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कर्ज वसूली पर सुप्रीम कोर्ट का बड़ा फैसला: कई मौके मिलने के बाद भी कर्ज नहीं चुकाया तो सिर्फ ‘फेयरनेस’ के नाम पर वैध नीलामी रद्द नहीं होगी, डिफॉल्टर उधारकर्ताओं को राहत नहीं

Supreme Court Upholds Mineral ASP Calculation Rules, Rejects Kirloskar Ferrous Challenge

नई दिल्ली: सुप्रीम कोर्ट ने सरकारी वित्तीय संस्थाओं से लिए गए कर्ज और उसकी वसूली को लेकर बड़ा फैसला सुनाते हुए कहा है कि बार-बार डिफॉल्ट करने वाले उधारकर्ता सिर्फ “फेयरनेस” का हवाला देकर वैध नीलामी रद्द नहीं करा सकते।

सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि सरकारी वित्तीय संस्थाएं सार्वजनिक धन से काम करती हैं। इसलिए उनसे निष्पक्ष व्यवहार की अपेक्षा जरूर है, लेकिन इसका मतलब यह नहीं कि उन्हें अपना बकाया वसूलने से ही रोक दिया जाए।

अगर संस्था ने कानून के तहत कार्रवाई की है और धोखाधड़ी, मिलीभगत या स्पष्ट कानूनी उल्लंघन साबित नहीं होता, तो सालों बाद नीलामी रद्द नहीं की जा सकती।

जस्टिस संजय करोल और जस्टिस एन. कोटिश्वर सिंह की बेंच ने यह फैसला बिहार स्टेट फाइनेंशियल कॉरपोरेशन (बीएसएफसी) की अपील पर सुनाया।

कोर्ट ने पटना हाईकोर्ट और ट्रायल कोर्ट के फैसले पलटते हुए वर्ष 1996 की नीलामी को वैध ठहराया और कहा कि दोनों निचली कोर्टों ने मामले के तथ्यों और कानून का सही तरीके से मूल्यांकन नहीं किया।

क्या था पूरा मामला?

मामला बिहार के रणजीत मोटेल से जुड़ा है। मोटेल संचालकों ने उद्योग स्थापित करने के लिए बिहार स्टेट फाइनेंशियल कॉरपोरेशन से पहले 8.50 लाख रुपये और बाद में 3.15 लाख रुपये का ऋण लिया था।

इसके बदले उन्होंने अपनी जमीन और भवन गिरवी रख दिए। कुछ समय बाद उधारकर्ताओं ने किस्तें चुकाना बंद कर दिया।

इसके बाद बिहार स्टेट फाइनेंशियल कॉरपोरेशन ने स्टेट फाइनेंशियल कॉरपोरेशंस एक्ट, 1951 की धारा 29 के तहत नोटिस जारी कर बकाया चुकाने को कहा।

उधारकर्ताओं ने इस नोटिस को पटना हाईकोर्ट में चुनौती दी। हाईकोर्ट ने उन्हें राहत देते हुए कर्ज चुकाने के लिए किस्तों में भुगतान करने का मौका दिया और पूरा भुगतान कैसे होगा, इसका एक शेड्यूल भी तय कर दिया।

साथ ही साफ कर दिया कि यदि तय समय पर भुगतान नहीं हुआ तो बीएसएफसी गिरवी संपत्ति बेच सकती है।

लेकिन तय समय के भीतर भी उधारकर्ताओं ने कर्ज नहीं चुकाया। बाद में उन्होंने भुगतान के लिए और समय मांगा, लेकिन हाईकोर्ट ने यह कहते हुए उनकी मांग ठुकरा दी कि उनके आचरण को देखते हुए उन्हें और राहत नहीं दी जा सकती।

इसके बाद बीएसएफसी ने दोबारा नोटिस जारी किया और अंततः साल 1996 में सार्वजनिक विज्ञापन निकालकर गिरवी संपत्ति की नीलामी कर दी। हालांकि, नीलामी के बाद भी उधारकर्ताओं ने कई मुकदमे दायर कर पूरी प्रक्रिया को चुनौती दी।

दो कोर्टों ने रद्द की थी नीलामी, मामला पहुंचा सुप्रीम कोर्ट

ट्रायल कोर्ट ने माना कि बीएसएफसी के पास संपत्ति बेचने का अधिकार था, लेकिन यह कहते हुए नीलामी रद्द कर दी कि संपत्ति का स्वतंत्र मूल्यांकन नहीं कराया गया, रिजर्व प्राइस सही तरीके से तय नहीं हुई और पूरी प्रक्रिया निष्पक्ष नहीं थी।

