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अवकाश में भी न्याय के दरवाजे खुले रखने की पहल से बना न्यायिक इतिहास का दुर्लभ अध्याय – मुख्य न्यायाधीश जस्टिस संजय कुमार अग्रवाल की पहल का हो रहा स्वागत

Rajasthan High Court Witnesses Two Extraordinary Days: Special Benches Hear Urgent Cases Despite Holidays, Proceedings Continue Till Late Night

जयपुर। राजस्थान की न्यायपालिका के लिए पिछले दो दिन असाधारण रहे। अवकाश के बावजूद न केवल विशेष पीठों का गठन हुआ, बल्कि कई मामलों में अदालतों ने देर रात तक सुनवाई की।

चुनाव के दौरान सामने आए गंभीर मामलों में न्यायिक हस्तक्षेप की आवश्यकता को देखते हुए राजस्थान हाईकोर्ट की रजिस्ट्री से लेकर न्यायाधीशों तक ने असाधारण तत्परता दिखाई।

इन दो दिनों में ऐसा दृश्य देखने को मिला, जो राजस्थान की न्यायिक कार्यप्रणाली में लंबे समय तक चर्चा का विषय रहेगा।

मामला चाहे देर रात सामने आया हो या अलसुबह—याचिका दाखिल होने के बाद उस पर तत्काल सुनवाई के लिए पीठ के गठन की प्रक्रिया शुरू की गई। कई मामलों में अवकाश के बावजूद अदालतें बैठीं और पक्षकारों को न्यायिक राहत के लिए इंतजार नहीं करना पड़ा।

इस पूरी प्रक्रिया में राजस्थान हाईकोर्ट के मुख्य न्यायाधीश जस्टिस संजय कुमार अग्रवाल की पहल और न्यायिक प्रशासन की भूमिका भी महत्वपूर्ण रही।

मुख्य न्यायाधीश की पहल का स्वागत

राजस्थान हाईकोर्ट में लगातार दो अवकाश के दिनों में जिस तरह अर्जेंट मामलों की सुनवाई के लिए विशेष पीठों का गठन हुआ और न्यायिक कार्यवाही देर रात तक जारी रही, उसमें मुख्य न्यायाधीश जस्टिस संजय कुमार अग्रवाल की न्यायिक प्रशासनिक भूमिका विशेष रूप से सामने आई।

20 सितंबर रविवार और 21 सितंबर को बाबा रामदेव जयंती के अवकाश के बावजूद प्रदेशभर से चुनाव से जुड़े मामले को तत्काल सुनवाई के लिए सूचीबद्ध किया गया।

याचिकाकर्ताओं की ओर से अर्जेंसी बताए जाने के बाद मुख्य न्यायाधीश ने मामले को उसी दिन सुनवाई करने के लिए निर्देश दिया।

विशेष परिस्थितियों में अदालतों के संचालन के लिए रजिस्ट्री, न्यायाधीशों और न्यायिक तंत्र के बीच जिस तरह समन्वय दिखाई दिया, उसने यह संदेश दिया कि आवश्यकता पड़ने पर न्यायिक प्रक्रिया सामान्य कार्यदिवसों की सीमाओं तक सीमित नहीं रहती।

इसलिए कहा भी गया हैं —

“History is always written by leaders who are willing to embrace challenges.”

नेतृत्व का असर न्यायिक प्रशासन में दिखाई दिया

मुख्य न्यायाधीश के रूप में जस्टिस संजय कुमार अग्रवाल का कार्यकाल 7 सितंबर 2026 से शुरू हुआ है।

शपथ लेने के साथ ही मुख्य न्यायाधीश ने बार के अनुरोध पर जोधपुर मुख्यपीठ में सुनवाई की. अब दो सप्ताह की सुनवाई के बाद 22 सितबंर मंगलवार से जयपुर पीठ में सुनवाई करेंगे.

