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वकीलों को ब्लैकलिस्ट करने पर सुप्रीम कोर्ट का बड़ा फैसला: बैंक और IBA सिर्फ नेग्लिजेंस के आधार पर नहीं डाल सकते ‘कॉशन लिस्ट’ में नाम, कार्रवाई सिर्फ बार काउंसिल करेगा

Supreme Court Restricts Banks From Blacklisting Advocates Over Professional Negligence

नई दिल्ली: सुप्रीम कोर्ट ने वकीलों के कामकाज और अधिकारों से जुड़े एक अहम मामले में फैसला सुनाते हुए साफ कहा है कि अगर किसी वकील पर सिर्फ नेग्लिजेंस (लापरवाही) या गलत कानूनी राय देने का आरोप है, तो बैंक या इंडियन बैंक्स एसोसिएशन (आईबीए) उसका नाम कॉशन लिस्ट में नहीं डाल सकते।

सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि:

‘कॉशन लिस्ट सिर्फ ऐसे मामलों के लिए बनाई गई है, जिनमें धोखाधड़ी, बेईमानी, आपराधिक कृत्य या बैंकिंग व्यवस्था को नुकसान पहुंचाने जैसा गंभीर मामला हो। अगर किसी वकील के पेशेवर आचरण या नेग्लिजेंस पर सवाल है, तो उसकी जांच और उस पर कार्रवाई करने का अधिकार सिर्फ बार काउंसिल के पास है।’

इसी आधार पर सुप्रीम कोर्ट ने इलाहाबाद हाई कोर्ट का फैसला रद्द कर दिया और बैंक व आईबीए को वकील का नाम कॉशन लिस्ट से तुरंत हटाने का निर्देश दिया।

यह फैसला जस्टिस पी.एस. नरसिम्हा और जस्टिस आलोक आराधे की पीठ ने सुनाया। कोर्ट ने कहा कि किसी बैंक को यह अधिकार जरूर है कि वह किसी वकील को अपने पैनल से हटा दे, लेकिन वह दूसरे बैंकों के बीच उसे अयोग्य या लापरवाह वकील घोषित नहीं कर सकता। ऐसा करना कानून के खिलाफ है और इससे वकील के पेशेवर अधिकारों पर सीधा असर पड़ता है।

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कैसे शुरू हुआ पूरा विवाद?

यह मामला अधिवक्ता अजय विज्ह से जुड़ा है। वह कई बैंकों और वित्तीय संस्थानों के पैनल पर कानूनी सलाहकार के तौर पर काम कर रहे थे। वर्ष 2015 में उन्होंने एक संपत्ति की जांच के बाद कानूनी राय दी थी, जिसके आधार पर बैंक ने करीब दो करोड़ रुपये का ऋण मंजूर किया।

कुछ समय बाद बैंक ने आरोप लगाया कि संपत्ति का एक हिस्सा पहले ही बेचा जा चुका था, लेकिन यह बात कानूनी जांच में सामने नहीं आई। बैंक का कहना था कि इस वजह से उसे वित्तीय जोखिम का सामना करना पड़ा। इसके बाद वर्ष 2019 में बैंक ने अजय विज्ह को अपने पैनल से हटा दिया।

बाद में उनका नाम आईबीए की कॉशन लिस्ट में भी शामिल करा दिया गया। उनके नाम के सामने लिखा गया कि उन्होंने गलत कानूनी राय दी और नेग्लिजेंस की, जिससे बैंक को नुकसान का खतरा हुआ।

अजय विज्ह का कहना था कि कॉशन लिस्ट में नाम डालने से पहले उन्हें कोई नोटिस नहीं दिया गया और न ही अपनी बात रखने का मौका मिला। बाद में जब उन्हें इसका पता चला तो उन्होंने इलाहाबाद हाईकोर्ट में याचिका दायर की। हाईकोर्ट ने यह कहते हुए याचिका खारिज कर दी कि आईबीए संविधान के अनुच्छेद 12 के तहत ‘राज्य’ नहीं है। इसके बाद उन्होंने सुप्रीम कोर्ट का दरवाजा खटखटाया।

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हाईकोर्ट का फैसला क्यों पलटा?

सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि हाईकोर्ट ने मामले को सिर्फ बैंक और वकील के बीच का अनुबंध मानकर देखा, जबकि विवाद इससे कहीं बड़ा था।

कोर्ट ने कहा कि किसी वकील का नाम कॉशन लिस्ट में डालने का असर सिर्फ एक बैंक तक सीमित नहीं रहता। इससे उसकी पेशेवर साख प्रभावित होती है और दूसरे बैंकों में काम मिलने की संभावना भी खत्म हो सकती है। इसलिए यह सीधे तौर पर उसके पेशा करने के अधिकार से जुड़ा मामला है। ऐसे मामलों में हाईकोर्ट अनुच्छेद 226 के तहत सुनवाई कर सकता है। इसी वजह से सुप्रीम कोर्ट ने माना कि याचिका सुनवाई योग्य थी।

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कॉशन लिस्ट का असली मकसद क्या है ?

सुप्रीम कोर्ट ने आरबीआई की गाइडलाइन का विस्तार से अध्ययन किया। कोर्ट ने कहा कि कॉशन लिस्ट का उद्देश्य बैंकों को ऐसे लोगों और संस्थाओं के बारे में सतर्क करना है, जिन्होंने धोखाधड़ी या बैंकिंग व्यवस्था के साथ गंभीर गड़बड़ी की हो।

कोर्ट ने साफ किया कि इस व्यवस्था का इस्तेमाल किसी वकील की पेशेवर क्षमता या कानूनी राय का आकलन करने के लिए नहीं किया जा सकता। अगर किसी वकील की राय गलत साबित होती है या बैंक उसकी सेवा से संतुष्ट नहीं है, तो बैंक उसे अपने पैनल से हटा सकता है। लेकिन सिर्फ इस वजह से उसका नाम कॉशन लिस्ट में डालना कानून के अनुरूप नहीं है।

बिना सुने कार्रवाई करना नियमों के खिलाफ

कोर्ट ने सख्त टिप्पणी करते हुए कहा कि किसी भी व्यक्ति के खिलाफ बिना सुनवाई के कार्रवाई करना न्याय के मूल सिद्धांतों के खिलाफ है। यह “नेचुरल जस्टिस” के सिद्धांत का उल्लंघन है।

सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि हर व्यक्ति को यह अधिकार है कि उसके खिलाफ किसी भी कार्रवाई से पहले उसे अपनी बात रखने का मौका मिले। अगर यह मौका नहीं दिया जाता, तो पूरी प्रक्रिया ही गलत मानी जाएगी।

‘वकीलों पर कार्रवाई का अधिकार सिर्फ काउंसिल के पास’

सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि वकीलों का पेशा बाकी पेशों से अलग है। वकील सिर्फ अपने क्लाइंट के लिए काम नहीं करते, बल्कि न्याय व्यवस्था का भी अहम हिस्सा होते हैं। इसलिए उनके पेशेवर आचरण या नेग्लिजेंस से जुड़े मामलों की जांच और कार्रवाई का अधिकार सिर्फ बार काउंसिल के पास है।

कोर्ट ने कहा कि अगर किसी बैंक को लगता है कि किसी वकील ने पेशेवर गलती की है, तो उसे संबंधित राज्य बार काउंसिल के सामने शिकायत करनी चाहिए। बैंक या आईबीए खुद किसी वकील को पेशेवर रूप से अयोग्य घोषित नहीं कर सकते।

बार काउंसिल को भी दिए अहम निर्देश

सुनवाई के दौरान सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि वकीलों की स्वतंत्रता जितनी जरूरी है, उतनी ही जरूरी उनकी जवाबदेही भी है।

