राजस्थान हाईकोर्ट ने कंपनी के तत्कालीन सीनियर वाइस प्रेसिडेंट के खिलाफ आपराधिक कार्यवाही रद्द
जोधपुर। राजस्थान हाईकोर्ट ने वर्ष 2005 में चित्तौड़गढ़ स्थित हिंदुस्तान जिंक लिमिटेड के संयंत्र में कथित जहरीली गैस रिसाव मामले में महत्वपूर्ण फैसला सुनाते हुए कंपनी के तत्कालीन वरिष्ठ अधिकारी (Senior Vice President/President) जयराज के खिलाफ जारी आपराधिक कार्यवाही को रद्द कर दिया।
राजस्थान हाईकोर्ट ने अपने रिपोर्टेबल जजमेंट में कहा है कि किसी कंपनी के वरिष्ठ पद पर होने मात्र से किसी अधिकारी पर आपराधिक दायित्व नहीं डाला जा सकता।
कोर्ट ने कहा कि अभियोजन के लिए यह दिखाना आवश्यक है कि संबंधित अधिकारी की घटना में प्रत्यक्ष भूमिका, सहमति, मिलीभगत या लापरवाही थी या नहीं।
जस्टिस फरजंद अली की एकलपीठ ने यह आदेश हिंदुस्तान जिंक के तत्कालीन वाइस प्रेसिडेंट जयराज और हिंदुस्तान जिंक कंपनी की ओर से दायर याचिकाओं पर सुनवाई करते हुए दिया है।
क्या था मामला?
9 नवंबर 2005 को चित्तौड़गढ़ के पुथोली गांव के निकट स्थित हिंदुस्तान जिंक लिमिटेड के प्लांट से कथित रूप से जहरीली सल्फर गैस का रिसाव हुआ था।
गैस रिसाव के कारण आसपास के लोगों को खांसी, सांस लेने में तकलीफ तथा अन्य स्वास्थ्य संबंधी समस्याएं हुईं और क्षेत्र में दहशत फैल गई।
इसके बाद चंदेरिया थाने में एफआईआर दर्ज की गई थी।
बाद में एक निजी शिकायत भी दायर की गई, जिसके आधार पर ट्रायल कोर्ट ने आईपीसी की विभिन्न धाराओं तथा पर्यावरण (संरक्षण) अधिनियम, 1986 की धाराओं 15 और 16 के तहत संज्ञान लेते हुए आरोप तय कर दिए थे।
पुनरीक्षण याचिका भी खारिज होने के बाद मामला हाईकोर्ट पहुंचा।
याचिका में दलीलें
याचिकाकर्ताओं की ओर से वरिष्ठ अधिवक्ता मनीष सिसोदिया, अधिवक्ता अखिलेश राजपुरोहित, हार्दिक व्यास, हर्षवर्धन सिंह राठौड़, कुलदीप, सौरभ सिरवी एवं ताराराम सिरवी ने दलीलें देते हुए कहा कि केवल पद के आधार पर मुकदमा नहीं चलाया जा सकता।
अधिवक्ताओं ने कहा कि याचिकाकर्ता जयराज उस समय कंपनी के वरिष्ठ अधिकारी थे, लेकिन घटना के समय एसिड प्लांट के संचालन, रखरखाव या तकनीकी नियंत्रण से उनका कोई प्रत्यक्ष संबंध नहीं था।
याचिका में कहा गया कि शिकायत में उनके खिलाफ कोई विशिष्ट आरोप नहीं लगाया गया कि उन्होंने कोई आदेश दिया, लापरवाही बरती या गैस रिसाव के लिए जिम्मेदार थे।
अधिवक्ताओं ने कहा कि आरोपी की पुलिस जांच में कोई भूमिका नहीं मिली और घटना के तुरंत बाद दर्ज एफआईआर की विस्तृत जांच हुई।
पुलिस ने सभी तकनीकी और दस्तावेजी साक्ष्यों की जांच के बाद याचिकाकर्ता के खिलाफ कोई चार्जशीट दाखिल नहीं की।
इसलिए बाद में निजी शिकायत के माध्यम से बिना नए साक्ष्य के उन्हें आरोपी बनाना कानून का दुरुपयोग है।