बीते दो दिनों की घटनाओं में उनके नेतृत्व में न्यायिक प्रशासन की एक महत्वपूर्ण भूमिका यह रही कि जहां मामलों में तत्काल सुनवाई की जरूरत सामने आई, वहां अवकाश अपने आप में न्यायिक सुनवाई के रास्ते की बाधा नहीं बना।

यह केवल अदालत में न्यायाधीश के बैठने का मामला नहीं था।

अर्जेंट याचिका का सामने आना, उसकी तात्कालिकता को देखना, उसे सुनवाई के लिए सूचीबद्ध करना और संबंधित न्यायिक पीठ के समक्ष कार्यवाही सुनिश्चित करना—इन सभी स्तरों पर न्यायिक प्रशासन को सक्रिय रहना पड़ता है।

संदेश साफ-अर्जेंसी हो तो न्यायिक व्यवस्था सक्रिय

रविवार और बाबा रामदेव जयंती के अवकाश के दौरान राजस्थान हाईकोर्ट में जस्टिस अनूप कुमार ढंड, जस्टिस कुलदीप माथुर, डॉ. जस्टिस नूपुर भाटी और जस्टिस सुनील बेनीवाल ने अलग-अलग अर्जेंट मामलों की सुनवाई की।

बीते दो दिनों की घटनाएं राजस्थान हाईकोर्ट के न्यायिक प्रशासन के लिए इसलिए महत्वपूर्ण हैं क्योंकि इनसे यह स्पष्ट हुआ कि असाधारण परिस्थितियों में न्यायिक व्यवस्था सामान्य कार्यदिवसों की सीमाओं से आगे जाकर भी सक्रिय की जा सकती है।

मुख्य न्यायाधीश जस्टिस संजय कुमार अग्रवाल की ओर से अर्जेंट मामलों को अवकाश में सुनवाई के लिए लिए स्वीकार करने निर्देश और उसके बाद विशेष पीठों की कार्यवाही ने इस पूरी प्रक्रिया को संस्थागत रूप दिया

देर रात तक अदालत में बैठीं जस्टिस नूपुर भाटी

इन दो दिनों की सबसे उल्लेखनीय घटनाओं में से एक राजस्थान हाईकोर्ट की डॉ. जस्टिस नूपुर भाटी की देर रात तक चली सुनवाई रही। उन्होंने रात करीब साढ़े बारह बजे तक अदालत में बैठकर मामलों की सुनवाई की।

यह घटनाक्रम इसलिए भी विशेष रहा क्योंकि अवकाश के दिन देर रात तक न्यायिक कार्यवाही चलना सामान्य प्रक्रिया नहीं है।

यह राजस्थान हाईकोर्ट के न्यायिक इतिहास में एक उल्लेखनीय उदाहरण के रूप में दर्ज किया जा सकता है। इसे देश में किसी महिला न्यायाधीश द्वारा देर रात तक सुनवाई का पहला उदाहरण माना जा सकता हैं.

न्यायपालिका की तत्परता बनी चर्चा का विषय

चुनावी प्रक्रिया के दौरान सामने आए विवादों और गंभीर परिस्थितियों ने प्रशासनिक व्यवस्था पर सवाल खड़े किए। लेकिन उसी दौरान न्यायपालिका की ओर से जिस तेजी से याचिकाओं पर सुनवाई हुई, उसने न्यायिक तंत्र की आपात परिस्थितियों में प्रतिक्रिया देने की क्षमता को सामने रखा।

रात हो, देर शाम हो या अलसुबह—जहां तत्काल न्यायिक हस्तक्षेप आवश्यक समझा गया, वहां विशेष पीठ के गठन और सुनवाई की व्यवस्था की गई। यह पूरी प्रक्रिया केवल न्यायाधीशों की उपलब्धता तक सीमित नहीं रही, बल्कि इसके पीछे रजिस्ट्री और न्यायिक प्रशासन के बीच समन्वय भी दिखाई दिया।

नेतृत्व की एक अलग तस्वीर

किसी भी संस्थान का नेतृत्व केवल आदेश देने से नहीं, बल्कि कठिन परिस्थितियों में पूरी टीम को साथ लेकर चलने से दिखाई देता है। पिछले दो दिनों में राजस्थान हाईकोर्ट में दिखाई दी न्यायिक तत्परता इसी संदर्भ में चर्चा का विषय बनी है।

