नई दिल्ली: सड़क दुर्घटनाओं में मुआवजा तय करने को लेकर सुप्रीम कोर्ट ने एक अहम फैसला सुनाया है।
सुप्रीम कोर्ट ने कहा है कि किसी व्यक्ति को हुई शारीरिक विकलांगता का प्रतिशत ही मुआवजे का अंतिम आधार नहीं हो सकता। यह भी देखना होगा कि उस चोट का उसके रोजगार और कमाई पर कितना असर पड़ा है।
सुप्रीम कोर्ट ने स्पष्ट किया कि मोटर दुर्घटना मामलों में मुआवजा तय करते समय केवल मेडिकल रिपोर्ट में लिखी गई शारीरिक विकलांगता नहीं, बल्कि पीड़ित की ‘फंक्शनल डिसेबिलिटी‘ यानी काम करने की वास्तविक क्षमता में आई कमी को भी ध्यान में रखा जाना चाहिए।
कोर्ट ने कहा कि यदि किसी व्यक्ति की चोट ऐसी है, जिससे वह अपना पुराना पेशा ही नहीं कर सकता, तो उसकी कमाई की क्षमता का नुकसान शारीरिक विकलांगता के प्रतिशत से कहीं अधिक माना जा सकता है।
सुप्रीम कोर्ट ने स्पष्ट किया कि-
अगर चोट की वजह से कोई व्यक्ति अपना काम ही नहीं कर सकता, तो उसकी कमाई की क्षमता का नुकसान 100 प्रतिशत माना जा सकता है, भले ही मेडिकल रिपोर्ट में विकलांगता कम बताई गई हो। यानी सड़क हादसों में मुआवजे का आकलन करते समय अब यह देखना ज्यादा महत्वपूर्ण होगा कि चोट ने व्यक्ति की रोजी-रोटी पर कितना असर डाला है, न कि केवल यह कि मेडिकल रिपोर्ट में विकलांगता कितने प्रतिशत लिखी गई है।
जस्टिस प्रशांत कुमार मिश्रा और जस्टिस एन.वी. अंजारिया की बेंच ने यह टिप्पणी तमिलनाडु के एक राजमिस्त्री से जुड़े मामले में की। इसी के साथ सुप्रीम कोर्ट ने पीड़ित को मिलने वाला मुआवजा बढ़ाकर 40.29 लाख रुपये कर दिया।
क्या था मामला: सड़क हादसे ने छीन ली आजीविका
यह मामला तमिलनाडु के एम. परमेश नामक व्यक्ति से जुड़ा था, जो पेशे से राजमिस्त्री था।
18 अप्रैल 2017 को वह नामक्कल-सेलम राष्ट्रीय राजमार्ग पर साइकिल से जा रहा था। इसी दौरान पीछे से आए एक ट्रक ने उसे टक्कर मार दी। हादसा इतना गंभीर था कि परमेश को कई गंभीर चोटें आईं। इलाज के दौरान उसकी दाहिनी टांग घुटने के ऊपर से काटनी पड़ी।
परमेश का कहना था कि वह हर महीने करीब 20 हजार रुपये कमाता था और राजमिस्त्री का काम ही उसके परिवार की आय का एकमात्र साधन था। लेकिन हादसे के बाद वह पहले की तरह काम करने की स्थिति में नहीं रहा।
इसी आधार पर उसने मोटर दुर्घटना दावा अधिकरण (एमएसीटी) में 25 लाख रुपये मुआवजे की मांग की।
मेडिकल रिपोर्ट में उसकी स्थायी शारीरिक विकलांगता 70 प्रतिशत आंकी गई थी।
मुआवजे को लेकर कैसे से शुरू हुआ विवाद?
