जोधपुर। देशभर में चर्चा में रहे राजस्थान के चर्चित एएनएम भंवरी देवी हत्याकांड में हत्या के लगभग 15 वर्ष बीत जाने और राजस्थान हाईकोर्ट के स्पष्ट आदेश के ढाई वर्ष बाद भी मृतका के वारिसों को पेंशन एवं अन्य सेवानिवृत्ति परिलाभ नहीं दिए गए हैं।
राजस्थान हाईकोर्ट ने अब इस मामले में चिकित्सा विभाग की कार्यप्रणाली पर गंभीर नाराजगी जताते हुए राज्य के चिकित्सा एवं स्वास्थ्य विभाग के सचिव के साथ ही पेंशन विभाग और अन्य संबंधित अधिकारियों को अंतिम अवसर दिया है।
हाईकोर्ट ने अपने आदेश में स्पष्ट कहा है कि 18 जुलाई 2026 तक कोर्ट के आदेशों की पूर्ण पालना की जाए।
हाईकोर्ट ने कहा कि अगर ऐसा नहीं होता है तो 21 जुलाई 2026 को चिकित्सा सचिव गायत्री राठौड़, जोधपुर सीएमएचओ डॉ. सुरेन्द्र सिंह शेखावत, चिकित्सा निदेशालय के निदेशक (अराजपत्रित) राकेश कुमार शर्मा, पेंशन विभाग के निदेशक, एलआईसी तथा अन्य संबंधित अधिकारियों को कोर्ट में व्यक्तिगत रूप से उपस्थित होना होगा।
जस्टिस अशोक कुमार जैन की एकलपीठ ने यह महत्वपूर्ण आदेश एस.बी. रिट अवमानना याचिका संख्या 1202/2025 में दिया है।
अवमानना याचिका क्यों दायर करनी पड़ी
यह अवमानना याचिका भंवरी देवी के पुत्र साहिल पेमावत एवं उनकी दोनों बहनों की ओर से अधिवक्ता यशपाल खिलेरी द्वारा दायर की गई।
याचिका में कहा गया कि हाईकोर्ट ने 12 जनवरी 2024 को स्पष्ट आदेश देते हुए चिकित्सा विभाग को निर्देश दिया था कि मृतका भंवरी देवी के समस्त बकाया सेवा परिलाभ, नियमित पेंशन, सेवानिवृत्ति लाभ तथा समस्त एरियर की गणना कर ब्याज सहित चार माह के भीतर भुगतान किया जाए।
याचिकाकर्ताओं का आरोप है कि आदेश पारित होने के लगभग 30 माह बाद भी न तो पेंशन जारी की गई और न ही अन्य सेवानिवृत्ति लाभों का भुगतान किया गया।
बार-बार कोर्ट से समय लेने और पालना रिपोर्ट प्रस्तुत नहीं करने के कारण अंततः कोर्ट ने इसे गंभीरता से लेते हुए अधिकारियों की व्यक्तिगत उपस्थिति के आदेश जारी किए।
15 वर्ष पुराना मामला, लेकिन परिवार आज भी इंतजार में
भंवरी देवी का मामला केवल एक हत्या का मामला नहीं, बल्कि प्रशासनिक संवेदनशीलता की भी परीक्षा बन गया है।
वर्ष 2011 में हुई हत्या के बाद से आज तक मृतका के परिवार को पूर्ण सेवा एवं पेंशन लाभ प्राप्त नहीं हो सके हैं।
याचिका के अनुसार भंवरी देवी चिकित्सा एवं स्वास्थ्य विभाग में महिला स्वास्थ्य कार्यकर्ता (एएनएम) के पद पर कार्यरत थीं।
1 सितंबर 2011 को वे अपनी बेची गई कार की राशि लेने के लिए बिलाड़ा गई थीं, लेकिन वापस नहीं लौटीं। इसके बाद उनके पति अमरचंद ने गुमशुदगी दर्ज कराई।
मामला बाद में राजस्थान हाईकोर्ट में दायर बंदी प्रत्यक्षीकरण याचिका के माध्यम से सामने आया, जिसके बाद जांच सीबीआई को सौंपी गई।
सीबीआई जांच में हत्या का खुलासा
सीबीआई जांच के दौरान यह निष्कर्ष सामने आया कि भंवरी देवी की हत्या कर उनके शव के अवशेष इंदिरा गांधी नहर में बहा दिए गए थे।
जांच एजेंसी ने तत्कालीन राज्य सरकार के कैबिनेट मंत्री, एक विधायक सहित लगभग 13 आरोपियों को गिरफ्तार किया और हत्या सहित विभिन्न धाराओं में आरोप पत्र न्यायालय में प्रस्तुत किया।
यह आपराधिक मामला आज भी विचाराधीन है। मामले में भंवरी देवी के पति अमरचंद को भी भारतीय दंड संहिता की धारा 120-बी के तहत सह-अभियुक्त बनाया गया।
एक ही सरकार के दो अलग-अलग रुख
इस पूरे मामले में सबसे बड़ा विरोधाभास वही है, जिसे याचिकाकर्ताओं ने कोर्ट में मुख्य रूप से उठाया।