राजस्थान हाईकोर्ट के अधिवक्ता इस पहल का स्वागत करते हुए कहते हैं…

मुख्य न्यायाधीश से लेकर रजिस्ट्री और विशेष पीठों में शामिल न्यायाधीशों तक, अवकाश के बावजूद देर रात तक काम करने की तत्परता सामने आई। आम नागरिक के लिए इसका सबसे महत्वपूर्ण संदेश यही है कि न्याय पाने के लिए केवल अगला कार्यदिवस आने का इंतजार जरूरी नहीं, बल्कि असाधारण परिस्थितियों में न्यायालय तत्काल हस्तक्षेप भी कर सकता है।

–तनवीर अहमद, अधिवक्ता राजस्थान हाईकोर्ट

राजस्थान न्यायपालिका के लिए ये दो दिन इसलिए भी महत्वपूर्ण हैं क्योंकि इन घटनाओं ने न्यायिक प्रशासन, नेतृत्व और आपात परिस्थितियों में न्याय तक त्वरित पहुंच-तीनों को एक साथ सामने ला दिया है।

-रमित पारीक, अधिवक्ता राजस्थान हाईकोर्ट

राजस्थान के न्यायिक इतिहास में बीते दो दिनों की यह असाधारण न्यायिक सक्रियता एक महत्वपूर्ण पहल के रूप में सामने आई है। अवकाश के बावजूद अर्जेंट मामलों की सुनवाई के लिए विशेष पीठों का गठन और देर रात तक न्यायिक कार्यवाही का जारी रहना न्याय तक त्वरित पहुंच और न्यायिक उत्तरदायित्व की भावना को रेखांकित करता है। मुख्य न्यायाधीश जस्टिस संजय के. अग्रवाल के पदभार ग्रहण करने के बाद सामने आई इस पहल ने विशेष परिस्थितियों में न्यायिक व्यवस्था की तत्परता और संवेदनशीलता को चर्चा के केंद्र में ला दिया है।

-देवकीनंदन व्यास, अधिवक्ता राजस्थान हाईकोर्ट

आवश्यकता पड़ने पर अवकाश के दिन भी न्यायिक कार्यवाही सुनिश्चित किए जाने से यह संदेश स्पष्ट होता है कि नागरिकों के अधिकारों से जुड़े अर्जेंट मामलों में न्यायिक प्रक्रिया को अनावश्यक विलंब का सामना न करना पड़े। लोकतांत्रिक मूल्यों, विधि के शासन और नागरिकों के न्याय पाने के अधिकार की रक्षा के लिहाज से यह घटनाक्रम राजस्थान की न्यायिक व्यवस्था में एक उल्लेखनीय अध्याय के रूप में देखा जा सकता है।

–विजय चौधरी, महासचिव, राजस्थान हाईकोर्ट एडवोकेट एसोसिएशन जोधपुर

न्याय केवल निर्णय देने का नाम नहीं है, बल्कि समय पर न्याय उपलब्ध कराना भी उतना ही महत्वपूर्ण है। जब न्यायाधीश अवकाश, व्यक्तिगत सुविधा और निर्धारित कार्य-समय से ऊपर उठकर नागरिकों के अधिकारों और न्याय की आवश्यकता को प्राथमिकता देते हैं, तब न्यायपालिका के प्रति समाज का विश्वास और अधिक सुदृढ़ होता है। माननीय न्यायाधीशों तथा न्यायिक तंत्र से जुड़े सभी अधिकारियों और कर्मचारियों का यह समर्पण प्रशंसा का विषय है। उनकी यह प्रतिबद्धता न केवल न्यायिक व्यवस्था की गरिमा को बढ़ाती है, बल्कि अधिवक्ताओं और आम नागरिकों के लिए भी प्रेरणास्रोत है।

— विभूतीभूषण शर्मा, अधिवक्ता राजस्थान हाईकोर्ट

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