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गवाहों को चुप कराने की कोशिश नहीं चलेगी; धमकाया या सामाजिक बहिष्कार किया तो होगी कार्रवाई, राजस्थान हाईकोर्ट ने पुलिस को दिए निर्देश

Rajasthan High Court Orders Prompt Action Against Witness Intimidation

जोधपुर: किसी आपराधिक मामले की जांच के दौरान गवाहों को धमकाना, उन पर दबाव बनाना या उनका सामाजिक बहिष्कार करना अब भारी पड़ सकता है।

राजस्थान हाईकोर्ट ने कहा कि गवाहों को डराने, प्रभावित करने या उनका सामाजिक बहिष्कार करने की कोशिश सीधे न्याय प्रक्रिया को प्रभावित करती है और इन्हें किसी भी कीमत पर बर्दाश्त नहीं किया जा सकता।

इसलिए ऐसे मामलों में तुरंत कानूनी कार्रवाई जरूरी है।

हाईकोर्ट ने पुलिस को निर्देश दिया है कि अगर किसी गवाह या उससे जुड़े किसी अन्य व्यक्ति की ओर से धमकी, दबाव, सामाजिक बहिष्कार या डराने-धमकाने की शिकायत मिलती है तो ऐसे मामलों में तत्काल और प्रभावी कार्रवाई की जाए।

हाईकोर्ट ने कहा कि अगर शिकायत सही पाई जाती है तो जिम्मेदार लोगों के खिलाफ तुरंत कानून के मुताबिक कार्रवाई की जाए।

साथ ही यह भी सुनिश्चित किया जाए कि किसी तरह के दबाव या धमकी की वजह से जांच प्रभावित न हो।

यह आदेश जस्टिस फरजंद अली की एकल पीठ ने जोधपुर के लूणी थाना क्षेत्र में दर्ज एक मामले की सुनवाई के दौरान दिया।

याचिकाकर्ता का आरोप था कि आरोपी पक्ष उसके गवाहों को धमका रहा है और उनका सामाजिक बहिष्कार कर उन पर बयान बदलने का दबाव बना रहा है।

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लव मैरिज के बाद शुरू हुआ विवाद

मामला जोधपुर के लूणी थाना क्षेत्र में दर्ज एफआईआर से जुड़ा है। राजाराम पालीवाल ने भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता की धारा 528 के तहत हाईकोर्ट में याचिका दायर कर मामले की निष्पक्ष और स्वतंत्र जांच की मांग की थी।

एफआईआर के मुताबिक, राजाराम ने 3 दिसंबर 2022 को अपनी पसंद से दूसरी जाति की युवती से शादी की थी।

आरोप है कि इसके बाद पालीवाल समाज के कुछ लोगों ने उनका और उनके परिवार का सामाजिक बहिष्कार कर दिया।

याचिका में कहा गया कि कई सामुदायिक पंचायतें बुलाई गईं। इस दौरान परिवार को कथित तौर पर बंधक बनाकर अपमानित किया गया, समाज से बाहर करने की धमकी दी गई और एक लाख रुपये जुर्माने के तौर पर वसूले गए।

इतना ही नहीं, बाद में 21 लाख रुपये की अतिरिक्त रकम की भी मांग की गई।

आरोप यह भी है कि परिवार के रिश्तेदारों को उनसे सामाजिक संबंध तोड़ने के लिए मजबूर किया गया।

लगातार धमकियों और सामाजिक बहिष्कार की वजह से परिवार मानसिक और शारीरिक रूप से परेशान रहा, जिसके बाद पुलिस में मामला दर्ज कराया गया।

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जांच अधिकारी पर भरोसा

सुनवाई के दौरान याचिकाकर्ता की ओर से कहा गया कि इस मामले की जांच हाईकोर्ट के पहले के आदेश के तहत नियुक्त जांच अधिकारी कर रहे हैं। जांच अधिकारी या जांच की प्रक्रिया को लेकर उन्हें कोई शिकायत नहीं है।

हालांकि, याचिकाकर्ता ने आरोप लगाया कि आरोपी पक्ष जांच अधिकारी पर नहीं बल्कि गवाहों को लगातार धमका रहा है। उन पर दबाव बना रहा है और उनका सामाजिक बहिष्कार किया जा रहा है

उनका कहना था कि इससे गवाह खुलकर बयान देने से डर रहे हैं, और अगर यह सिलसिला नहीं रुका तो पूरी जांच प्रभावित होने की आशंका है।

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गवाहों पर दबाव और सामाजिक बहिष्कार

याचिका में दावा किया गया कि लादूराम, अशोक पालीवाल और अनिल नाम के तीन स्वतंत्र गवाहों को लगातार धमकियां दी जा रही हैं। उन पर आरोपी पक्ष के समर्थन में आने का दबाव बनाया जा रहा है।

यह भी आरोप लगाया गया कि इन गवाहों के परिवारों का भी सामाजिक बहिष्कार किया गया, क्योंकि उन्होंने आरोपियों का साथ देने से इनकार कर दिया था।

याचिकाकर्ता ने कोर्ट से कहा कि अगर समय रहते ऐसे लोगों के खिलाफ कार्रवाई नहीं हुई तो जांच प्रभावित हो सकती है।

हाईकोर्ट ने क्या कहा?

सुनवाई के दौरान जस्टिस फरजंद अली ने कहा कि पहले भी कोर्ट साफ कर चुका है कि किसी आपराधिक मामले में गवाहों को धमकाकर, उन पर दबाव बनाकर या उनका सामाजिक बहिष्कार कर जांच को प्रभावित नहीं किया जा सकता।

इसी वजह से पहले भी ऐसे मामलों में पुलिस और प्रशासन को जरूरी कदम उठाने के निर्देश दिए गए थे।

अपने इस आदेश में कोर्ट ने दीपा राम मेघवाल और सुप्रीम कोर्ट के शक्ति वाहिनी फैसले का भी हवाला दिया।

हाईकोर्ट ने कहा कि अगर जांच के दौरान गवाहों को डराने, धमकाने या उन पर दबाव बनाने की शिकायत मिलती है तो पुलिस उसे गंभीरता से ले।

शिकायत सही मिलने पर जिम्मेदार लोगों के खिलाफ कानून के मुताबिक कार्रवाई की जाए, ताकि जांच बिना किसी दबाव के पूरी हो सके।

पुलिस और जांच एजेंसी को निर्देश

हाईकोर्ट ने कहा कि अगर इस मामले के किसी गवाह या किसी अन्य प्रभावित व्यक्ति की ओर से धमकी, दबाव या सामाजिक बहिष्कार की शिकायत की जाती है तो जांच अधिकारी उसे गंभीरता से लें और उसकी तुरंत जांच करें।

शिकायत सही मिलने पर जिम्मेदार लोगों के खिलाफ कानून के मुताबिक तत्काल कार्रवाई की जाए।

हाईकोर्ट ने यह भी कहा कि जांच के दौरान गवाहों को डराने, उन पर दबाव बनाने या सामाजिक बहिष्कार के जरिए जांच प्रभावित करने की किसी भी कोशिश को बर्दाश्त नहीं किया जाएगा।

हाईकोर्ट ने कहा कि जांच पूरी तरह निष्पक्ष होनी चाहिए और उस पर किसी भी प्रकार का बाहरी दबाव नहीं होना चाहिए।

इन्हीं निर्देशों के साथ राजस्थान हाईकोर्ट ने याचिका का निस्तारण कर दिया। साथ ही मामले से जुड़े सभी लंबित आवेदन भी समाप्त कर दिए।

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