नई दिल्ली: सुप्रीम कोर्ट ने दहेज प्रताड़ना और मौत के 26 साल पुराने मामले में बड़ा फैसला सुनाते हुए स्पष्ट कर दिया है कि किसी शख्स को महज आरोपों के आधार पर दोषी नहीं ठहराया जा सकता।
अगर प्रॉसिक्यूशन (अभियोजन पक्ष) के पास आरोप साबित करने के लिए ठोस और भरोसेमंद सबूत नहीं हैं और बचाव पक्ष (आरोपी पक्ष) की ओर से पेश किए गए सबूत मामले में संदेह पैदा करते हैं, और उसकी बेगुनाही की संभावना दिखाते हैं, तो उसका लाभ आरोपी को मिलेगा।
सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि सिर्फ संदेह के आधार पर किसी आरोपी को दोषी नहीं ठहराया जा सकता, जब तक कि सबूत पूरी तरह पुख्ता और बिना किसी शक के न हों।
सुप्रीम कोर्ट कोर्ट ने कहा कि :
किसी आपराधिक मुकदमे में केवल प्रॉसिक्यूशन के सबूतों पर ही भरोसा नहीं किया जा सकता। अगर बचाव पक्ष भी भरोसेमंद गवाह और दस्तावेज पेश करता है, तो कोर्ट को उनका भी उतनी ही गंभीरता से मूल्यांकन करना होगा। केवल इसलिए उन्हें नजरअंदाज नहीं किया जा सकता कि वे आरोपी की ओर से पेश किए गए हैं।
जस्टिस संजय कुमार और जस्टिस के. विनोद चंद्रन की बेंच ने इस दहेद मृत्यु मामले में सेशन कोर्ट की दोषसिद्धि और पटना हाईकोर्ट के रिमांड आदेश, दोनों को रद्द करते हुए आरोपी पति को बरी कर दिया।
कोर्ट ने कहा कि सरकारी पक्ष आरोपों को पुख्ता सबूतों से साबित नहीं कर सका।
वहीं, बचाव पक्ष ने ऐसे गवाह और दस्तावेज पेश किए, जिन्होंने आरोपों पर ही गंभीर सवाल खड़े कर दिए। ऐसे में आरोपी को दोषी ठहराए रखना सही नहीं था, क्योंकि ये कानून के सिद्धांतों के खिलाफ होगा।
सुप्रीम कोर्ट ने पुलिस जांच पर भी गंभीर सवाल उठाए। कोर्ट ने कहा कि न तो मृतक महिला का पोस्टमार्टम कराया गया, न अस्पतालों से जरूरी रिकॉर्ड जुटाए गए और न ही जांच अधिकारी ने उन अहम तथ्यों की पड़ताल की, जो घटना की सच्चाई सामने ला सकते थे।
कोर्ट ने माना कि इतनी गंभीर कमियों के बावजूद आरोपी को दोषी ठहराना न्याय के खिलाफ होगा।
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एक FIR, दो चार्जशीट से उलझा मामला
मामला बिहार के दहेज प्रताड़ना और दहेज मृत्यु से जुड़ा है। जहां आरोपी ब्रजेश कुमार पर पत्नी को दहेज के लिए प्रताड़ित करने और उसकी मौत के लिए जिम्मेदार होने का आरोप लगाया गया था।
आरोपी ब्रजेश कुमार की शादी वर्ष 1995 में हुई थी। मृतक महिला के परिवार का आरोप था कि शादी के बाद से ही 50 हजार दहेज की मांग को लेकर उसे प्रताड़ित किया जाता था।
13 अप्रैल 2000 को महिला अपने ससुराल में आग से झुलस गई और इलाज के दौरान 2 मई 2000 को उसकी मौत हो गई।
महिला के पिता की शिकायत पर बिहार के मुंगेर में एफआईआर दर्ज हुई, जिसमें पति समेत परिवार के 17 लोगों को आरोपी बनाया गया। पुलिस ने दहेज मृत्यु, क्रूरता और दहेज निषेध कानून के तहत मामला दर्ज कर जांच शुरू की।
इस मामले की सबसे असामान्य बात यह रही कि जांच के दौरान एक ही एफआईआर पर दो अलग-अलग चार्जशीट दाखिल हुईं।