मामले की सुनवाई के बाद मोटर दुर्घटना दावा अधिकरण ने ट्रक चालक को हादसे के लिए जिम्मेदार माना। अधिकरण ने माना कि हादसा चालक की लापरवाही से हुआ था और ट्रक मालिक तथा बीमा कंपनी मुआवजा देने के लिए जिम्मेदार हैं।
हालांकि मुआवजा तय करते समय अधिकरण ने परमेश की मासिक आय 6 हजार रुपये मानी और 70 प्रतिशत शारीरिक विकलांगता के आधार पर कमाई की क्षमता में नुकसान की गणना की। इसके बाद उसे करीब 10.84 लाख रुपये का मुआवजा दिया गया।
बाद में मामला मद्रास हाईकोर्ट पहुंचा। हाईकोर्ट ने उसकी मासिक आय बढ़ाकर 12 हजार रुपये मान ली और कुल मुआवजा बढ़ाकर 23.86 लाख रुपये कर दिया। लेकिन हाईकोर्ट ने भी कमाई की क्षमता में नुकसान का आकलन 70 प्रतिशत विकलांगता के आधार पर ही किया।
इसी बात को लेकर परमेश सुप्रीम कोर्ट पहुंचे। उनका कहना था कि टांग कटने के बाद वह राजमिस्त्री का काम नहीं कर सकते, इसलिए उनकी कमाई की क्षमता में कमी 100 प्रतिशत मानी जानी चाहिए।
सिर्फ मेडिकल प्रतिशत काफी नहीं: सुप्रीम कोर्ट
सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि सड़क दुर्घटना के मामलों में सिर्फ मेडिकल रिपोर्ट में लिखी गई विकलांगता को देखकर मुआवजा तय नहीं किया जा सकता। कोर्ट ने कहा कि केवल यह देखना काफी नहीं है कि मेडिकल बोर्ड ने विकलांगता कितने प्रतिशत बताई है। यह भी देखना होगा कि चोट का व्यक्ति की कमाई पर कितना असर पड़ा है।
असल सवाल यह है कि उस चोट का व्यक्ति की आजीविका पर कितना असर पड़ा। कोर्ट ने कहा कि एक ही प्रकार की चोट अलग-अलग लोगों पर अलग प्रभाव डाल सकती है।
उदाहरण के लिए यदि किसी कार्यालय में बैठकर काम करने वाले व्यक्ति की एक टांग प्रभावित होती है, तो संभव है कि वह अपना काम जारी रख सके। लेकिन वही चोट किसी राजमिस्त्री, मजदूर, चालक या अन्य शारीरिक श्रम करने वाले व्यक्ति के लिए उसकी पूरी आजीविका पर असर डाल सकती है।
इसलिए मुआवजा तय करते समय यह देखना जरूरी है कि चोट के बाद व्यक्ति अपने पुराने पेशे में काम कर सकता है या नहीं।
सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि यही ‘फंक्शनल डिसेबिलिटी’ का सिद्धांत है। अगर कोई व्यक्ति शारीरिक रूप से 70% विकलांग है, लेकिन उसकी नौकरी पूरी तरह शारीरिक श्रम पर निर्भर है और वह अब वह काम नहीं कर सकता, तो उसकी फंक्शनल डिसेबिलिटी 100% मानी जाएगी।
राजमिस्त्री के काम में दोनों पैरों की भूमिका पर जोर
सुप्रीम कोर्ट ने रिकॉर्ड का अध्ययन करने के बाद पाया कि परमेश पेशे से राजमिस्त्री था। और राजमिस्त्री का काम लगातार खड़े रहने, चलने, चढ़ने-उतरने और दोनों पैरों के सहारे शारीरिक श्रम करने पर आधारित होता है।
सुप्रीम कोर्ट ने माना कि घुटने के ऊपर से टांग कटने के बाद परमेश अपना पुराना पेशा जारी नहीं रख सकते थे। यानी टांग कटने के बाद परमेश के लिए राजमिस्त्री का काम जारी रखना नामुमकिन हो गया था।
कोर्ट ने कहा कि परमेश की रोजी-रोटी का एकमात्र सहारा यही काम था।
कोर्ट ने यह भी नोट किया कि बीमा कंपनी यह नहीं बता सकी कि परमेश कोई दूसरा ऐसा काम कर सकता है, जिससे उसकी आय पर कोई असर न पड़े। रिकॉर्ड में ऐसा कुछ नहीं है जिससे यह साबित हो कि परमेश किसी दूसरे काम से अपनी आजीविका चला सकते थे।
कोर्ट ने पाया कि रिकॉर्ड में ऐसा कोई तर्क नहीं दिया गया कि पीड़ित किसी वैकल्पिक या बैठकर किए जाने वाले काम में सक्षम है। इसलिए यह मानना पूरी तरह उचित है कि वह अपनी एकमात्र आजीविका खो चुका है। ऐसे में सिर्फ 70 प्रतिशत शारीरिक विकलांगता के आधार पर उनकी कमाई के नुकसान का आकलन करना सही नहीं होगा।
सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि जब परमेश अपना पुराना पेशा ही नहीं कर सकते, तो उनकी कमाई के नुकसान को केवल 70 प्रतिशत नहीं माना जा सकता।
सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि परमेश की कार्यात्मक विकलांगता 100 प्रतिशत मानी जानी चाहिए, क्योंकि वह अपना मूल पेशा जारी रखने की स्थिति में नहीं रहा।
हाईकोर्ट की गणना में क्या गलती मिली ?
सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि मुआवजे की गणना करते समय हाईकोर्ट से कुछ गलतियां हो गई थीं।
कोर्ट ने कहा कि जब हाईकोर्ट ने मासिक आय बढ़ाकर 12,000 रुपये की, तो उसे भविष्य की संभावनाओं (फ्यूचर प्रॉस्पेक्ट्स) की गणना भी इसी संशोधित आय के आधार पर करनी चाहिए थी, लेकिन उसने पुराने आंकड़े पर ही गणना कर दी और पहले की कम आय को आधार बना लिया।
इसके अलावा पोषण, कपड़ों और कुछ मेडिकल खर्चों से जुड़ी रकम भी अंतिम गणना में शामिल नहीं हो पाई। जिससे मुआवजे की राशि कम रह गई।
सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि मुआवजे की गणना करते समय इन सभी पहलुओं को सही तरीके से शामिल किया जाना चाहिए।
कोर्ट ने भविष्य में कृत्रिम पैर बदलने, उसके रखरखाव और पुनर्वास की जरूरत को भी ध्यान में रखा। इसी कारण भविष्य के मेडिकल खर्च के लिए दी गई 1 लाख रुपये की राशि बढ़ाकर 2 लाख रुपये कर दी गई।
अंतिम फैसला: 100% फंक्शनल डिसेबिलिटी मानकर मुआवजा बढ़ाया
सभी पहलुओं पर विचार करने के बाद सुप्रीम कोर्ट ने यह निष्कर्ष निकाला कि पीड़ित की फंक्शनल डिसेबिलिटी 100% है।
सुप्रीम कोर्ट ने माना कि इस मामले में कमाई की क्षमता में नुकसान का आकलन 70 प्रतिशत नहीं बल्कि 100 प्रतिशत फंक्शनल डिसेबिलिटी के आधार पर होना चाहिए। इसके आधार पर कोर्ट ने मुआवजे की दोबारा गणना की।
कोर्ट ने मासिक आय 12,000 रुपये मानी, उसमें 40% भविष्य की संभावनाएं जोड़ीं और 17 के मल्टीप्लायर को लागू किया। इसके अलावा, कृत्रिम पैर के रखरखाव और भविष्य के इलाज को ध्यान में रखते हुए मेडिकल खर्च की राशि 1 लाख से बढ़ाकर 2 लाख रुपये कर दी।
अंततः कोर्ट ने कुल मुआवजा बढ़ाकर 40,29,730 रुपये कर दिया और बीमा कंपनी को निर्देश दिया कि वह यह राशि 7.5% ब्याज के साथ 6 सप्ताह के भीतर जमा करे।
भविष्य के मामलों के लिए स्पष्ट गाइडलाइन
सुप्रीम कोर्ट का यह फैसला देशभर में लंबित मोटर दुर्घटना मुआवजा मामलों के लिए बेहद अहम है।
कोर्ट ने साफ कर दिया है कि किसी व्यक्ति की चोट का असर केवल मेडिकल रिपोर्ट देखकर नहीं आंका जा सकता। मुआवजा तय करते समय यह भी देखना होगा कि हादसे के बाद उसकी कमाने की क्षमता पर कितना प्रभाव पड़ा है।
यह फैसला खास तौर पर उन लोगों के लिए महत्वपूर्ण है, जिनकी रोजी-रोटी शारीरिक मेहनत वाले काम पर निर्भर करती है। कई बार मेडिकल रिपोर्ट में विकलांगता कम दिखाई देती है, लेकिन चोट इतनी गंभीर होती है कि व्यक्ति अपना पुराना काम ही नहीं कर पाता। कई बार व्यक्ति की चोट उसे उसके रोजगार से पूरी तरह दूर कर देती है, भले ही विकलांगता का प्रतिशत कम बताया गया हो।
सुप्रीम कोर्ट ने अब स्पष्ट कर दिया है कि मुआवजा तय करते समय कोर्टों को केवल मेडिकल रिपोर्ट पर निर्भर नहीं रहना चाहिए, बल्कि यह देखना चाहिए कि पीड़ित की वास्तविक कमाई और पेशे पर क्या असर पड़ा है।
सुप्रीम कोर्ट ने साफ कर दिया है कि ऐसे मामलों में सिर्फ यह नहीं देखा जाएगा कि व्यक्ति कितने प्रतिशत विकलांग हुआ है। यह भी देखा जाएगा कि चोट की वजह से उसकी कमाई और रोजगार पर कितना असर पड़ा है।