टॉप स्टोरी

चर्चित खबरें

‘कमर्शियल मुकदमों में समय-सीमा का पालन जरूरी’: सुप्रीम कोर्ट का बड़ा फैसला, ‘दस्तावेज ज्यादा थे’ कहकर देर से सबूत पेश करने की छूट नहीं, टुकड़ों में साक्ष्य लाने पर भी रोक

Supreme Court Rules Against Delayed and Piecemeal Evidence in Commercial Litigation

नई दिल्ली: सुप्रीम कोर्ट ने कमर्शियल कोर्ट्स एक्ट, 2015 के तहत चलने वाले कमर्शियल मुकदमों पर बड़ा फैसला सुनाया है। कोर्ट ने साफ कहा कि सिर्फ यह कहकर देर से दस्तावेज पेश नहीं किए जा सकते कि रिकॉर्ड बहुत बड़ा था या दस्तावेज ज्यादा थे। इसे कानून के तहत वैध कारण (रीज़नेबल कॉज) नहीं माना जाएगा।

सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि कमर्शियल मुकदमों में ‘स्टॉप एंड गो’ या टुकड़ों में सबूत पेश करने की प्रवृत्ति को किसी भी हाल में स्वीकार नहीं किया जा सकता। कोर्ट ने स्पष्ट किया कि कमर्शियल मुकदमों में पक्षकार टुकड़ों-टुकड़ों में साक्ष्य पेश नहीं कर सकते। सभी जरूरी दस्तावेज समय पर रिकॉर्ड पर लाना उनकी जिम्मेदारी है।

जस्टिस संजय करोल और जस्टिस एन. कोटिश्वर सिंह की पीठ ने यह अहम टिप्पणी करते हुए एक अपील को खारिज कर दिया, जिसमें दिल्ली हाईकोर्ट के उस आदेश को चुनौती दी गई थी, जिसमें हाईकोर्ट ने अतिरिक्त दस्तावेज़ रिकॉर्ड पर लेने से इनकार कर दिया गया था।

सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि:

कमर्शियल कोर्ट्स एक्ट का उद्देश्य बड़े व्यावसायिक विवादों का जल्द निपटारा करना है। ऐसे में मुकदमे को बार-बार नए दस्तावेज जोड़कर आगे बढ़ाने की अनुमति नहीं दी जा सकती। इसलिए सभी जरूरी दस्तावेज शुरुआत में ही रिकॉर्ड पर लाने चाहिए, ताकि सुनवाई में अनावश्यक देरी न हो।

यह भी पढ़ें: मेडिकली फिट महिला को ट्रेनिंग से क्यों रोकें?: महिला IPS अधिकारियों की मेटरनिटी पॉलिसी पर सुप्रीम कोर्ट ने उठाए सवाल, प्रसव के बाद 1 साल की रोक वाली नीति पर केंद्र से मांगा जवाब

मोबाइल ऐप विवाद से शुरू हुआ मामला

यह मामला लेविटेट मोबाइल टेक्नोलॉजीज प्राइवेट लिमिटेड (एलएमटी) और स्टैंडर्ड चार्टर्ड बैंक के बीच हुए एक व्यावसायिक विवाद से जुड़ा है।

दोनों पक्षों के बीच वर्ष 2013 में एक मोबाइल ऐप बनाने का समझौता हुआ था। ऐप तैयार होकर लॉन्च भी हो गया, लेकिन कुछ समय बाद स्टैंडर्ड चार्टर्ड बैंक ने उसे हटाने के निर्देश दे दिए। इसके बाद दोनों के बीच भुगतान और रेवेन्यू शेयरिंग को लेकर विवाद शुरू हो गया।

कंपनी ने वर्ष 2015 में दिल्ली हाईकोर्ट में मुकदमा दायर किया। बाद में कमर्शियल कोर्ट्स एक्ट लागू होने के बाद यह मामला कमर्शियल सूट में बदल गया। इस दौरान कोर्ट ने एक बार कंपनी को कुछ अतिरिक्त दस्तावेज रिकॉर्ड पर लाने की अनुमति भी दी थी।

यह भी पढ़ें: ‘सिर्फ जानलेवा चोट लगने से नहीं बनेगा हत्या के प्रयास का केस’: सुप्रीम कोर्ट ने बताया कब लगेगी धारा 307, कहा- हर गंभीर हमला हत्या का प्रयास नहीं, आरोपी की मंशा भी साबित करनी होगी

कंपनी ने नए दस्तावेज पेश करने की अनुमति क्यों मांगी?

