलों में देरी भी यह दिखाती है कि व्यक्ति वास्तव में कितना गंभीर था। कोर्ट ने कहा कि ऐसे मामलों में यह भी अहम होता है कि व्यक्ति ने समझौता पूरा कराने के लिए कितनी गंभीरता दिखाई। अनावश्यक देरी उसके दावे को कमजोर कर सकती है।

कोर्ट ने कहा कि यदि कोई व्यक्ति वास्तव में समझौता लागू कराना चाहता है, तो उससे यह अपेक्षा की जाती है कि वह समय रहते सक्रिय कदम उठाए।

कोर्ट ने माना कि खरीदार की यह देरी भी उसके दावे को कमजोर करती है। और यह देरी भी कोर्ट के सामने एक नकारात्मक फैक्टर के रूप में सामने आई।

सुप्रीम कोर्ट का अंतिम फैसला

सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि खरीदार दोनों जरूरी शर्तें साबित करने में नाकाम रहा। खरीदार यह साबित नहीं कर सका कि उसके पास सौदा पूरा करने के लिए जरूरी रकम थी, साथ ही उसका व्यवहार भी यह साबित नहीं करता कि वह लगातार समझौते को पूरा करने के लिए सक्रिय रूप से कोशिश कर रहा था।

सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि सिर्फ यह कह देने से काम नहीं चलेगा कि वह संपत्ति खरीदने के लिए तैयार था। उसे इसके समर्थन में ठोस सबूत भी देने होंगे। कोर्ट ने कहा कि केवल दावा करना काफी नहीं है। यह भी साबित करना होगा कि वह वास्तव में सौदा पूरा करने की स्थिति में था।

इसी आधार पर सुप्रीम कोर्ट ने कर्नाटक हाईकोर्ट के फैसले को सही माना और खरीदार की अपील खारिज कर दी।

फैसले का महत्व

सुप्रीम कोर्ट का यह फैसला देशभर में चल रहे संपत्ति और बिक्री समझौतों से जुड़े मामलों के लिए अहम है। कोर्ट ने साफ कर दिया है कि जमीन या मकान खरीदने के समझौते को लागू कराने की मांग करने वाला व्यक्ति केवल मौखिक दावे के आधार पर राहत नहीं पा सकता।

उसे यह भी दिखाना होगा कि उसके पास उस समय भुगतान करने की क्षमता थी और वह लगातार सौदा पूरा करने के लिए प्रयास कर रहा था।

फैसला यह भी स्पष्ट करता है कि बाद में तैयार किए गए वित्तीय दस्तावेजों के आधार पर पुराने समय की आर्थिक स्थिति साबित नहीं की जा सकती।

सुप्रीम कोर्ट ने एक बार फिर दोहराया है कि ऐसे मामलों में केवल दावा जताना काफी नहीं है। जमीन खरीदने की बात कहने वाले व्यक्ति को यह भी साबित करना होगा कि उसके पास वास्तव में भुगतान करने के लिए पैसे थे और वह पूरे समय सौदा पूरा करने के लिए गंभीर था।

सबसे अधिक लोकप्रिय