पहली चार्जशीट में 17 लोगों के खिलाफ अपराध बनता बताया गया, लेकिन केवल सास और ससुर के खिलाफ आरोपपत्र दायर किया गया।
बाद में दूसरी जांच में पति समेत बाकी आरोपियों के खिलाफ अलग कार्रवाई हुई। बाद में सास-ससुर और परिवार के अन्य सदस्य बरी हो गए, जबकि केवल पति को दोषी ठहराया गया।
इसी फैसले को सुप्रीम कोर्ट में चुनौती दी गई।
अधूरी जांच के आधार पर नहीं हो सकती दोषसिद्धि
सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि इस मामले की जांच में कई बड़ी खामियां थीं। सबसे बड़ी कमी यह रही कि महिला की मौत के बाद उसका पोस्टमार्टम ही नहीं कराया गया।
ऐसे में यह पता लगाने का सबसे अहम सबूत ही सामने नहीं आ सका कि उसकी मौत हादसे में हुई थी, आत्महत्या थी या फिर किसी ने उसकी हत्या की थी।
कोर्ट ने कहा कि महिला का पहले मिर्जापुर और फिर प्रयागराज के अस्पताल में इलाज हुआ था। लेकिन जांच अधिकारी ने वहां के जरूरी रिकॉर्ड और गवाहों को सही तरीके से कोर्ट के सामने पेश नहीं किया।
इतना ही नहीं, अस्पताल में दर्ज महत्वपूर्ण बयान और इलाज से जुड़े जरूरी दस्तावेज या मेडिकल फाइल भी रिकॉर्ड का हिस्सा नहीं बनाए गए। ऐसे में जांच को पूरी और निष्पक्ष नहीं माना जा सकता।
‘बचाव पक्ष के सबूतों को भी देना होगा महत्व’
सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि बचाव पक्ष ने केवल दलीलें ही नहीं दीं, बल्कि अपनी बात के समर्थन में स्वतंत्र गवाह और कई दस्तावेज भी पेश किए।
अस्पताल के डॉक्टर, कार्यपालक मजिस्ट्रेट और अन्य गवाहों के बयान प्रॉसिक्यूशन के आरोपों से मेल नहीं खाते थे।
इसके अलावा बचाव पक्ष ने इलाज से जुड़े रिकॉर्ड, निवेश से जुड़े दस्तावेज और बीमा पॉलिसी भी पेश कीं।
इनसे पता चलता है कि पति ने पत्नी के इलाज के लिए जरूरी प्रयास किए थे। ऐसे में केवल प्रॉसिक्यूशन के आरोपों के आधार पर आरोपी को दोषी नहीं ठहराया जा सकता।
ट्रायल कोर्ट को सुप्रीम कोर्ट की नसीहत
सुप्रीम कोर्ट ने मामले की सुनवाई के दौरान एक अहम कानूनी सिद्धांत भी दोहराया।
कोर्ट ने कहा कि किसी भी आपराधिक मामले में ट्रायल कोर्ट को दोनों पक्षों के सबूतों का समान रूप से मूल्यांकन करना चाहिए।
अगर बचाव पक्ष गवाहों और दस्तावेजों के जरिए अपनी बात रखता है या उनके सबूत प्रॉसिक्यूशन की कहानी पर थोड़ा भी संदेह पैदा करते हैं, तो उसे सिर्फ इसलिए नजरअंदाज नहीं किया जा सकता कि वह आरोपी की ओर से पेश किए गए हैं।
कोर्ट ने कहा कि आरोपी पर खुद को निर्दोष साबित करने की जिम्मेदारी नहीं होती।
आरोप साबित करने की जिम्मेदारी सरकारी पक्ष की होती है। अगर वह मजबूत और भरोसेमंद सबूत पेश नहीं कर पाता और बचाव पक्ष के सबूत आरोपी के पक्ष में जाते हैं, तो उसका लाभ आरोपी को मिलेगा।
सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि ट्रायल कोर्ट को दोनों पक्षों के सबूतों का समान महत्व देना चाहिए।