मुख्य गवाह की जिरह पूरी होने के बाद कंपनी ने दोबारा आवेदन देकर कुछ और दस्तावेज रिकॉर्ड पर लाने की मांग की। इनमें ई-मेल, वेंडर एग्रीमेंट और सर्वर का बैकएंड डेटा शामिल था। साथ ही कंपनी ने मुख्य गवाह को दोबारा बुलाकर उनसे इन दस्तावेजों पर गवाही कराने की भी मांग की।

कंपनी ने दलील दी कि रिकॉर्ड काफी वॉल्यूमिनस था और दोनों पक्षों के बीच बड़ी संख्या में ई-मेल हुए थे। इसी वजह से सभी दस्तावेज पहले पेश नहीं किए जा सके। कंपनी का यह भी कहना था कि गवाह की जिरह के दौरान कुछ नई बातें सामने आईं, जिसके बाद इन दस्तावेजों की जरूरत महसूस हुई।

हाईकोर्ट ने क्यों ठुकराई थी अर्जी?

हालांकि, दिल्ली हाईकोर्ट ने फरवरी 2025 में इस दूसरी अर्जी को खारिज कर दिया। कोर्ट का मानना था कि अपीलकर्ता को पहले ही पर्याप्त अवसर दिया जा चुका है और अब इस तरह से बार-बार नए दस्तावेज़ पेश करना न्यायिक प्रक्रिया को अनावश्यक रूप से लंबा करना है।

हाईकोर्ट ने यह भी कहा कि कंपनी स्पष्ट तरीके से यह नहीं बता सकी कि दस्तावेज पहले क्यों पेश नहीं किए गए।

इसके बाद कंपनी सुप्रीम कोर्ट पहुंची और हाईकोर्ट के इस फैसले को सुप्रीम कोर्ट में चुनौती दी गई थी।

सुप्रीम कोर्ट ने देर से दस्तावेज पेश करने की दलील ठुकराई

सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि कमर्शियल कोर्ट्स एक्ट और सिविल प्रक्रिया संहिता के संशोधित प्रावधानों के अनुसार अपीलकर्ता को अपने पास मौजूद सभी जरूरी दस्तावेज मुकदमा दायर करते समय ही रिकॉर्ड पर रखने चाहिए।

अगर बाद में कोई अतिरिक्त दस्तावेज पेश करने हों, तो उसके लिए यह बताना जरूरी है कि वे पहले क्यों पेश नहीं किए जा सके। इसके लिए (रीजनेबल कॉज यानी वैध कारण साबित करना जरूरी है।

कोर्ट ने कहा कि इस मामले में कंपनी यह साबित नहीं कर सकी कि दस्तावेज पहले पेश न कर पाने की कोई ठोस वजह थी। रिकॉर्ड बड़ा होना या ई-मेल की संख्या अधिक होना अपने-आप में ऐसा कारण नहीं माना जा सकता, जिसके आधार पर सालों बाद नए दस्तावेज रिकॉर्ड पर लेने की अनुमति दी जाए।

‘टुकड़ों-टुकड़ों में साक्ष्य पेश करने की अनुमति नहीं’

सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि जब कोई अपीलकर्ता अपना पक्ष रखता है, तब उसे केवल दस्तावेज पेश करना ही नहीं होता, बल्कि यह भी ध्यान रखना होता है कि दूसरी ओर से गवाहों से किस तरह के सवाल पूछे जा सकते हैं। बाद में यह कहना कि जिरह के दौरान कुछ नई बातें सामने आईं, इसलिए नए दस्तावेज लाने की जरूरत पड़ गई, स्वीकार नहीं किया जा सकता।