हाईकोर्ट ने भी इसी आधार पर ट्रायल कोर्ट का फैसला बरकरार रखा।

इसके खिलाफ बिहार स्टेट फाइनेंशियल कॉरपोरेशन और नीलामी खरीदार सुप्रीम कोर्ट पहुंचे।

‘फेयरनेस’ सिर्फ उधारकर्ता के लिए नहीं हो सकती: सुप्रीम कोर्ट

सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि इस मामले में उधारकर्ताओं को कई बार मौका दिया गया। पहले हाईकोर्ट ने भुगतान का पूरा शेड्यूल तय किया, फिर समय बढ़ाने की मांग पर विचार हुआ, उसके बाद बीएसएफसी ने दोबारा नोटिस दिया और यहां तक कि नीलामी शुरू होने के बाद भी उधारकर्ताओं को वही शर्तें स्वीकार कर संपत्ति बचाने का अवसर दिया गया। इसके बावजूद उन्होंने बकाया नहीं चुकाया।

कोर्ट ने कहा कि ऐसे मामलों में केवल यह कहना कि वित्तीय संस्था ने पूरी निष्पक्षता नहीं बरती, पर्याप्त नहीं है।

सुप्रीम कोर्ट ने अपने पुराने फैसलों का हवाला देते हुए दोहराया कि “फेयरनेस इज नॉट ए वन-वे स्ट्रीट” यानी निष्पक्षता सिर्फ उधारकर्ता के हित में नहीं हो सकती। कोर्ट ने कहा कि निष्पक्षता (फेयरनेस) का सिद्धांत दोनों पक्षों पर समान रूप से लागू होता है। सरकारी वित्तीय संस्थाएं सार्वजनिक धन से काम करती हैं और उनका बकाया वसूलना भी उतना ही जरूरी है।

अगर कोई उधारकर्ता बार-बार मौका मिलने के बाद भी कर्ज नहीं चुकाता, तो सिर्फ ‘फेयरनेस’ का हवाला देकर संस्था की वैध कार्रवाई पर रोक नहीं लगाई जा सकती। यदि उधारकर्ता अपनी जिम्मेदारियां लगातार निभाने में विफल रहता है, तो संस्था के हाथ केवल “फेयरनेस” के नाम पर नहीं बांधे जा सकते।

‘सार्वजनिक धन की वसूली रोकना भी न्यायसंगत नहीं’

सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि राज्य वित्तीय निगम कोई सामान्य निजी साहूकार नहीं हैं। उनका काम छोटे और मध्यम उद्योगों को वित्तीय मदद देना है। इसके लिए वे सार्वजनिक धन का इस्तेमाल करते हैं।

अगर डिफॉल्टरों से समय पर बकाया नहीं वसूला जाएगा, तो दूसरे जरूरतमंद उद्यमियों को भी ऋण देना मुश्किल हो जाएगा। इसलिए कानून उधारकर्ताओं के अधिकारों के साथ-साथ सार्वजनिक धन की सुरक्षा को भी समान महत्व देता है।

सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि वित्तीय संस्थाओं के व्यावसायिक फैसलों में कोर्ट को हर बार दखल नहीं देना चाहिए। अगर संस्था ने कानून का पालन किया है और उसकी कार्रवाई में मनमानी, दुर्भावना या किसी तरह की कानूनी गड़बड़ी साबित नहीं होती, तो उसकी कार्रवाई को रद्द नहीं किया जा सकता।

सिर्फ वैल्यूएशन रिपोर्ट नहीं होने से नीलामी रद्द नहीं होगी

सुप्रीम कोर्ट ने माना कि नीलामी से पहले संपत्ति का स्वतंत्र मूल्यांकन (वैल्यूएशन) नहीं कराया गया था। लेकिन कोर्ट ने साफ किया कि सिर्फ इसी एक वैल्यूएशन रिपोर्ट की कमी के आधार पर पूरी नीलामी को अवैध नहीं ठहराया जा सकता।

कोर्ट ने कहा कि जब नीलामी की प्रक्रिया चल रही थी, तब उधारकर्ताओं ने संपत्ति के मूल्यांकन पर कोई आपत्ति नहीं उठाई। इतना ही नहीं, उन्होंने खुद भी नीलामी खरीदार जैसी शर्तों पर संपत्ति अपने पास रखने की इच्छा जताई थी। ऐसे में कई साल बाद सिर्फ मूल्यांकन रिपोर्ट का मुद्दा उठाकर पूरी नीलामी रद्द नहीं कराई जा सकती।