ट्रायल कोर्ट बचाव पक्ष के सबूतों को सरकारी पक्ष के सबूतों से कम नहीं आंक सकता। दोनों पक्षों के गवाहों और दस्तावेजों को समान महत्व देकर ही निष्पक्ष फैसला किया जा सकता है।
हाईकोर्ट के फैसले पर भी उठाए सवाल
सुप्रीम कोर्ट ने पटना हाईकोर्ट के उस आदेश पर भी सवाल उठाए, जिसमें मामले को दोबारा ट्रायल कोर्ट भेज दिया गया था।
कोर्ट ने कहा कि यह घटना करीब 26 साल पुरानी है और इतने लंबे समय बाद केवल कुछ गवाहों से दोबारा जिरह कराने के लिए मामले को वापस भेजना न्याय के हित में नहीं था।
कोर्ट ने कहा कि ट्रायल कोर्ट ने उन्हीं गवाहों के बयानों पर भरोसा किया था, जिनकी गवाही आरोपी की मौजूदगी में दर्ज हुई थी।
इसलिए यह नहीं कहा जा सकता कि आरोपी को अपनी बात रखने का पूरा मौका नहीं मिला। ऐसे में मामले को दोबारा ट्रायल कोर्ट भेजने की जरूरत नहीं थी।
सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि इतने पुराने आपराधिक मामले में हाईकोर्ट को ज्यादा सावधानी से फैसला करना चाहिए था।
इतने पुराने मामले को सिर्फ तकनीकी वजहों से दोबारा ट्रायल कोर्ट भेजना सही नहीं था। जब रिकॉर्ड पर मौजूद सबूतों के आधार पर फैसला किया जा सकता था, तब रिमांड का आदेश देने की जरूरत नहीं थी।
सुप्रीम कोर्ट का अंतिम फैसला
सभी रिकॉर्ड और सबूतों की जांच के बाद सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि इस मामले मेंदहेज की मांग, प्रताड़ना और महिला की मौत से जुड़े आरोप मजबूत और भरोसेमंद सबूतों से साबित नहीं हो सके। वहीं, बचाव पक्ष ने ऐसे गवाह और दस्तावेज पेश किए, जिन्होंने इन आरोपों पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए। ऐसे में आरोपी को दोषी ठहराए रखना सही नहीं था।
इसी आधार पर सुप्रीम कोर्ट ने पति ब्रजेश कुमार को बरी कर दिया। साथ ही सेशन कोर्ट की दोषसिद्धि और पटना हाईकोर्ट के रिमांड आदेश, दोनों को रद्द कर दिया।
कोर्ट ने निर्देश दिया कि अगर आरोपी किसी दूसरे मामले में वांछित नहीं है या उसकी गिरफ्तारी की जरूरत नहीं है, तो उसे तुरंत रिहा किया जाए।
आपराधिक मुकदमों पर इस फैसले का असर
सुप्रीम कोर्ट ने इस फैसले के जरिए साफ कर दिया कि किसी भी आपराधिक मामले में सिर्फ आरोपों के आधार पर सजा नहीं दी जा सकती। कोर्ट को दोनों पक्षों के सबूतों का समान रूप से मूल्यांकन करना होगा।
सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि ट्रायल कोर्ट को सरकारी पक्ष और बचाव पक्ष, दोनों के सबूतों का समान महत्व देना होगा।
आरोपी पर खुद को निर्दोष साबित करने की जिम्मेदारी नहीं होती। अगर आरोप मजबूत और भरोसेमंद सबूतों से साबित नहीं होते या बचाव पक्ष के सबूत उन पर सवाल खड़े करते हैं, तो उसका लाभ आरोपी को मिलेगा।
कोर्ट ने यह भी स्पष्ट किया कि पुलिस की अधूरी या लापरवाही भरी जांच के आधार पर किसी व्यक्ति को दोषी नहीं ठहराया जा सकता।
कोर्ट का उद्देश्य केवल किसी को सजा देना नहीं, बल्कि निष्पक्ष और न्यायपूर्ण सुनवाई सुनिश्चित करना भी है।
