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वादी की मौत के बाद कानूनी वारिसों को रिकॉर्ड पर लाए बिना सुनाया गया फैसला कानून की नजर में ‘शून्य’, ऐसी डिक्री का निष्पादन भी नहीं हो सकता: राजस्थान हाईकोर्ट

Rajasthan High Court: Decree Passed After Sole Plaintiff's Death Declared Null and Void; Execution Proceedings Set Aside

जोधपुर। राजस्थान हाईकोर्ट ने किसी मुकदमे में वादी की मृत्यु होने के बाद उस मामले में सुनाए जाने वाले फैसले को लेकर एक महत्वपूर्ण फैसला सुनाया है।

राजस्थान हाईकोर्ट ने कहा है कि यदि किसी वाद (Suit) के एकमात्र वादी की मृत्यु हो जाए और उसके कानूनी वारिसों को निर्धारित प्रक्रिया के तहत रिकॉर्ड पर नहीं लाया जाए, तो वाद स्वतः (Abate) समाप्त माना जाएगा।

ऐसी स्थिति में उसके बाद पारित किया गया फैसला या डिक्री कानून की नजर में पूर्णतः शून्य (Nullity) होगी तथा उसके आधार पर शुरू की गई निष्पादन (Execution) कार्यवाही भी टिक नहीं सकती।

जस्टिस फरजंद अली की एकल पीठ ने पाली जिले के कालू राम की ओर से दायर अपील पर सुनवाई करते हुए यह फैसला सुनाया है।

साथ ही हाईकोर्ट ने पाली के अतिरिक्त जिला न्यायाधीश द्वारा 30 अप्रैल 2025 को सुनाए गए फैसले और डिक्री को निरस्त कर दिया। साथ ही उस डिक्री के आधार पर चल रही निष्पादन (Execution) कार्यवाही भी रद्द कर दी।

रिपोर्टेबल निर्णय के जरिए राजस्थान हाईकोर्ट ने स्पष्ट किया कि यदि किसी मुकदमे में पक्षकार की मृत्यु के बाद कानूनी प्रक्रिया का पालन नहीं किया जाता, तो उसके बाद पारित कोई भी फैसला या डिक्री टिकाऊ नहीं होगी और उसके आधार पर कोई निष्पादन कार्यवाही भी कानूनन मान्य नहीं मानी जाएगी।

क्या था मामला?

मामले में मूल वादी लाला राम का निधन 26 मई 2023 को हो गया था।

इसके बावजूद न तो उनके कानूनी वारिसों को समय सीमा के भीतर रिकॉर्ड पर लाने का आवेदन किया गया और न ही वाद की समाप्ति (Abatement) हटाने अथवा देरी माफ कराने का कोई आवेदन पेश किया गया।

इसके बावजूद ट्रायल कोर्ट ने लगभग दो वर्ष बाद 30 अप्रैल 2025 को फैसला और डिक्री पारित कर दी।

अपील में दलीलें

अपीलकर्ता की ओर से अधिवक्ता नरपत सिंह चारण एवं ओम सिंह चौहान ने राजस्थान हाईकोर्ट के समक्ष विस्तार से दलीलें पेश कीं।

अधिवक्ता नरपत सिंह ने कहा कि ट्रायल कोर्ट द्वारा 30 अप्रैल 2025 को सुनाया गया फैसला और डिक्री पूरी तरह कानून के विपरीत है, क्योंकि मुकदमे के मूल वादी लाला राम की मृत्यु 26 मई 2023 को ही हो चुकी थी।

अर्थात ट्रायल कोर्ट ने लगभग दो वर्ष पहले मृत हो चुके व्यक्ति के नाम पर निर्णय पारित कर दिया।

अपीलकर्ता ने तर्क दिया कि वादी की मृत्यु के बाद निर्धारित अवधि के भीतर उनके कानूनी प्रतिनिधियों (Legal Representatives) को रिकॉर्ड पर लाने के लिए Order XXII Rule 3 CPC के तहत कोई आवेदन प्रस्तुत नहीं किया गया।

अधिवक्ता ने कहा कि प्रतिस्थापन (Substitution) का आवेदन नहीं किया गया और देरी माफ कराने के लिए Limitation Act की धारा 5 के तहत भी कोई आवेदन प्रस्तुत नहीं किया गया।

उन्होंने यह भी कहा कि Order XXII Rule 9 CPC के तहत Abatement हटाने का आवेदन भी नहीं किया गया।

इसलिए मुकदमा स्वतः समाप्त (Abated) हो गया था।

सुनवाई का अधिकार नहीं

अधिवक्ता ने दलील दी कि मुकदमा समाप्त होने के बाद ट्रायल कोर्ट के पास सुनवाई का अधिकार ही नहीं बचा था।

अपीलकर्ता ने कहा कि जब मुकदमा कानून के अनुसार समाप्त हो चुका था, तब ट्रायल कोर्ट के पास आगे सुनवाई जारी रखने अथवा कोई निर्णय देने का अधिकार (Jurisdiction) नहीं था।