पर्यावरण संरक्षण अधिनियम की धारा 16 लागू नहीं
बचाव पक्ष ने कहा कि धारा 16 के अनुसार केवल वही अधिकारी अभियोजन का सामना करेगा जो घटना के समय कंपनी के व्यवसाय के संचालन के लिए प्रत्यक्ष रूप से जिम्मेदार हो अथवा जिसकी सहमति, मिलीभगत या लापरवाही से अपराध हुआ हो।
अधिवक्ताओं ने कहा कि शिकायत में ऐसे किसी तथ्य का उल्लेख नहीं है और वैज्ञानिक साक्ष्य विरोधाभासी हैं। साथ ही अभियोजन की फोरेंसिक रिपोर्टों में गंभीर विरोधाभास है।
अधिवक्ताओं ने कहा कि घटनास्थल रिपोर्ट गैस रिसाव की बात करती है, जबकि रासायनिक जांच रिपोर्ट में एसिड की पुष्टि नहीं हुई। ऐसे विरोधाभासी साक्ष्यों के आधार पर आपराधिक मुकदमा जारी नहीं रखा जा सकता।
सुप्रीम कोर्ट के फैसलों का हवाला
याचिकाकर्ताओं ने सुप्रीम कोर्ट के उन फैसलों का हवाला दिया, जिनमें कहा गया है कि केवल कंपनी का निदेशक, उपाध्यक्ष या वरिष्ठ अधिकारी होना आपराधिक दायित्व तय करने के लिए पर्याप्त नहीं है।
प्रतिवादी की मुख्य दलीलें
राज्य सरकार और शिकायतकर्ता की ओर से याचिका का विरोध करते हुए कहा गया कि घटना गंभीर पर्यावरणीय अपराध थी।
9 नवंबर 2005 को हिंदुस्तान जिंक के प्लांट से जहरीली गैस का रिसाव हुआ, जिससे आसपास के ग्रामीणों को सांस लेने में तकलीफ, आंखों में जलन और अन्य स्वास्थ्य समस्याएं हुईं।
इसलिए कंपनी के वरिष्ठ अधिकारियों की जिम्मेदारी तय होना आवश्यक है।
सरकार ने कहा कि इस मामले में मजिस्ट्रेट द्वारा विधिवत संज्ञान लिया गया था और शिकायतकर्ता ने पर्यावरण संरक्षण अधिनियम के तहत आवश्यक नोटिस दिया था।
सक्षम प्राधिकारी द्वारा कार्रवाई नहीं होने पर निजी शिकायत दायर की गई, जिस पर मजिस्ट्रेट ने संज्ञान लेकर आरोप तय किए।
ट्रायल कोर्ट तथा पुनरीक्षण न्यायालय दोनों ने आरोप तय करने के आदेश को सही माना था।
पर्यावरण संरक्षण सर्वोच्च संवैधानिक दायित्व
सरकार ने कहा कि उद्योगों पर पर्यावरण संरक्षण और जनस्वास्थ्य की रक्षा का संवैधानिक दायित्व है। इसलिए वरिष्ठ प्रबंधन को मुकदमे से बाहर नहीं रखा जा सकता।
सरकार ने कहा कि चार्ज फ्रेमिंग के स्तर पर विस्तृत साक्ष्य परीक्षण आवश्यक नहीं हैं।
प्रतिवादियों का तर्क था कि आरोप तय करने के चरण में अदालत को साक्ष्यों का विस्तृत मूल्यांकन नहीं करना चाहिए। यदि प्रथम दृष्टया अपराध का मामला बनता है तो मुकदमा चलना चाहिए और अंतिम निर्णय ट्रायल के बाद होना चाहिए।
सरकार ने कहा कि निजी शिकायत विधिसम्मत थी। पुलिस द्वारा किसी व्यक्ति को आरोपी नहीं बनाने से मजिस्ट्रेट की शक्ति समाप्त नहीं हो जाती।
मजिस्ट्रेट स्वतंत्र रूप से उपलब्ध सामग्री के आधार पर संज्ञान लेकर मुकदमा चला सकता है।
राजस्थान हाईकोर्ट ने क्या कहा?