सुप्रीम कोर्ट ने बार काउंसिल ऑफ इंडिया को निर्देश दिया कि वह अपनी अनुशासनात्मक व्यवस्था की समीक्षा करे। इसके लिए एक समिति बनाई जाए, जो यह देखे कि शिकायतों का निपटारा कितनी तेजी से हो रहा है, कितने मामले लंबित हैं और पूरी व्यवस्था कितनी प्रभावी है। समिति की रिपोर्ट के आधार पर जरूरी सुधार भी किए जाएं।

कोर्ट ने कहा कि वकीलों को समय-समय पर नए कानूनों और कानूनी बदलावों की जानकारी मिलती रहनी चाहिए। इसके लिए सुप्रीम कोर्ट ने कंटीन्यूइंग लीगल एजुकेशन (सीएलई) की व्यवस्था शुरू करने का भी निर्देश दिया, ताकि वकील समय-समय पर नए कानूनों और बदलती कानूनी व्यवस्था की जानकारी लेते रहें।

सुप्रीम कोर्ट ने यह भी सुझाव दिया कि जिस तरह जजों के लिए राष्ट्रीय न्यायिक अकादमी है, उसी तरह वकीलों के लिए भी नेशनल लीगल एकेडमी बनाने पर विचार किया जाए।

सुप्रीम कोर्ट का अंतिम आदेश

सुप्रीम कोर्ट ने इलाहाबाद हाईकोर्ट का फैसला रद्द करते हुए अजय विज्ह की अपील स्वीकार कर ली।

कोर्ट ने कहा कि सिर्फ नेग्लिजेंस के आरोप के आधार पर किसी वकील का नाम कॉशन लिस्ट में शामिल नहीं किया जा सकता।
इसके साथ ही बैंक और इंडियन बैंक्स एसोसिएशन (आईबीए) को अजय विज्ह का नाम कॉशन लिस्ट से तुरंत हटाने का निर्देश दिया गया। कोर्ट ने यह भी कहा कि अगर किसी बैंक को किसी वकील के प्रोफेशनल आचरण पर शिकायत है, तो उसे बार काउंसिल के सामने मामला रखना होगा।

साथ ही, बार काउंसिल ऑफ इंडिया को अपनी अनुशासनात्मक व्यवस्था की समीक्षा करने, कंटीन्यूइंग लीगल एजुकेशन शुरू करने और नेशनल लीगल एकेडमी की स्थापना पर विचार करने के निर्देश दिए गए।

इस मामले की अगली सुनवाई 31 अगस्त 2026 को होगी।

वकीलों के लिए अहम फैसला

यह फैसला देशभर के वकीलों के लिए अहम माना जा रहा है।

सुप्रीम कोर्ट के इस फैसले से साफ हो गया है कि किसी वकील के पेशेवर आचरण या नेग्लिजेंस का फैसला बैंक या इंडियन बैंक्स एसोसिएशन (आईबीए) नहीं कर सकते। अगर किसी बैंक को किसी वकील के खिलाफ शिकायत है, तो उसे बार काउंसिल के पास जाना होगा।

यानी अब सिर्फ बैंक के आरोप के आधार पर किसी वकील का नाम कॉशन लिस्ट में नहीं डाला जा सकेगा। कोर्ट ने यह भी स्पष्ट किया कि बैंक अपने पैनल से किसी वकील को हटा सकते हैं, लेकिन उसे पूरे बैंकिंग सिस्टम में पेशेवर रूप से बदनाम नहीं कर सकते।

यह फैसला देशभर के वकीलों के लिए इसलिए अहम है, क्योंकि इससे उनके पेशेवर अधिकारों की सुरक्षा होगी और उनके खिलाफ कार्रवाई तय कानूनी प्रक्रिया के तहत ही की जा सकेगी।

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