इस कारण ट्रायल कोर्ट द्वारा पारित निर्णय और डिक्री प्रारंभ से ही अवैध है।

Execution कार्यवाही भी अवैध

अधिवक्ता ने दलील दी कि मृत वादी के कथित कानूनी प्रतिनिधियों ने उसी अवैध डिक्री के आधार पर निष्पादन (Execution) कार्यवाही भी शुरू कर दी।

जबकि मुकदमा पहले ही समाप्त हो चुका था, कानूनी प्रतिनिधियों को रिकॉर्ड पर नहीं लाया गया और Abatement भी समाप्त नहीं किया गया।

ऐसी स्थिति में वे डिक्री के आधार पर किसी प्रकार की निष्पादन कार्यवाही शुरू ही नहीं कर सकते थे।

प्रतिवादियों का जवाब और विरोध

प्रतिवादियों की ओर से अधिवक्ता सपना वैष्णव ने अपील का विरोध करते हुए अपना पक्ष रखा।

हालांकि उन्होंने यह स्वीकार किया कि मूल वादी लाला राम की मृत्यु 26 मई 2023 को हुई थी और यह मृत्यु ट्रायल कोर्ट के निर्णय से काफी पहले हो चुकी थी।

प्रतिवादी पक्ष ने यह भी विवाद नहीं किया कि निर्धारित अवधि में कानूनी प्रतिनिधियों को रिकॉर्ड पर लाने का आवेदन प्रस्तुत नहीं किया गया।

देरी माफ कराने का आवेदन भी नहीं दिया गया।

Abatement हटाने के लिए भी कोई आवेदन प्रस्तुत नहीं किया गया।

प्रतिवादियों ने यह भी स्वीकार किया कि ट्रायल कोर्ट द्वारा ऐसा कोई आदेश पारित नहीं किया गया था, जिससे मृत वादी के कानूनी प्रतिनिधियों को औपचारिक रूप से वादी के स्थान पर रिकॉर्ड पर लिया गया हो।

निर्णय में यह भी उल्लेख है कि प्रतिवादी स्वयं को मृत वादी के कानूनी प्रतिनिधि (Legal Representatives) बताते हुए डिक्री के आधार पर निष्पादन कार्यवाही चला रहे थे। हालांकि उन्होंने उपरोक्त तथ्यों का कोई प्रभावी खंडन नहीं किया।

राजस्थान हाईकोर्ट का फैसला

दोनों पक्षों की बहस सुनने के बाद राजस्थान हाईकोर्ट ने अपने फैसले में कहा कि Order XXII CPC के अनुसार यदि एकमात्र वादी की मृत्यु के बाद निर्धारित समय के भीतर उसके कानूनी प्रतिनिधियों को रिकॉर्ड पर नहीं लाया जाता, तो वाद कानून के संचालन (Operation of Law) से स्वतः समाप्त (Abate) हो जाता है।

इसके लिए किसी अलग न्यायिक आदेश की आवश्यकता नहीं होती।

जब तक अदालत देरी माफ कर Abatement समाप्त नहीं करती और कानूनी वारिसों को रिकॉर्ड पर नहीं लाती, तब तक मुकदमे की आगे की कार्यवाही नहीं चल सकती।

‘ऐसी डिक्री पूरी तरह शून्य’

राजस्थान हाईकोर्ट ने अपने फैसले में कहा कि मृत वादी के कानूनी प्रतिनिधि केवल मृत्यु के आधार पर स्वतः पक्षकार नहीं बन जाते।

उन्हें विधिवत अदालत के आदेश से रिकॉर्ड पर लाना आवश्यक है। ऐसा नहीं होने पर उनके पक्ष में कोई वैध डिक्री पारित नहीं की जा सकती।

इसलिए मृत वादी के नाम पर पारित डिक्री कानून की नजर में शून्य (Nullity) है और उससे किसी प्रकार का वैधानिक अधिकार उत्पन्न नहीं होता।

Execution भी अवैध

हाईकोर्ट ने यह भी स्पष्ट किया कि जब मूल डिक्री ही शून्य है, तो उसके आधार पर शुरू की गई निष्पादन (Execution) कार्यवाही भी स्वतः अवैध हो जाती है।

कोर्ट ने कहा कि बिना वैध डिक्री के कोई व्यक्ति स्वयं को Decree Holder नहीं मान सकता और न ही डिक्री के निष्पादन की मांग कर सकता है।

हाईकोर्ट का अंतिम आदेश

राजस्थान हाईकोर्ट ने अपील स्वीकार करते हुए ट्रायल कोर्ट की 30 अप्रैल 2025 की डिक्री रद्द कर दी। उस डिक्री पर आधारित पूरी निष्पादन (Execution) कार्यवाही भी निरस्त कर दी।

साथ ही यह स्पष्ट किया कि मृत वादी के कानूनी प्रतिनिधियों को कानून के अनुसार उपलब्ध वैधानिक उपाय अपनाने की स्वतंत्रता रहेगी और वे Order XXII CPC के तहत उचित आवेदन प्रस्तुत कर सकते हैं।

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