हाईकोर्ट ने अपने विस्तृत फैसले में कहा कि भारतीय आपराधिक कानून का मूल सिद्धांत व्यक्तिगत आपराधिक दायित्व (Personal Criminal Liability) है।
केवल किसी कंपनी में उच्च प्रशासनिक पद पर होने से किसी व्यक्ति को आरोपी नहीं बनाया जा सकता।
जब तक यह नहीं दिखाया जाए कि उसने स्वयं अपराध में सक्रिय भूमिका निभाई, सहमति दी, मिलीभगत की या लापरवाही बरती, तब तक उसके खिलाफ आपराधिक मुकदमा नहीं चलाया जा सकता।
हाईकोर्ट ने कहा कि शिकायत में कहीं भी यह स्पष्ट नहीं किया गया कि याचिकाकर्ता घटना के समय संबंधित एसिड प्लांट के संचालन, मशीनरी, तकनीकी निर्णय या गैस रिसाव से जुड़े किसी कार्य के लिए प्रत्यक्ष रूप से जिम्मेदार थे।
कोर्ट ने कहा कि शिकायत केवल इस आधार पर की गई कि वे कंपनी के वरिष्ठ अधिकारी थे, जबकि ऐसा आधार आपराधिक कानून में स्वीकार्य नहीं है।
पुलिस जांच में भी नहीं मिला था कोई ठोस आधार
कोर्ट ने यह भी उल्लेख किया कि घटना के तुरंत बाद हुई पुलिस जांच में याचिकाकर्ता के खिलाफ कोई आरोप नहीं पाया गया था।
विस्तृत तकनीकी जांच के बाद पुलिस ने उनके खिलाफ चार्जशीट दाखिल नहीं की थी।
कोर्ट ने कहा कि इसके बावजूद बाद में निजी शिकायत के माध्यम से उन्हें आरोपी बनाया गया, लेकिन उनके खिलाफ कोई स्वतंत्र और ठोस साक्ष्य प्रस्तुत नहीं किया गया।
वैज्ञानिक रिपोर्टों में भी पाया विरोधाभास
अपने फैसले में कोर्ट ने अभियोजन के वैज्ञानिक साक्ष्यों पर भी गंभीर टिप्पणी की।
हाईकोर्ट ने कहा कि घटनास्थल निरीक्षण रिपोर्ट में सल्फर ट्राईऑक्साइड (SO₃) गैस के रिसाव की बात कही गई, जबकि उसी फोरेंसिक प्रयोगशाला की रासायनिक जांच रिपोर्ट में जब्त नमूनों में किसी अम्ल (Acid) की पुष्टि नहीं हुई।
दोनों वैज्ञानिक रिपोर्टों में यह विरोधाभास अभियोजन के मामले की विश्वसनीयता पर गंभीर प्रश्न खड़ा करता है।
सुप्रीम कोर्ट के फैसलों का सहारा
हाईकोर्ट ने अपने निर्णय में सुप्रीम कोर्ट के विभिन्न फैसलों का उल्लेख करते हुए कहा कि कंपनी के निदेशक, उपाध्यक्ष या अन्य वरिष्ठ अधिकारियों पर केवल उनके पद के आधार पर आपराधिक मुकदमा नहीं चलाया जा सकता।
इसके लिए शिकायत में उनके व्यक्तिगत दायित्व और भूमिका के स्पष्ट आरोप होना अनिवार्य है।
हाईकोर्ट का अंतिम फैसला
राजस्थान हाईकोर्ट ने माना कि न तो शिकायत में याचिकाकर्ता की कोई विशिष्ट भूमिका बताई गई और न ही जांच में ऐसा कोई स्वतंत्र साक्ष्य मिला, जिससे उनके खिलाफ मुकदमा चलाना उचित ठहराया जा सके।
ऐसे में केवल पद के आधार पर उन्हें आपराधिक मुकदमे का सामना करने के लिए बाध्य करना कानून के सिद्धांतों के विपरीत होगा।
इसी आधार पर हाईकोर्ट ने उनके खिलाफ लंबित आपराधिक कार्यवाही को निरस्त कर दिया।