जोधपुर। राजस्थान हाईकोर्ट ने जोधपुर नगर निगम की कार्यप्रणाली पर बेहद सख्त टिप्पणी करते हुए एक ऐसे मामले में कड़ा रुख अपनाया है, जिसमें वर्ष 2011 में नगर निगम की नीलामी में सबसे अधिक बोली लगाकर भूखंड प्राप्त करने वाले आवंटियों को 15 वर्ष बीत जाने के बाद भी न तो भूखंड का कब्जा मिला और न ही विधिक प्रक्रिया पूरी की गई।
इतना ही नहीं, हाईकोर्ट में सुनवाई से महज एक दिन पहले निगम ने संबंधित भूखंडों पर कब्जा जमाए बैठे लोगों से सार्वजनिक नोटिस के माध्यम से दस्तावेज मांग लिए, जिस पर राजस्थान हाईकोर्ट ने गंभीर सवाल खड़े किए हैं।
जस्टिस समीर जैन की एकलपीठ ने प्रथम दृष्टया नगर निगम की कार्यप्रणाली को “लचर (Lackadaisical Approach)” बताते हुए नगर निगम आयुक्त, जोधपुर को 20 जुलाई 2026 को दोपहर 2 बजे वीडियो कॉन्फ्रेंसिंग के माध्यम से व्यक्तिगत रूप से पेश होने के आदेश दिए हैं।
इसके साथ ही वर्ष 2011 से अब तक इस पूरे प्रकरण में जिम्मेदार रहे निगम के सभी अधिकारियों (Erring Officers) की सूची भी अदालत में पेश करने का आदेश दिया है।
दो अलग-अलग भूखंड, लेकिन पीड़ा एक जैसी
यह मामला याचिकाकर्ता किरण और संतोष द्वारा दायर दो अलग-अलग याचिकाओं से जुड़ा है। दोनों मामलों में तथ्य लगभग समान हैं।
नगर निगम, जोधपुर ने 16 सितंबर 2011 को कबीर नगर कॉमर्शियल स्कीम के अंतर्गत व्यावसायिक भूखंडों की सार्वजनिक नीलामी का विज्ञापन जारी किया था।
संतोष ने भूखंड संख्या-10 के लिए बोली लगाई और 16,08,000 रुपये की सर्वोच्च बोली लगाकर सफल बोलीदाता घोषित हुए।
वहीं किरण ने भूखंड संख्या-8 के लिए 10,40,000 रुपये की सर्वोच्च बोली लगाई और सफल बोलीदाता बनीं।
दोनों ने नीलामी की शर्तों के अनुसार पहले मौके पर एक-चौथाई राशि जमा कराई और बाद में निर्धारित समयसीमा के भीतर शेष पूरी राशि भी जमा कर दी।
इस प्रकार दोनों भूखंडों का पूरा विक्रय मूल्य वर्ष 2011 में ही नगर निगम को प्राप्त हो गया।
इसके बावजूद आज तक न तो उन्हें भूखंड का वास्तविक कब्जा सौंपा गया और न ही विधिक औपचारिकताएँ पूरी की गईं।
15 वर्षों तक कार्यालयों के चक्कर
रिकॉर्ड के अनुसार वर्ष 2011 से 2015 के बीच नगर निगम ने न तो भूखंडों का सीमांकन कराया और न ही कब्जा दिया।
इसके बाद याचिकाकर्ताओं ने लगातार अधिकारियों के समक्ष लिखित आवेदन दिए—
5 फरवरी 2016 को सीमांकन, कब्जा एवं रजिस्ट्री की मांग की। 26 जुलाई 2016 को पुनः विस्तृत अभ्यावेदन दिया। इसके बाद अधिवक्ता के माध्यम से कानूनी नोटिस भी भेजा, लेकिन कोई जवाब नहीं मिला।
मजबूर होकर वर्ष 2017 में राजस्थान हाईकोर्ट में रिट याचिकाएँ दायर करनी पड़ीं।
याचिकाकर्ता लगभग डेढ़ दशक तक प्रशासनिक अधिकारियों से न्याय की गुहार लगाते रहे, लेकिन उन्हें कोई राहत नहीं मिली।
2022 में पट्टा जारी, लेकिन कब्जा फिर भी नहीं
मामले का सबसे हैरान करने वाला पहलू यह है कि 14 जून 2022 को नगर निगम ने याचिकाकर्ता के पक्ष में पट्टा भी जारी कर दिया, जिससे उसके अधिकारों को स्वयं निगम ने स्वीकार कर लिया।
इसके बावजूद भूखंड का वास्तविक कब्जा नहीं दिया गया।
अर्थात एक ओर निगम आवंटी के अधिकारों को मान्यता देता है और दूसरी ओर उसी भूखंड पर कब्जा दिलाने में वर्षों तक असफल रहता है।
हाईकोर्ट ने पहले भी दिए थे आदेश
वर्ष 2017 में दायर रिट याचिकाओं पर सुनवाई के बाद हाईकोर्ट ने 15 अक्टूबर 2024 को याचिकाकर्ताओं को नगर निगम आयुक्त के समक्ष नया अभ्यावेदन प्रस्तुत करने तथा निगम को निर्धारित अवधि में निर्णय लेने के आदेश दिए थे।
