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40 साल बाद नहीं छीन सकते खातेदारी का हक: राजस्थान हाईकोर्ट ने सरकार की याचिका खारिज की, कहा- बिना सबूत पुराने रिकॉर्ड नहीं बदल सकते

Rajasthan High Court Protects Decades-Old Khatedari Rights, Says Suspicion Alone Cannot Alter Revenue Records

जयपुर: खातेदारी अधिकार रद्द कराने के मामले में राज्य सरकार राजस्थान हाईकोर्ट से बड़ा झटका लगा है। हाईकोर्ट ने करीब 40 साल पहले दिए गए खातेदारी अधिकार को रद्द कराने की सरकार की याचिका को खारिज कर दिया।

राजस्थान हाईकोर्ट ने कहा कि केवल संदेह या बिना ठोस सबूत के किसी व्यक्ति से खातेदारी का हक नहीं छीना जा सकता।

हाईकोर्ट ने सरकार की याचिका खारिज करते हुए राजस्व अपीलीय प्राधिकरण तथा राजस्व बोर्ड के उस फैसले को बरकरार रखा, जिसमें किसान मदनलाल के पक्ष में दिए गए आदेश को सही माना गया था।

हाईकोर्ट ने साफ कहा कि वर्षों पुराने खातेदारी अधिकार केवल शक, अनुमान या बिना ठोस सबूत के आधार पर खत्म नहीं किए जा सकते। अगर सरकार किसी म्यूटेशन या राजस्व रिकॉर्ड को रद्द करना चाहती है, तो उसे पुख्ता सबूत पेश करने होंगे।

सिर्फ यह कहना कि उस समय व्यक्ति नाबालिग था या उसके पिता राजस्व विभाग में पटवारी थे, अधिकार छीनने का आधार नहीं बन सकता।

जस्टिस आनंद शर्मा की एकलपीठ ने राज्य सरकार की याचिका खारिज करते हुए कहा कि जिस व्यक्ति का नाम पहले से राजस्व रिकॉर्ड में काश्तकार के रूप में दर्ज था और जिसे राजस्थान काश्तकारी कानून के तहत खातेदारी का हक मिला था, उसका नाम 40 साल बाद सिर्फ इस आधार पर नहीं हटाया जा सकता कि उस समय वह कथित रूप से नाबालिग था या उसके पिता पटवारी थे।

हाईकोर्ट ने कहा कि रिकॉर्ड से साफ है कि म्यूटेशन दर्ज होने के समय संबंधित व्यक्ति बालिग था। साथ ही राज्य सरकार यह भी साबित नहीं कर सकी कि उसके पिता ने अपने पद का दुरुपयोग कर म्यूटेशन दर्ज कराया था। ऐसे में दशकों बाद खातेदारी अधिकार रद्द करना कानून के अनुरूप नहीं माना जा सकता।

हाईकोर्ट ने फैसले स्पष्ट कर दिया है कि राजस्व रिकॉर्ड में लंबे समय से दर्ज खातेदारी अधिकार केवल संदेह या पुराने आरोपों के आधार पर खत्म नहीं किए जा सकते। अगर सरकार के पास ठोस सबूत नहीं हैं, तो पुराने रिकॉर्ड में बदलाव नहीं किया जा सकता।

अगर सरकार ऐसे अधिकारों को चुनौती देना चाहती है, तो उसे अपने हर आरोप के समर्थन में ठोस और विश्वसनीय सबूत पेश करने होंगे।

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पूरा मामला क्या था और सरकार ने क्या दलील दी?

मामला जयपुर जिले के जमवारामगढ़ क्षेत्र की जमीन से जुड़ा है। राज्य सरकार ने साल 2014 में हाईकोर्ट का दरवाजा खटखटाया था। सरकार ने उस आदेश को चुनौती दी थी, जिसमें राजस्व अपीलीय प्राधिकरण और बाद में राजस्व बोर्ड ने किसान मदनलाल के पक्ष में फैसला दिया था

सरकार चाहती थी कि अतिरिक्त जिला कलेक्टर का वर्ष 2002 का वह आदेश बरकरार रखा जाए, जिसमें वर्ष 1961 की म्यूटेशन एंट्री रद्द कर दी गई थी।