याचिका के अनुसार तत्कालीन सीएमएचओ, जोधपुर ने 16 जनवरी 2012 को आदेश जारी कर भंवरी देवी को मृत मानते हुए उनकी सेवा समाप्त कर दी थी।
इसके बाद 28 फरवरी 2012 को चिकित्सा निदेशालय, जयपुर ने भंवरी देवी के पुत्र साहिल पेमावत को अनुकंपा नियुक्ति भी प्रदान कर दी।
विभाग ने एक ओर भंवरी देवी को मृत मानकर सेवा समाप्त की, उनके पुत्र को अनुकंपा नियुक्ति दी, लेकिन दूसरी ओर पेंशन और सेवा परिलाभ जारी करने के समय यह कहकर मामला रोक दिया कि मृत्यु प्रमाण पत्र उपलब्ध नहीं है।
याचिकाकर्ताओं का कहना है कि यदि विभाग ने मृत मानकर सेवा समाप्त कर दी और अनुकंपा नियुक्ति भी दे दी, तो फिर पेंशन के समय मृत्यु को नकारना पूरी तरह विरोधाभासी और असंगत है।
मृत्यु प्रमाण पत्र बना सबसे बड़ी बाधा
याचिकाकर्ताओं ने बताया कि पेंशन प्राप्त करने के लिए उन्होंने मृत्यु प्रमाण पत्र जारी करने हेतु जिला प्रशासन से संपर्क किया।
पहले जिला कलेक्टर, जोधपुर के समक्ष आवेदन किया गया। बाद में अपर कलेक्टर के निर्देश पर मामला तहसीलदार, पीपाड़ सिटी के समक्ष भेजा गया।
लेकिन तहसीलदार ने यह कहते हुए मृत्यु प्रमाण पत्र जारी करने से इनकार कर दिया कि भंवरी देवी की मृत्यु उनके क्षेत्राधिकार में नहीं हुई तथा न ही उनके क्षेत्र में अंतिम संस्कार हुआ।
याचिकाकर्ताओं ने इसे अत्यंत विडंबनापूर्ण स्थिति बताते हुए कहा कि एक ओर सीबीआई हत्या का आरोप पत्र प्रस्तुत कर चुकी है और दूसरी ओर प्रशासनिक स्तर पर मृत्यु ही स्वीकार नहीं की जा रही।
हाईकोर्ट ने पहले ही स्पष्ट कर दिए थे अधिकार
रिट याचिका की सुनवाई के दौरान हाईकोर्ट ने माना कि केवल मृत्यु प्रमाण पत्र के अभाव में मृत कर्मचारी के वैध उत्तराधिकारियों को सेवा परिलाभों से वंचित नहीं रखा जा सकता।
12 जनवरी 2024 को दिए आदेश में राजस्थान हाईकोर्ट ने भंवरी देवी के समस्त सेवा परिलाभों की गणना करने के निर्देश दिए।
हाईकोर्ट ने अपने आदेश में नियमित पेंशन एवं अन्य सेवानिवृत्ति लाभ निर्धारित करने और समस्त एरियर ब्याज सहित वारिसों को देने के आदेश दिए।
हाईकोर्ट ने यह कार्य चार माह में पूर्ण करने के आदेश देते हुए कहा कि आवश्यकता होने पर चिकित्सा विभाग ट्रायल कोर्ट से सर्विस बुक एवं मृत्यु संबंधी आवश्यक दस्तावेज प्राप्त कर सकता है।
इसके बावजूद विभाग द्वारा अपेक्षित कार्रवाई नहीं किए जाने पर अवमानना याचिका दायर की गई।
पति के हिस्से पर भी हाईकोर्ट का स्पष्ट दृष्टिकोण
रिट याचिका में चिकित्सा विभाग ने यह आपत्ति उठाई थी कि भंवरी देवी के सेवा अभिलेखों में उनके पति नामित (Nominee) थे और वह स्वयं हत्या के मामले में सह-अभियुक्त हैं, इसलिए पेंशन जारी नहीं की जा सकती।
इस पर हाईकोर्ट ने संतुलित दृष्टिकोण अपनाते हुए कहा कि पति के हिस्से से संबंधित लाभ उनके विरुद्ध लंबित आपराधिक मुकदमे के परिणाम पर निर्भर करेंगे। यदि वे भविष्य में दोषमुक्त होते हैं, तभी उनके हिस्से पर विचार किया जाएगा।
लेकिन इस आधार पर अन्य वैध वारिसों—पुत्र एवं दोनों पुत्रियों—को उनके अधिकारों से वंचित नहीं किया जा सकता।
सरकार ने कहा प्रस्ताव भेजा
हाईकोर्ट में सुनवाई के दौरान राज्य सरकार की ओर से बताया गया कि प्रस्ताव पेंशन विभाग को भेजा जा चुका है और स्वीकृति लंबित है।
इस पर न्यायालय ने अंतिम अवसर देते हुए कहा कि 18 जुलाई 2026 तक 12 जनवरी 2024 के आदेश की पूर्ण पालना की जाए, अन्यथा 21 जुलाई 2026 को संबंधित अधिकारियों को व्यक्तिगत रूप से उपस्थित होना होगा।