अदालती आदेश के बाद याचिकाकर्ताओं ने 31 मई 2025 को सभी आवश्यक दस्तावेजों सहित विस्तृत अभ्यावेदन भी प्रस्तुत किया।
इसके बावजूद नगर निगम ने न तो कोई निर्णय लिया और न ही भूखंड का कब्जा दिया। मजबूर होकर याचिकाकर्ताओं को फिर से हाईकोर्ट की शरण लेनी पड़ी।
सुनवाई से एक दिन पहले सार्वजनिक नोटिस
मामले में सबसे महत्वपूर्ण घटनाक्रम तब सामने आया जब राजस्थान हाईकोर्ट में सुनवाई से ठीक एक दिन पहले 5 जुलाई 2026 को नगर निगम ने स्थानीय समाचार पत्र में सार्वजनिक सूचना प्रकाशित कर दी।
इस नोटिस में संबंधित भूमि पर मौजूद लोगों से दस्तावेज प्रस्तुत करने को कहा गया।
याचिकाकर्ताओं की ओर से अधिवक्ता रिषी सोनी ने अदालत में तर्क दिया कि जिन भूखंडों की नीलामी वर्ष 2011 में हो चुकी है, जिनकी पूरी राशि जमा है और जिनके संबंध में नगर निगम स्वयं अधिकार स्वीकार कर चुका है, उन भूखंडों पर कब्जा किए बैठे लोगों से दस्तावेज मांगना अतिक्रमणकारियों को संरक्षण देने जैसा है।
याचिकाकर्ता की ओर से यह भी कहा गया कि यदि भूमि पहले से आवंटित है तो अतिक्रमणकारियों को हटाने के बजाय उनसे दस्तावेज मांगना पूरी प्रक्रिया पर गंभीर प्रश्नचिह्न खड़ा करता है।
हाईकोर्ट का तीखा सवाल-क्या अवैध कब्जे को वैध बनाने की कोशिश?
सुनवाई के दौरान नगर निगम ने कहा कि भूमि पर अतिक्रमण हो चुका था और इसी कारण सार्वजनिक सूचना जारी की गई।
लेकिन जस्टिस समीर जैन ने इस दलील को स्वीकार नहीं किया।
कोर्ट ने पूछा कि यदि भूमि नगर निगम की थी तो 15 वर्षों तक अतिक्रमण क्यों होने दिया? अतिक्रमण हटाने की कार्रवाई क्यों नहीं की गई? संबंधित व्यक्तियों को विधिवत अतिक्रमण हटाने के नोटिस क्यों नहीं दिए गए?
केवल समाचार पत्र में सार्वजनिक सूचना प्रकाशित करने से क्या अवैध कब्जा वैध हो जाएगा?
हाईकोर्ट ने स्पष्ट संकेत दिए कि केवल सार्वजनिक नोटिस जारी करना पर्याप्त कार्रवाई नहीं माना जा सकता।
“भूमि के संरक्षक होकर भी जिम्मेदारी नहीं निभाई”
सुनवाई के दौरान नगर निगम के अधिवक्ता अदालत को यह नहीं बता सके कि अतिक्रमण हटाने के लिए अब तक कौन-कौन से ठोस कदम उठाए गए।
कोर्ट ने टिप्पणी की कि नगर निगम स्वयं उस भूमि का संरक्षक (Custodian) है। ऐसे में यदि वर्षों तक अतिक्रमण होता रहा तो यह प्रशासनिक विफलता का गंभीर उदाहरण है।
अदालत ने यह भी कहा कि रिकॉर्ड से प्रथम दृष्टया प्रतीत होता है कि संबंधित अधिकारियों ने अपने कर्तव्यों का प्रभावी ढंग से निर्वहन नहीं किया।
2011 से अब तक के सभी अधिकारियों की सूची मांगी
हाईकोर्ट ने आदेश दिया कि वर्ष 2011 से अब तक इस प्रकरण में पदस्थ सभी जिम्मेदार अधिकारियों के नाम प्रस्तुत किए जाएं।
उन अधिकारियों का भी विवरण दिया जाए जिन्होंने अतिक्रमण हटाने की कार्रवाई करने के बजाय केवल सार्वजनिक नोटिस जारी करने का निर्णय लिया।
यह भी स्पष्ट किया जाए कि इतने वर्षों तक कार्रवाई क्यों नहीं हुई।
आयुक्त को व्यक्तिगत रूप से तलब
हाईकोर्ट ने मामले की गंभीरता को देखते हुए नगर निगम आयुक्त, जोधपुर को 20 जुलाई 2026 को वीडियो कॉन्फ्रेंसिंग के माध्यम से व्यक्तिगत रूप से उपस्थित होने का आदेश दिया है।
आयुक्त को यह स्पष्ट करना होगा कि जिम्मेदार अधिकारियों को नामजद पक्षकार क्यों न बनाया जाए। उनके विरुद्ध विभागीय अनुशासनात्मक कार्रवाई क्यों न प्रारंभ की जाए। 15 वर्षों तक आवंटियों को कब्जा क्यों नहीं दिया गया।