सरकार का कहना था कि जब 12 अप्रैल 1961 को म्यूटेशन दर्ज किया गया, तब मदनलाल नाबालिग थे। साथ ही उनके पिता राजस्व विभाग में पटवारी थे और उन्होंने अपने पद का प्रभाव इस्तेमाल कर यह एंट्री करवाई थी। इसी आधार पर म्यूटेशन रद्द किया गया था।

सरकार ने यह दलील भी दी कि इस मामले की अपील सुनने का अधिकार राजस्व अपीलीय प्राधिकरण के पास नहीं था।

वहीं, मदनलाल की ओर से कहा गया कि सरकार के दोनों आरोप रिकॉर्ड से मेल नहीं खाते।

उनकी ओर से स्कूल का प्रमाणपत्र पेश किया गया, जिसमें जन्मतिथि 31 अक्टूबर 1941 दर्ज थी। इसके हिसाब से 12 अप्रैल 1961 को उनकी उम्र करीब 19 साल थी और वह बालिग थे। इसलिए नाबालिग होने का आरोप पूरी तरह गलत है।

उन्होंने यह भी बताया कि उनके पिता भले ही पटवारी थे, लेकिन विवादित गांव में उनकी पोस्टिंग नहीं थी। इसलिए प्रभाव का इस्तेमाल करने का सवाल ही नहीं उठता।

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हाईकोर्ट ने सरकार की दलील क्यों ठुकराई?

हाईकोर्ट ने रिकॉर्ड को देखने के बाद कहा कि उपलब्ध दस्तावेज साफ बताते हैं कि म्यूटेशन के समय मदनलाल बालिग थे। इसलिए सरकार का पहला आधार ही रिकॉर्ड से साबित नहीं होता।

हाईकोर्ट ने यह भी कहा कि सरकार यह साबित नहीं कर सकी कि मदनलाल के पिता संबंधित इलाके में पटवारी थे या उन्होंने अपने पद का दुरुपयोग कर म्यूटेशन दर्ज कराया था।

केवल किसी व्यक्ति का पटवारी का बेटा होना यह मानने के लिए पर्याप्त नहीं है कि उसने गलत तरीके से खातेदारी अधिकार हासिल किए होंगे। जब तक ऐसे आरोपों के समर्थन में ठोस सबूत न हों, किसी के अधिकार नहीं छीने जा सकते।

हाईकोर्ट ने सरकार की यह दलील भी खारिज कर दी कि राजस्व अपीलीय प्राधिकरण को इस मामले की सुनवाई का अधिकार नहीं था।

हाईकोर्ट ने कहा कि संबंधित नियमों के तहत अपील उसी प्राधिकरण के पास सुनवाई योग्य थी। इतना ही नहीं, सरकार ने उस समय अपील की सुनवाई के दौरान इस पर कोई आपत्ति भी नहीं उठाई थी।

पुराने रिकॉर्ड को दशकों बाद नहीं बदला जा सकता

कोर्ट ने यह भी कहा कि इस मामले में मदनलाल का नाम पहले से ही पुराने खसरा रिकॉर्ड में काश्तकार के रूप में दर्ज था। ऐसे मामलों में राजस्थान काश्तकारी कानून, 1955 के तहत खातेदारी अधिकार कानून के प्रभाव से मिलते हैं।

इसलिए 1970 के नियमों का सहारा लेकर कई दशक बाद उस म्यूटेशन को रद्द करना सही नहीं था।

हाईकोर्ट का अंतिम फैसला

सभी तथ्यों, रिकॉर्ड और दोनों पक्षों की दलीलों पर विचार करने के बाद राजस्थान हाईकोर्ट ने राज्य सरकार की याचिका खारिज कर दी।

हाईकोर्ट ने कहा कि राजस्व अपीलीय प्राधिकरण और राजस्व बोर्ड के आदेश में कोई ऐसी कानूनी खामी या अधिकार क्षेत्र से जुड़ी त्रुटि नहीं है, जिसके कारण उसमें दखल देने की जरूरत पड़े।

हाईकोर्ट ने अतिरिक्त जिला कलेक्टर की ओर से वर्ष 2002 में म्यूटेशन एंट्री रद्द करने के आदेश को बहाल करने से भी इनकार कर दिया। इसके साथ ही मदनलाल के पक्ष में राजस्व अपीलीय प्राधिकरण और राजस्व बोर्ड की ओर से दिए गए आदेश बरकरार रहे।

हाईकोर्ट ने इस मामले से जुड़े सभी लंबित आवेदन भी निस्तारित कर दिए।

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