कर्ज चुकाने के बजाय मुकदमों का सहारा लिया

सुप्रीम कोर्ट ने उधारकर्ताओं के रवैये पर भी टिप्पणी की। कोर्ट ने कहा कि उधारकर्ताओं ने बकाया चुकाने के बजाय वर्षों तक अलग-अलग मुकदमे दायर कर वसूली की कार्रवाई टालने की कोशिश की। उन्होंने पहले नीलामी के नोटिस को चुनौती दी, फिर भुगतान के लिए और समय मांगा, उसके बाद सिविल मुकदमा और कई रिट याचिकाएं दायर कीं। लेकिन इस दौरान कर्ज चुकाने की कोई गंभीर कोशिश नहीं की।

कोर्ट ने कहा कि कानूनी प्रक्रिया का इस्तेमाल सिर्फ बकाया वसूली टालने के लिए नहीं किया जा सकता। जो लोग ईमानदारी से अपनी जिम्मेदारियां निभाने की कोशिश करते हैं, कानून उनकी मदद करता है, लेकिन बार-बार मुकदमे दायर कर सिर्फ समय निकालने वालों को राहत नहीं दी जा सकती।

धोखाधड़ी या मिलीभगत साबित नहीं हुई: सुप्रीम कोर्ट

उधारकर्ताओं ने यह भी आरोप लगाया था कि नीलामी खरीदार और बीएसएफसी के बीच पहले से मिलीभगत थी। लेकिन सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि रिकॉर्ड में ऐसा कोई ठोस सबूत नहीं है जिससे धोखाधड़ी या मिलीभगत साबित होती हो।

कोर्ट ने कहा कि केवल यह तथ्य कि किसी व्यक्ति ने पहले संपत्ति खरीदने में रुचि दिखाई थी, अपने-आप मिलीभगत साबित नहीं करता। सार्वजनिक विज्ञापन जारी हुआ, बोली की प्रक्रिया अपनाई गई और खरीदार लगभग 30 वर्षों से संपत्ति पर कब्जे में है। इतने लंबे समय बाद बिना किसी ठोस अवैधता या धोखाधड़ी के नीलामी रद्द नहीं की जा सकती।

सुप्रीम कोर्ट ने क्या फैसला दिया?

सुप्रीम कोर्ट ने पटना हाईकोर्ट और ट्रायल कोर्ट के फैसले रद्द करते हुए वर्ष 1996 की नीलामी को वैध घोषित कर दिया।

सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि इस मामले में बिहार स्टेट फाइनेंशियल कॉरपोरेशन ने कानून के तहत अपने अधिकारों का इस्तेमाल किया था। रिकॉर्ड से यह साबित नहीं होता कि नीलामी की प्रक्रिया मनमानी, अनुचित या कानून के खिलाफ थी।

हालांकि, सुप्रीम कोर्ट ने यह भी माना कि इस मामले में सिविल मुकदमा दायर करने पर कोई कानूनी रोक नहीं थी। यानी ‘रेस जुडीकाटा’ का सिद्धांत और पार्टनरशिप एक्ट की धारा 69(2) यहां लागू नहीं होती थी। इस मुद्दे पर निचली कोर्टों की राय सही थी। लेकिन केवल इसी आधार पर नीलामी रद्द करना कानून के अनुरूप नहीं था।

फैसले का क्या असर पड़ेगा?

सुप्रीम कोर्ट का यह फैसला राज्य वित्तीय निगमों और अन्य सरकारी वित्तीय संस्थाओं के लिए अहम है।

कोर्ट ने स्पष्ट कर दिया है कि यदि किसी डिफॉल्टर को बार-बार मौका देने के बाद भी वह कर्ज नहीं चुकाता, तो कानून के तहत की गई नीलामी को केवल तकनीकी आपत्तियों या “फेयरनेस” के सामान्य तर्क के आधार पर आसानी से रद्द नहीं किया जा सकता।

साथ ही यह भी स्पष्ट किया गया है कि कोर्ट वित्तीय संस्थाओं के व्यावसायिक फैसलों में तभी हस्तक्षेप करेंगे, जब कानून का स्पष्ट उल्लंघन, दुर्भावना, मनमानी, धोखाधड़ी या गंभीर अनियमितता साबित हो।

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