सुप्रीम कोर्ट ने स्पष्ट कहा कि कमर्शियल मुकदमों में “स्टॉप एंड गो” या टुकड़ों-टुकड़ों में साक्ष्य पेश करने का तरीका स्वीकार नहीं किया जा सकता। अगर ऐसा होने लगे, तो मुकदमे अनावश्यक रूप से लंबे खिंचेंगे और कमर्शियल कोर्ट्स एक्ट का मकसद ही खत्म हो जाएगा।

कमर्शियल कोर्ट्स एक्ट की मंशा भी समझाई

सुप्रीम कोर्ट ने यह भी समझाया कि कमर्शियल कोर्ट्स एक्ट का उद्देश्य क्या है और इसमें समय-सीमा को इतना महत्व क्यों दिया गया है।

कोर्ट ने कहा कि कमर्शियल कोर्ट्स एक्ट इसलिए बनाया गया है, ताकि कारोबार से जुड़े बड़े विवादों का तेजी से निपटारा हो सके। इसी वजह से इस कानून में समय-सीमा और प्रक्रिया को लेकर सख्त नियम बनाए गए हैं।

कोर्ट ने कहा कि कमर्शियल मुकदमों में बार-बार नए दस्तावेज रिकॉर्ड पर लाने की छूट नहीं दी जा सकती। ऐसा होने पर सुनवाई में अनावश्यक देरी होगी और कमर्शियल कोर्ट्स एक्ट के तहत मुकदमों का तेजी से निपटारा करने का उद्देश्य पूरा नहीं हो सकेगा।

पहले भी मिल चुका था अतिरिक्त दस्तावेज पेश करने का मौका

सुप्रीम कोर्ट ने यह भी माना कि कंपनी को पहले ही एक बार अतिरिक्त दस्तावेज रिकॉर्ड पर लाने की अनुमति मिल चुकी थी। जिन दस्तावेजों को दूसरी बार पेश करने की मांग की गई, वे भी शुरू से कंपनी के पास मौजूद थे। इसके बावजूद कंपनी ने पांच साल बाद फिर उसी तरह का आवेदन दिया।

कोर्ट ने कहा कि अगर इस तरह की अनुमति दी गई, तो पक्षकार बार-बार नए दस्तावेज पेश करते रहेंगे। इससे कमर्शियल मुकदमों की सुनवाई टुकड़ों-टुकड़ों में आगे बढ़ेगी, जबकि कानून इसकी अनुमति नहीं देता।

सुप्रीम कोर्ट का अंतिम फैसला

सुप्रीम कोर्ट ने दिल्ली हाईकोर्ट के फैसले को सही ठहराते हुए कंपनी की अपील खारिज कर दी।

कोर्ट ने कहा कि कंपनी देर से दस्तावेज पेश करने का कोई उचित कारण नहीं बता सकी। इसलिए अतिरिक्त दस्तावेज रिकॉर्ड पर लेने और गवाह को दोबारा बुलाने की अनुमति नहीं दी जा सकती।

हालांकि, कोर्ट ने यह भी निर्देश दिया कि अब इस कमर्शियल मुकदमे का जल्द से जल्द निपटारा किया जाए।

इसका मतलब है कि अब अपीलकर्ता को अतिरिक्त दस्तावेज रिकॉर्ड पर लाने की अनुमति नहीं मिलेगी।

कमर्शियल मुकदमों के लिए अहम फैसला

सुप्रीम कोर्ट के इस फैसले ने साफ कर दिया है कि कमर्शियल कोर्ट्स एक्ट के तहत तय समय-सीमा और प्रक्रिया का सख्ती से पालन करना जरूरी है।

अगर किसी पक्ष के पास दस्तावेज पहले से मौजूद हैं, तो केवल यह कहकर कि रिकॉर्ड बहुत बड़ा था या दस्तावेजों की संख्या अधिक थी, उन्हें सालों बाद रिकॉर्ड पर लाने की अनुमति नहीं मिल सकती।

यह फैसला उन सभी व्यावसायिक मुकदमों के लिए अहम है, जहां सुनवाई के दौरान बार-बार नए दस्तावेज पेश करने की कोशिश की जाती है।

सबसे अधिक लोकप्रिय